Tuesday, February 18, 2014

ब्राह्मण (भूमिहार) का इतिहास,वर्तमान स्थिति और पुनरुद्धार के उपाय

ब्राह्मण (भूमिहार) का इतिहास वर्तमान स्थिति और पुनरुद्धार के उपाय


भूमिका

ब्राह्मण (भूमिहार) या भूमिहार ब्राह्मण के इतिहास पर बात करने से पहले हमें ब्राह्मण के इतिहास पर गौर करना होगा इसके लिए श्रृष्टि की रचना पर विचार करना होगा
सिर्फ तभी हम भूमिहार ब्राह्मण के इतिहास को समग्रता से समझ सकेंगे
श्रृष्टि-रचना की धार्मिक मान्यता के रहस्य को विज्ञान की कसौटी पर कसे बिना हम इसके वास्तविक स्वरूप को नहीं समझ सकेंगे


श्रृष्टि-रचना में श्रीमद्भागवतपुराण और डार्विन के सिद्धांत का विश्लेषण

श्रृष्टि-रचना के सिद्धांत की व्याख्या श्रीमद्भागवतपुराण (2/5/32-35) द्वितीय स्कन्द, पंचम अध्याय के श्लोक सं 32-35 में विशेष रूप से किया गया है हालांकि पूरा पांचवां और छठा अध्याय श्रृष्टि रचना की ही व्याख्या करता है
भागवतपुराण के अनुसार पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) की रचना करीब-करीब एक साथ एक के बाद एक हुई लेकिन वैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी महाध्वनि (Big Bang Theory) की उपज है जो किसी बड़े ग्रह के सूर्य से टकराने से हुई


भागवतपुराण के अनुसार पंचमहाभूत अपनी रचना के बाद बड़ी असंगठित अवस्था में थे जिसे चार्ल्स डार्विन ने अपनी पुस्तक ‘The Origin of Species’ में ‘Difused and Unsythecised State’ की संज्ञा दी है
मूलतः भागवतपुराण की असंगठित अवस्था और डार्विन का ‘Difused and Unsynthecysed State’ का अर्थ एक ही है
असंगठित अवस्था के ये महाभूत काफी लम्बे समय तक मूर्त पिंड का आकार नहीं ले पाए थे
पंचमहाभूत जब संगठित हुए तब एक महाकाय ब्रह्माण्ड रूप अंड-पिण्ड बना
ब्रह्माण्ड रूपी पिंड सहस्त्र वर्षों तक निर्जीव अचेतन अवस्था में जल में पड़ा रहा
इस निर्जीव पिंड और जल में जब क्षोभ हुआ जिसे डार्विन ने ‘Process of Agitation’ कहा अर्थात जल, वायु, आकाश और अग्नि के परस्पर भौतिक-रासायनिक प्रक्रिया से क्षोभ के कारण उस महापिंड में चेतना का संचार हुआ या वह जीवित हो गया
हमारा धर्मशास्त्र इसका कारण इश्वरीय कृपा और डार्विन आदि आधुनिक वैज्ञानिक इसे ‘Physio-Chemical Reaction’ की प्रक्रिया कहते हैं
आज स्थिर जल जमावट में जब मच्छर, शैवाल आदि जलजीव पैदा हो जाते हैं तो हम उसे ईश्वरीय कृपा नहीं समझते


हम इस बात पर जोर देकर किसी के धार्मिक विश्वास को प्रभावित करना नहीं चाहते लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि विज्ञान सदा धार्मिक रहस्यों और अंधविश्वासों पर से पर्दा उठाता आया है
जो चाँद कुछ वर्ष पहले तक हमारे लिए ‘चन्द्रलोक’ था वह आज मरुस्थल और बियावान पथरीला निर्जीव उपग्रह है
वैसे भी ब्रह्माण्ड को आकार देने वाले ‘Higs Bosone’ या ‘God Particle’ की खोज कर ली गई है और इसके अन्वेषक प्रोफेसर पीटर हिग्स को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है
वह दिन अब दूर नहीं जब श्रृष्टि की रचना का वैज्ञानिक तथ्य ही सामने होगा


अब हम इस बात पर विचार करें कि वह विशाल चेतन पिंड क्या था
डार्विन उसे ‘विभिन्न गुण-रूपों के बैक्टीरिया का एक प्राकृतिक मूर्त रूप’ (Formation of Heterogeneous Bacterial Growth) कहता है
इस विशाल चेतन पिण्ड के विभिन्न हिस्से को उसकी आकृति के अनुसार मुँह, बाजू, वक्ष, जानू और पाद की संज्ञा दी गई जैसे बादल का विशाल पिण्ड कभी मुंह, हाथ या पैर की तरह नजर आता है और कभी किसी जानवर की तरह लगता है
इसके विभिन्न हिस्से से इसकी प्रकृति के अनुसार विभिन्न जीव-जन्तु उत्पन्न हुए क्योंकि इसके विभिन्न हिस्सों की उर्वरा शक्ति भिन्न थी
(उदाहरणार्थ एक गन्ने के पौधे के विभिन्न हिस्से में गुणों के अनुसार मिठास अलग-अलग होती है)
यह चेतन पिण्ड कोई सौ-दो सौ गज में फैला हुआ नहीं बल्कि हजारों-हजार मील में फैला हुआ पदार्थ था और ऐसे ऐसे हजारों पिंड हजारों जगह फैले हुए थे जिससे देश-काल की भिन्नता एवं महाभूतों की स्थानीय विशेषताओं के चलते एक ही प्रकार के जीव के विभिन्न रंग, रूप और आकार बनते गए
कहीं हाथी सफेद तो कहीं हाथी कला, कहीं ऊंट तो कहीं जिराफ, कहीं मानव तो कहीं दानव
इसी के विभिन्न हिस्सों से सर्प, नाग, दानव, वृक्ष, लताएँ आदि सभी पैदा हुए
ये जीव-जन्तु भी सब अचानक एक साथ पैदा नहीं हुए
अंतरिक्ष में मिले मच्छर के जीवाष्मों के अध्ययन से पता चला है कि मच्छर मनुष्यों से 50 करोड़ वर्ष पहले उत्पन्न हुए थे जबकि मनुष्य की उत्पत्ति आज से करीब 16 से 20 करोड़ वर्ष पहले हुई थी
खुद पृथ्वी ही आज से करीब 4.55GA (Giga/Billion years) अरब साल पहले स्तित्व में आई है
क्रमिक विकास इतनी मंद गति से होता है कि मनुष्यों को ही अपने चार पैरों से दो पैरों पर खड़े होने में कई लाख वर्ष लगे
सबों पर डार्विन का क्रमिक विकास का सिद्धांत (Theory of Gradual Evolution) ही लागू होता है


ब्राह्मण की उत्पत्ति

इस परिप्रेक्ष्य में अब हम ब्राह्मण की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विचार करें
हमारा शास्त्र कहता है :-

(१) ब्राह्मणो स्य मुखमासीद्बाहू राजन्य: कृत:। ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥ (अध्याय ३१(११) पुरुष सूक्त, यजुर्वेद)

(२) चतुर्वर्णम् मयाश्रिष्ठ्यम् गुणकर्माविभागशः (गीता)

यजुर्वेद ३१वें अध्याय के पुरुष सूक्त श्लोक सं ११ की पुष्टि ऋग्वेद, और अथर्ववेद के साथ श्रीमद्भागवतपुराण ने भी की है
इसका सटीक अर्थ समझने के लिए हमें पहले यजुर्वेद के श्लोक सं १० का अर्थ समझना होगा
दसवें श्लोक में पूछा गया है कि “उस विराट पुरुष का मुख कौन है, बाजू कौंन है, जंघा कौन है तथा पैर कौन है? इसके उत्तर में श्लोक सं ११ आता है जिसमे कहा गया है कि “ ब्राह्मण ही उसका मुख है, क्षत्रिय बाजू है, वैश्य जंघा है और शूद्र पैर है”
यह कहीं नहीं लिखा है कि प्रजापति (ब्रह्मा) के मुख से ब्राह्मण, बाजूओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शुद्र पैदा हुए
ऐसा अर्थ मात्र भ्रान्ति है
इस पर मैं कोई शास्त्रार्थ करना नहीं चाहता क्योंकि इसकी वास्तविकता मैं पहले ही बता चुका हूँ
हम तो उस दिन की कल्पना भर कर सकते हैं जब अणुओं के टकराव और विष्फोट से उत्पन्न हिग्स बोसोन या (God Particle) श्रृष्टि की रचना का पूरा सिद्धांत 40-50 वर्षों में बदल देगा
तब ब्राह्मण न तो मुख से पैदा हुआ माना जायेगा और नहीं शुद्र पैरों से


ब्राह्मणों के कार्य

अध्यापनमध्यायनं च याजनं यजनं तथा।

दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्र जन्मन:॥ 10।75

मनुस्मृति के इस श्लोक के अनुसार ब्राह्मणों के छह कर्म हैं
साधारण सी भाषा में कहें तो अध्ययन-अध्यापन(पढ़ना-पढाना), यज्ञ करना-कराना, और दान देना-लेना
इन कार्यों को दो भागों में बांटा गया है
धार्मिक कार्य और जीविका के कार्य
अध्ययन,यज्ञ करना और दान देना धार्मिक कार्य हैं तथा अध्यापन, यज्ञ कराना (पौरोहित्य) एवं दान लेना ये तीन जीविका के कार्य हैं
ब्राह्मणों के कार्य के साथ ही इनके दो विभाग बन गए
एक ने ब्राह्मणों के शुद्ध धार्मिक कर्म (अध्ययन, यज्ञ और दान देना) अपनाये और दूसरे ने जीविका सम्बन्धी (अध्यापन, पौरोहित्य तथा दान लेना) कार्य
जिस तरह यज्ञ के साथ दान देना अंतर्निहित है वैसे ही पौरोहित्य अर्थात यज्ञ करवाने के साथ दान लेना
इस तरह वास्तव में ब्राह्मणों के चार ही कार्य हुए – अध्ययन और यज्ञ तथा अध्यापन और पौरोहित्य


याचकत्व और अयाचकत्व

ब्राह्मणों के कर्म विभाजन से मुख्यतः दो शाखाएं स्तित्व में आयीं – पौरोहित्यकर्मी या कर्मकांडी याचक एवं अध्येता और यजमान अयाचक
यह भी सिमटकर दो रूपों में विभक्त होकर रह गया – दान लेने वाला याचक और दान देने वाल अयाचक
सत्ययुग से ही अयाचक्त्व की प्रधानता रही
विभिन्न पुराणों, बाल्मीकिरामायण और महाभारत आदि में आये सन्दर्भों से पता चलता है कि याचकता पर सदा अयाचकता की श्रेष्टता रही है
प्रतिग्रह आदि तो ब्राह्मणोचित कर्म नहीं हैं जैसा कि मनु जी ने कहा है कि :-

प्रतिग्रह समर्थोपि प्रसंगं तत्रा वर्जयेत्।

प्रतिग्रहेण ह्यस्याशु ब्राह्मं तेज: प्रशाम्यति॥ (म.स्मृ. 4/186)

'यदि ब्राह्मण प्रतिग्रह करने में सामर्थ्य भी रखता हो (अर्थात् उससे होनेवाले पाप को हटाने के लिए जप और तपस्यादि भी कर सकता हो) तो भी प्रतिग्रह का नाम भी न ले, क्योंकि उससे शीघ्र ही ब्रह्मतेज (ब्राह्मणत्व) का नाश हो जाता है’। जैसा रामायण में स्पष्ट लिखा हैं और ब्रह्मर्षि वशिष्ट ने भी कहा है कि 'उपरोहिती कर्म अतिमन्दा। वेद पुराण स्मृति कर निन्दा।'

भू-धन का प्रबंधन

दंडीस्वामी श्री सहजानंद सरस्वती जी के अनुसार अयाचकता और याचकता किसी विप्र समाज या जाति का धर्म न होकर व्यक्ति का धर्म हैं। जो आज अयाचक हैं कल वह चाहे तो याचक हो सकता हैं और याचक अयाचक। इसी सिद्धांत और परम्परा के अनुसार जब याचक ब्राह्मणों को दान स्वरूप भू-संपत्ति और ग्राम दान मिलने लगे तो याचकों को भू-धन प्रबंधन की जटिलताएं सताने लगीं
पौरोहित्य जन्य कर्मों में संलग्न याचक वर्ग दान में मिली भू-सम्पत्तियों के प्रबंधन के लिए समय नहीं निकाल पा रहा था
इसलिए आंतरिक श्रम विभाजन के सिद्धांत पर आपसी सहयोग और सम्मति से परिवार के कुछ सदस्य अपनी रूचि अनुसार भू-प्रबंधन में संलग्न हो गए


ब्राह्मणों के पेशागत परिवर्तन के उदाहरण वैदिक काल में परशुराम, द्रोण, कृप, अश्‍वत्थामा, वृत्र, रावण एवं ऐतिहासिक काल में शुंग, शातवाहन, कण्व, अंग्रेजी काल में काशी की रियासत, दरभंगा, बेतिया, हथुआ, टिकारी, तमकुही, सांबे, मंझवे, आदि के जमींदार हैं।

भूदान-धन प्रबन्धक की विशेषताएं एवं इतिहास – ब्राह्मण की विशेष शाखा का उद्भव

आज भी किसी परिवार में प्राकृतिक श्रम विभाजन के सिद्धांत पर हर सदस्य अपनी रूचि अनुसार अलग-अलग काम स्वतः ले लेता है
कोई सरकारी दफ़्तर और कोर्ट कचहरी का काम संभालता है तो कोई पशुधन प्रबंधन में लग जाता है तो कोई ग्राम संस्कृति में संलग्न हो ढोलक बजाने लगता है तो कोई साधारण से लेकर ऊँची-ऊँची नौकरियां करने लगता है तो कोई पूजा-पाठ यज्ञादि में संलग्न हो जाता है
ठीक यही हाल याचकता और अयाचकता के विभाजन के समय हुआ
हालांकि उस समय किसी के उत्कृष्ट और किसी के निकृष्ट होने की कल्पना भी नहीं थी


भू-संपत्ति प्रबंधन में संलग्न परिवार शुद्ध अयाचकता की श्रेणी में अपने को ढालता गया
याचकों की आर्थिक विपन्नता और अयाचकों की भू-सम्पदाजन्य सम्पन्नता काल-क्रम से उत्तरोत्तर बढ़ती गई तथापि याचकों के सामाजिक प्रभाव और आत्मसम्मान में कोई कमी नहीं थी
ऐसा भी नही था कि याचक ब्राह्मण कृषि कार्य नही करता था लेकिन उसके पास विशेषज्ञता की कमी थी और आत्मसम्मान की अधिकता
वाल्मीकिरामायण के के अयोध्या कांड बत्तीसवें सर्ग के २९-४३वें श्लोक में गर्ग गोत्रीय त्रिजट नामक ब्राह्मण की कथा से अयाचक से याचक बनने का सटीक उदाहरण मिलता है:-



तत्रासीत् पिंगलो गार्ग्यः त्रिजटो नाम वै द्विज; क्षतवृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललांगली। ॥ 29॥

इस आख्यान से यह भी स्पष्ट हैं कि दान लेना आदि स्थितिजन्य गति हैं, और काल पाकर याचक ब्राह्मण अयाचक और अयाचक ब्राह्मण याचक हो सकते हैं और इसी प्रकार अयाचक और याचक ब्राह्मणों के पृथक्-पृथक् दल बनते और घटते-बढ़ते जाते हैं




इसी तरह के संदर्भ का द्वापरकालीन महाभारत में युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ में ब्राह्मणों द्वारा गोधन आदि भू-संपदा के उपहार और दान का वर्णन दुर्योधन द्वारा शकुनि के समक्ष किया गया है


त्रेता-द्वापर संधिकाल में क्षत्रियत्व का ह्रास एवं अयाचक भू-धन प्रबन्धक द्वारा क्षात्रजन्य कार्यों का संचालन

मनुजी स्पष्ट लिखते हैं कि :

सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।

सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्र विदर्हति॥ 100॥

अर्थात ''सैन्य और राज्य-संचालन, न्याय, नेतृत्व, सब लोगों पर आधिपत्य, वेद एवं शास्त्रादि का समुचित ज्ञान ब्राह्मण के पास ही हो सकता है, न कि क्षत्रियादि जाति विशेष को।''

स्कन्दपुराण के नागर खण्ड 68 और 69वें अध्याय में लिखा हैं कि जब कर्ण ने द्रोणाचार्य से ब्रह्मास्त्र का ज्ञान माँगा हैं तो उन्होंने उत्तर दिया हैं कि :

ब्रह्मास्त्रां ब्राह्मणो विद्याद्यथा वच्चरितः व्रत:।

क्षत्रियो वा तपस्वी यो नान्यो विद्यात् कथंचन॥ 13॥



अर्थात् ''ब्रह्मास्त्र केवल शास्त्रोक्ताचार वाला ब्राह्मण ही जान सकता हैं, अथवा क्षत्रिय जो तपस्वी हो, दूसरा नहीं। यह सुन वह परशुरामजी के पास, “मैं भृगु गोत्री ब्राह्मण हूँ,” ऐसा बनकर ब्रह्मास्त्र सीखने गया हैं।'' इस तरह ब्रह्मास्त्र की विद्या अगर ब्राह्मण ही जान सकता है तो युद्ध-कार्य भी ब्राह्मणों का ही कार्य हुआ




उन विभिन्न युगों में भी ब्राह्मणों के अयाचक दल ने ही पृथ्वी का दायित्व संभाला
इससे बिना शंका के यह सिद्ध होता है कि भू-धन प्रबन्धक अयाचक ब्राह्मण सत्ययुग से लेकर कलियुग तक थे और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाये रखी हालांकि वे अयाचक ब्राह्मण की संज्ञा से ही विभूषित रहे
साहस, निर्णय क्षमता, बहादुरी, नेतृत्व क्षमता और प्रतिस्पर्धा की भावना इनमे कूट-कूटकर भरी थी तथा ये अपनी जान-माल ही नहीं बल्कि राज्य की सुरक्षा के लिए भी शक्तिसंपन्न थे


क्षत्रियत्व का ह्रास

प्राणी रक्षा के दायित्व से जब क्षत्रिय च्युत हो निरंकुश व्यभिचारी और अधार्मिक कार्यों एवं भोग विलास में आकंठ डूब गए तो ब्रह्मर्षि परशुराम जी ने उनका विभिन्न युगों में २१ बार संहार किया और पृथ्वी का दान और राज ब्राह्मणों को दे दिया


यहाँ पर मैं जरा सा संदार्भातिरेक करूँगा
प्रश्न उठता है कि अगर परशुराम जी ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय-विहीन कर दिया तो बाद में क्षत्रिय कहाँ से आ गए? उत्तर यह है कि हालाँकि पौराणिक इतिहास में कहीं भी ऐसा संदर्भ नहीं है की उन्होंने क्षत्रियों के साथ क्षत्राणियों का भी संहार किया
नारी सदा अवध्य ही रही
उन्हीं अवध्य जीवित क्षत्राणियों से ब्राह्मणों ने जो संतानें पैदा कीं वे क्षत्रिय कहलाये इसलिए क्षत्रिय भी ब्राह्मणों की ही संतानें हुईं
शास्त्र भी कहता है की ब्राह्मण वीर्य और क्षत्रिय रज से उत्पन्न संतान क्षत्रिय ही होती हैं ब्राह्मण नहीं
महाभारत में अर्जुन ने युधिष्ठिर से शान्तिपर्व में कहा है कि:

ब्राह्मणस्यापि चेद्राजन् क्षत्राधार्मेणर् वत्तात:।

प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्रांहि ब्रह्मसम्भवम्॥ अ.॥ 22॥

''हे राजन्! जब कि ब्राह्मण का भी इस संसार में क्षत्रिय धर्म अर्थात् राज्य और युद्धपूर्वक जीवन बहुत ही श्रेष्ठ हैं, क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मणों से ही उत्पन्न हुए हैं, तो आप क्षत्रिय धर्म का पालन करके क्यों शोक करते हैं?'



कलियुग में अयाचक भू-धन प्रबंधक की स्वतंत्र पहचान व् ब्राह्मणों में सर्वोच्च अधिकार



कलियुग में इस भू-प्रबन्धक की लिखित और अमिट छाप ईशापूर्व से स्पष्ट परिलक्षित होती है
सिकंदर ने जब 331 ईशापूर्व आर्यावर्त पर आक्रमण किया था तो उसके साथ उसका धर्मगुरु अरस्तू भी साथ आया था
अरस्तू ने क्षत्रियों की अराजकता और अकर्मण्यता के संदर्भ में उस समय के भारत की जो दुर्दशा देखी उसका बहुत ही रोचक चित्रण अपने स्मरण ग्रन्थ में इस तरह किया है:-

“Now the ideas about castes and profession, which have been prevalent in Hindustan for a very long time, are gradually dying out, and the Brahmans, neglecting their education,....live by cultivating the land and acquiring the territorial possessions, which is the duty of Kshatriyas. If things go on in this way, then instead of being (विद्यापति) i.e. Master of learning, they will become (भूमिपति) i.e. Master of land”.

“जो विचारधारा, कर्म और जाति प्रधान भारतवर्ष में प्राचीन काल से प्रचलित थी, वह अब धीरे-धीरे ढीली होती जा रही हैं और ब्राह्मण लोग विद्या विमुख हो ब्राह्मणोंचित कर्म छोड़कर भू-संपत्ति के मालिक बनकर कृषि और राज्य प्रशासन द्वारा अपना जीवन बिता रहे हैं जो क्षत्रियों के कर्म समझे जाते हैं। यदि यही दशा रही तो ये लोग विद्यापति होने के बदले भूमिपति हो जायेगे।'' आज हम कह सकते हैं कि अरस्तू की भविष्यवाणी कितनी सटीक और सच्ची साबित हुई


In the year 399 A.D. a Chinese traveler, Fahian said “owing to the families of the Kshatriyas being almost extinct, great disorder has crept in. The Brahmans having given up asceticism....are ruling here and there in the place of Kshatriyas, and are called ‘Sang he Kang”, which has been translated by professor Hoffman as ‘Land seizer’.

अर्थात “क्षत्रिय जाति करीब करीब विलुप्त सी हो गई है तथा बड़ी अव्यवस्था फ़ैल चुकी है
ब्राह्मण धार्मिक कार्य छोड़ क्षत्रियों के स्थान पर राज्य शासन कर रहे हैं”


राज्य संचालन

यद्यपि अयाचक ब्राह्मणों द्वारा राज्याधिकार और राज्य संचालन का कार्य हरेक युग में होता रहा है लेकिन ईशापूर्व चौथी-पांचवीं सदी से तो यह कार्य बहुत ही ज्यादा प्रचलित हो गया और इसने करीब-करीब एक परम्परा का रूप ले लिया
इसमें सर्व प्रमुख नाम 330 ई.पू. सिकंदर से लोहा लेने वाले सारस्वत गोत्रीय महियाल ब्राह्मण राजा पोरस, 500 इस्वी सुधाजोझा, 700 ईस्वी राजा छाच, और 1001 ईस्वी में अफगानिस्तान में जयपाल, आनंदपाल और सुखपाल आदि महियाल ब्राह्मण राजा का नाम आता है जैसा कि स्वामी सहजानंद सरस्वती ने ‘ब्रह्मर्षि वंशविस्तर’ में लिखा है


भू-धन प्रबंधक ब्राह्मणों में “भूमिहार” शब्द का प्रथम ज्ञात प्रचलन

हालांकि भूमिहार शब्द का पहला जिक्र बृहतकान्यकुब्जवंशावली १५२६ ई. में आया है लेकिन सरकारी अभिलेखों में प्रथम प्रयोग 1865 की जनगणना रिपोर्ट में हुआ है
इसके पहले गैर सरकारी रूप में इतिहासकार बुकानन ने 1807 में पूर्णिया जिले की सर्वे रिपोर्ट में किया है
इनमे लिखा है :-

“भूमिहार अर्थात अयाचक ब्राह्मण एक ऐसी सवर्ण जाति जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। इसका गढ़ बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश है
पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्राह्मणों को त्यागी नाम की उप-जाति से जाना व पहचाना जाता हैं।“

एम.ए. शेरिंग ने १८७२ में अपनी पुस्तक Hindu Tribes & Caste में कहा "भूमिहार जाति के लोग हथियार उठाने वाले ब्राह्मण हैं (सैनिक ब्राह्मण)। पं. परमेश्वर शर्मा ने ‘सैनिक ब्राह्मण’ नामक पुस्तक भी लिखी है


अंग्रेज विद्वान मि. बीन्स ने लिखा है – “भूमिहार एक अच्छी किस्म की बहादुर प्रजाति है, जिसमे आर्य जाति की सभी विशिष्टताएं विद्यमान है। ये स्वाभाव से निर्भीक व हावी होने वालें होते हैं।“

'विक्रमीय संवत् 1584 (सन् 1527) मदारपुर के अधिपति भूमिहार ब्राह्मणों और बाबर से युद्ध हुआ और युद्धोपरांत भूमिहार मदारपुर से पलायन कर यू.पी. एवं बिहार के बिभिन्न क्षेत्रों में फ़ैल गए
गौड़, कान्यकुब्ज सर्यूपारी, मैथिल, सारस्वत, दूबे और तिवारी आदि नाम प्राय: ब्राह्मणों में प्रचलित हुए, वैसे ही भूमिहार या भुइंहार नाम भी सबसे प्रथम कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के एक अयाचक दल विशेष में प्रचलित हुआ।

भूमिहार शब्द सबसे प्रथम 'बृहत्कान्यकुब्जकुलदर्पण' (1526) के 117वें पृष्ठ पर मिलता है
इसमें लिखा हैं कि कान्यकुब्ज ब्राह्मण के निम्नलिखित पांच प्रभेद हैं:-



(1) प्रधान कान्यकुब्ज

(2) सनाढ्य

(3) सरवरिया

(4) जिझौतिया

(5) भूमिहार

सन् 1926 की कान्यकुब्ज महासभा का जो 19वाँ वार्षिक अधिवेशन प्रयाग में जौनपुर के राजा श्रीकृष्णदत्तजी दूबे, की अध्यक्षता में हुई थी
स्वागताध्यक्ष जस्टिस गोकरणनाथ मिश्र ने भी भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग माना है


जमींदार/भूमिहार



यद्यपि इनकी संज्ञा प्रथम जमींदार या जमींदार ब्राह्मण थी लेकिन एक तो, उसका इतना प्रचार न था, दूसरे यह कि जब पृथक्-पृथक् दल बन गये तो उनके नाम भी पृथक-पृथक होने चाहिए
परन्तु जमींदार शब्द तो जो भी जाति भूमिवाली हो उसे कह सकते हैं। इसलिए विचार हुआ कि जमींदार नाम ठीक नहीं हैं। क्योंकि पीछे से इस नामवाले इन अयाचक ब्राह्मणों के पहचानने में गड़बड़ होने लगेगी। इसी कारण से इन लोगों ने अपने को भूमिहार या भुइंहार कहना प्रारम्भ कर दिया। हालांकि जमींदार और भूमिहार शब्द समानार्थक ही हैं, तथापि जमींदार शब्द से ब्राह्मण से अन्य क्षत्रिय आदि जातियाँ भी समझी जाती हैं, परन्तु भूमिहार शब्द से साधारणत: प्राय: केवल अयाचक ब्राह्मण विशेष ही क्योंकि उसी समाज के लिए उसका संकेत किया गया हैं।

आईन-ए-अकबरी, उसके अनुवादकों और उसके आधार पर इतिहास लेखकों के भी मत से भूमिहार ब्राह्मण लोग ब्राह्मण सिद्ध होते हैं। कृषि करने वाले या जागीर प्राप्त करने बाले भूमिहारों के लिए ‘जुन्नारदार’ शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका मतलब होता है “जनेऊ पहनने वाला ब्राह्मण”
फिर वहाँ भूमिहार लोग ब्राह्मण हैं या नहीं इस संशय की जगह ही कहाँ हैं?

जाति के रूप में भूमिहारो का संगठन

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन है
प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगों को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया, उसके बाद सारस्वत, महियल, सरयूपारी, मैथिल, चितपावन, कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए
मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए


भूमिहार ब्राह्मण महासभा

१८८५ में द्विजराज काशी नरेश महाराज श्री इश्वरी प्रसाद सिंह जी ने वाराणसी में प्रथम अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा की स्थापना की
बिहार और उत्तर प्रदेश के जमींदार ब्राह्मणों की एक सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा कि हमारी एक जातीय सभा होनी चाहिए
सभा के प्रश्न पर सभी सहमत थे
परन्तु सभा का नाम क्या हो इस पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया
मगध के बाभनो ने जिनके नेता स्व.कालीचरण सिंह जी थे, सभा का नाम ‘बाभन सभा’ करने का प्रस्ताव रखा
स्वयं महाराज ‘भूमिहार ब्राह्मण सभा’ के पक्ष में थे
बैठक में आम राय नहीं बन पाई, अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उप-समिति गठित की गई
सात वर्षो के बाद समिति की सिफारिश पर "भूमिहार ब्राह्मण" शब्द को स्वीकृत किया गया


१९४७ में ३३वां अखिल भारतीय सम्मलेन टिकारी में पं. वशिष्ठ ना. राय की अध्यक्षता में हुआ
अनेकों संस्कृत विद्यालयों/महाविद्यालयों के संस्थापक/व्यवस्थापक स्वामी वासुदेवाचार्य जी इसके स्वागताध्यक्ष थे
टिकारी सम्मलेन के बाद ४७ वर्षों तक कोई अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण सम्मलेन नहीं हुआ क्योंकि राजा रजवाड़े रहे नहीं जो सम्मेलन आयोजित कराते थे हालांकि क्षेत्रीय सम्मलेन विभिन्न नामों से होते रहे


१९९४ जून में ३४वां अधिवेशन टिकारी अधिवेशन के ४७ वर्षों बाद अखिल भारतीय भूमिहार बाह्मण सम्मलेन सिमरी, जिला बक्सर बिहार में हुआ विद्वानों और समाजसेवियों के सानिध्य में आचार्य पं. रामख्याली शर्मा की अध्यक्षता में हुआ
इसी सिमरी ग्राम में स्वामी सहजानंद सरस्वती जी ने अपने महान ग्रंथ कर्मकलाप, ब्रह्मर्षि वंश विस्तर, और भूमिहार ब्राह्मण परिचय लिखे हालांकि सीताराम आश्रम, बिहटा, पटना जिला उनका अंतिम निवास था
इस तरह भूमिहार ब्राह्मण महासभा का ११४ वर्षों के इतिहास में मुख्यतः ३४ अधिवेशन हुए हालांकि सभाएं तो पचास से ज्यादा हईं
इसके बाद भी सभाएं तो बहुत हुईं लेकिन उसका क्रमानुसार नामकरण नहीं किया गया




परिचय देना

जैसे कान्यकुब्ज या सर्यूपारी अदि ब्राह्मणों से पूछने पर वे लोग प्रथमत: 'आप कौन हैं?' इस प्रश्न का उत्तर 'ब्राह्मण हैं' ऐसा देते हैं। उसके बाद 'कौन ब्राह्मण हैं?' इस प्रश्न पर 'सर्यूपारी या कान्यकुब्ज ऐसा बतलाते हैं। वैसे ही अयाचक ब्राह्मणों से पूछने पर कि 'आप कौन हैं?' उन्हें कहना चाहिए कि 'ब्राह्मण हैं'। पश्चात् 'कौन ब्राह्मण हैं?' ऐसा पूछने पर 'अयाचक अथवा भूमिहार, पश्चिमा, त्यागी, महियाल ब्राह्मण हैं' ऐसा उत्तर देना चाहिए।

राजाज्ञा – बनारस, टिकारी, बेतिया, तमकुही आदि

1793 के स्थायी भू प्रबंध के समय में आज के सभी भूमिहार राजाओं के पूर्वज ‘ब्राह्मण’ कौम से ही जाने जाते थे
जैसे दस परगने की जमींदारी टिकारी के राजा मित्रजित सिंह कौम ब्राह्मण को, फतह नारायण सिंह कौम ब्राह्मण हथुआ राज, राजा मानसाराम वल्द मनोरंजन मिश्र कौम ब्राह्मण आदि


ईस्ट इण्डिया कम्पनी की कार्यवाही की जाँच के लिए जो सिलेक्ट कमिटी बैठी थी, उसकी जो पाँचवीं रिपोर्ट बंगाल प्रेसिडेन्सी के विषय में प्रकाशित होकर सन् 1812 ई. में लन्दन में छपी हैं, उसके प्रथम भाग के 511 से 513 पृष्ठों तक ऐसा लिखा हुआ हैं – इसमें सभी भूमिहारों को ब्राह्मण ही लिखा गया है:-



''सूबा बिहार” (प्रथम सरकार) बिहार

(3) 10 परगनों की जमींदारी मित्राजीत सिंह कौम ब्राह्मण, टिकारी के निवासी को मिली


(5) अरंजील और मसौढ़ी इन दो परगनों के जमींदार जसवन्त सिंह वगैरह ब्राह्मण थे।

(9) सौरत और बलिया ये दो परगने खासकर हुलास चौधुरी और आनागिर सिंह नामक ब्राह्मणों की जमींदारी थी।

(11) ग्यासपुर परगने की जमींदारी शिवप्रसाद सिंह ब्राह्मण की थी और उसमें छोटे-छोटे जमींदार भी शरीक थे।

8 फरबरी 1912 का यू.पी. शिक्षा विभाग का पत्र

G 15320

No ——— —1911-12

X-25

From,

The Hon’ble Mr. C. F. De La Fosse M.A.

Director of Public Instruction

United Provinces.

To

The Secretary,

Bhumihar Brahman Sabha. Benares.

Dated Allahabad. 8th Feb., 1912.

With reference to his letter dated the 7th September, 1912, has the honour to inform him that the Inspectors of schools have been requested to show Bhumihars as Brahmans in the Annual Statistical Returns.(आपको सूचित किया जाता है कि वार्षिक सांख्यिकी रिपोर्ट में भूमिहार को ब्राह्मण ही दिखायें)

S/d P.S.Barell M.A.

Assistant Director of P.I.

For C.F. De La Fosse M.A.

Director of P.I., U.P.

अयोध्या का मुकद्दमा

आनंद भवन बिहारी बनाम राम दुलारे त्रिपाठी ACJ Faizabad Suite No 22/1962 – पं. राम दुलारे ने कहा कि महावीर शरण भूमिहार हैं, ब्राह्मण नहीं अतः आनंद बिहारी ठाकुरबाड़ी के सर्बकार नहीं हो सकते क्योंकि सर्बकार सिर्फ विरक्त ब्राह्मण ही हो सकता है भूमिहार नहीं
कोर्ट ने डिक्री पास किया कि भूमिहार हर हाल में ब्राह्मण है
इस आशय की कई डिक्रियां अदालतों ने पास किये हैं










अन्य प्रान्तों में भूमिहार ब्राह्मणों के नाम/उपाधि



भूमिहारों का ब्राह्मणत्व से विचलन व् बढ़ती दूरियां

बनारस(काशी), टिकारी, अमावां, हथुआ, बेतिया और तमकुही आदि अनेक ब्राह्मणों (भूमिहार) के राज्यारोहण के बाद सम्पूर्ण भूमिहार समाज शिक्षा, शक्ति, और रोआब के उच्च शिखर पर पहुँच गया था
चारो ओर हमारे दबदबे की दहशत सी फैली हई थी
लोग भूमिहारों का नाम भय मिश्रित अदब से लिया करते थे
सर्वाधिकार प्राप्ति और वर्चस्व के लिए भूमिहार शब्द ही काफी था


धीरे धीरे हमने विवेकशून्यता का प्रदर्शन करना शुरू किया
फिर भूमिहार शब्द के साथ तमाम नकारात्मक विशेषण जुड़ने लगे
हमने भूमिहार शब्द के चाबुक का प्रयोग हर उचित-अनुचित जगह करना प्रारम्भ किया
भूमिहार शब्द का नशा हमारे दिलो-दिमाग को इतना विषाक्त कर दिया कि हमारे पैर जमीन पर नही टिकते थे
हरेक भूमिहार चाहे वह साधारण कर्जदार खेतिहर रैयत ही क्यों न हो, वह इन रियासतों के मालिक से अपने आप को कमतर नहीं आंकने लगा
खेत में भले ही वह मगधनरेश रूपी रैयत अपने मजदूर के साथ कंधा से कंधा मिलाकर धान-गेहूं की कटाई करे पर क्या मजाल कि गली से गुजरते वक्त वह मजदूर गली में खटिया निकालकर सामने बैठे रहने की जुर्रत कर ले


हाल यह हुआ कि हम अब ब्राह्मणों से अलग अपनी एक जाति समझने लगे
हमारे उम्र के लोगों को याद होगा कि जब बचपन में शादी के लिए अगुआ आता था तो हमें घर के लोग बताते थे कि अगुआ पूछेगा कि “बबुआ आप कौन जात के है?” तो बताना कि “हम भूमिहार ब्राह्मण हैं”
लेकिन आज हम अपने को ब्राह्मण या भूमिहार ब्राह्मण कहने में अपनी तौहीन और सिर्फ भूमिहार कहने में अपनी शान समझते हैं
अब तो हाल यह है कि “न खुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे”


भूमिहार ब्राह्मणों की वर्तमान स्थिति

अब तो हम खालिस भूमिहार जाति के हो गए और ब्राह्मणों ने हमसे दूरी बना ली
अब जब हमारे युवा स्वयं अपनी जड़ और अपना इतिहास पूरी तरह भूल गए हैं तो अन्य जातियां उनपर फब्तियां कसती हैं और पूछती हैं कि भूमिहार कौन सी जात है? न ब्राह्मण, न राजपूत, न वैश्य और न शुद्र!!! तुम तो ‘Mixed Breed’ (मिश्रित जाति) के हो
तुम्हारा अपना कोई इतिहास नहीं है, आदि-आदि
जब हम अपना इतिहास ही नहीं जानते तो उन्हें जवाब क्या देंगे? हम बगलें झाँकने लगते हैं और फेसबुक पर पूछते हैं कि हमारा इतिहास क्या है?

“वो परिंदा जिसे परवाज से फुर्सत ही न थी; आज तनहा है तो दीवार पर आ बैठा है


यह किसकी गलती है? किसने हमे दम्भ में चूर होकर अपने को ब्राह्मण से अलग होने के लिए कहा? हमारे पूर्वज ब्राह्मणों ने तो हमे मदारपुर सम्मेलन से ही अपना माना था
कान्यकुब्ज हों या सरयूपारी दोनों ने ही सदा हमें अपना कहा
लेकिन हमें तो टिकारी, बेतिया और काशी नरेश बनना था
अयाचक्त्व के नशे में हमने अपने आप को अपने आधार से नीचे गिराकर अंतहीन अंधकूप में डाल दिया
शिक्षा और उन्नति की हर विधा को तिलांजलि देकर हमने मगध नरेश बनने का सपना देखा
‘Firsr deserve then desire’ अर्थात ‘पहले काबलियत हासिल करो तब ख्वाब देखो’ के मूल मंत्र को भूमिहार के रोब में कोई स्थान नहीं दिया और नतीजा है कि आज हम अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मार बैठे हैं
हम क्या थे और क्या हो गए
आज हमें दूसरों से नहीं अपनों से ही डर सता रहा है


“मेरा अज्म इतना बुलंद है, कि पराये शोलों का डर नहीं; मुझे खौफ आतिशे-गुल से है, कहीं ये चमन को जला न दे



आज हम कठिन परिश्रम से जी चुराते हैं और सब कुछ बिना प्रयास के अपनी थाली में पाना चाहते हैं
“We want everything on a Platter” हाँ, यह बात ठीक है कि आज के ‘Welfare State System’ अर्थात कल्याणकारी राज्य व्यवस्था में आरक्षण आदि बहुत से प्रावधान हमारे समाज की उन्नति में बाधक हैं लेकिन सरकारी प्रतियोगिताजन्य नौकरियों के अलावे अभी भी Private Sector में अपार संभावनाएं हैं जहां योग्यता की पूछ, इज्जत और जरुरत है और अपनी क़ाबलियत दिखाने के असंख्य अवसर
कौन रोकता है हमें
“सितारों के आगे जहां और भी है”


पुनरोद्धार के उपाय

अंग्रेजी में एक कहावत है –“It is never too late” किसी भी अच्छे काम की शुरुआत के लिए कभी देर नही होती
हमने अपने आप को गहरे जख्म अवश्य दिये हैं लेकिन मर्ज ला-ईलाज नहीं हुआ है
हाँ, इसके लिए बहुत बड़े पैमाने पर और हरेक स्तर पर सामूहिक और दृढ़ निश्चयी प्रयास की आवश्यकता है
मेरे विचार से निम्नलिखित उपाय कारगर साबित हो सकते हैं:-

• शीघ्रातिशीघ्र हम अपने बच्चों के स्कूल रिकॉर्ड में जाति के स्थान में ‘ब्राह्मण’ या ‘ब्राह्मण (भूमिहार) या भूमिहार ब्राह्मण लिखना शुरू कर दें


• सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर सरकार पर प्रभाव डालें कि जनगणना आदि सभी अभिलेखों में हमारी जाति ‘ब्राह्मण’ या ‘ब्राह्मण(भूमिहार)’ या भूमिहार ब्राह्मण ही अंकित हो


• केन्द्रीय और प्रांतीय सभी अभिलेखों से भूमिहार शब्द हटाकर ब्राह्मण या ब्राह्मण(भूमिहार) ही लिखा और माना जाय


• आवश्यकता पड़ने पर सर्वदलीय सांसद-विधयाक-जनता समिति बनाकर जातीय एकता का प्रदर्शन करते हुए संविधान संशोधन कर इसे सुनिश्चित कराना चाहिए


• सामान्यतया भूमिहार ब्राह्मणों का बौद्धिक स्तर काफी ऊँचा है लेकिन समुचित सामाजिक विकास के लिए शिक्षा के स्तर को सुधारना आवश्यक है
मैं अंग्रेजी का अंध समर्थक नहीं हूँ लेकिन मेरा ७० वर्षों का अनुभव बताता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में “अंग्रेजी दा जवाब नहीं”!!! आज हमारे युवक अंग्रेजी सीखने के डर से हिंदी का गुणगान करते हैं
अंग्रेजी सीखकर अगर हिंदी का गुणगान करते तो कुछ और बात होती


• साधनहीन मेधावी बच्चों के शैक्षणिक विकास के लिए ग्राम, प्रखंड, जिला और राज्य स्तर पर उचित एवं समर्पित वित्तीय संगठन की आवश्यकता है
अधिवेशनों में यह प्रस्ताव तो आ जाता है लेकिन उसपर Follow Up या बाद में प्रगति कार्य नहीं किया जाता है
यह सुनिश्चित होना चाहिए
इसके बिना प्रस्ताव किसी काम का नहीं


• सदस्यता शुल्क – वित्तीय संगठन की स्थापना सदस्यता शुल्क के आधार पर होनी चाहिए
इसमें हरेक ग्राम से लेकर जिला स्तर के सभी स्वजातीय सदस्य बनने चाहिए जिसके लिए एक न्यूनतम शुल्क निर्धारित हो
अधिकतम की कोई सीमा नहीं हो


• विडंबना यह है कि समाज में जिसके पास धन है वे कुछ कर नहीं सकते और जो कुछ कर सकते हैं उनके पास धन नहीं है
अगर कुछ करना है तो दोनों के बीच सामंजस्य बैठाने की सख्त जरूरत है


• अभी तक हमारे समाज में ‘एक म्यान में दो तलवार’ नहीं रहने की संभावना व्याप्त है, सामाजिक सद्भाव और सहिष्णुता के समावेश से इसे बदला जा सकता है


• स्वजातीय एकता और सुरक्षा को ध्यान में रखकर कुछ संगठन बने तो सही लेकिन अंततः व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना ने इसे तार्किक परिणिति तक पहुंचने से रोक दिया
इस पर पुनर्विचार की जरूरत है


• एक ऐसी स्थायी कार्यकारिणी समिति बने जिसमे ग्रामीण, शिक्षित और दवंग आदि समाज के हर स्तर के लोग हों, ताकि लिए गए निर्णयों को सुचारू रूप से कार्यान्वित किया जा सके तथा इनकी उर्जा को भी सकारात्मक दिशा में प्रयोग किया जा सके और इन्हें महसूस हो कि सामाजिक उत्थान में इनकी भी नितांत आवश्यकता है


• आंतरिक द्वेष, इर्ष्या और कलह ने हमारे विकास के धार को कुंद कर दिया है, इसे आपसी सौहार्द्र और सामंजस्य से ठीक किया जा सकता है


• हमे भूमिहार ब्राह्मण की एक ऐसी Close Group Web Site बनानी चाहिए जिसपर समाज के सक्षम लोग जो नौकरियां दे सकते हैं अपनी Vacancy का विज्ञापन दें जिससे सिर्फ स्वजातीय ही आवेदन कर सकें
हाँ, योग्यता के सवाल पर कोई ढील नहीं दी जाय ताकि उनकी गुणवत्ता कायम रहे
लोगों में यह धारणा बनी रहे कि ‘अगर भूमिहार ब्राह्मण है तो काबिल ही होगा’
इससे कम से कम योग्य स्वजातीय युवकों को उचित नौकरी मिल सकेगी जो अन्यथा Corporate Sector के विज्ञापन से अनभिज्ञ रह जाते हैं


उपसंहार

हरेक इतिहासकार ने माना है कि भूमिहार ब्राह्मण अर्थात अयाचक ब्राह्मण एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगों को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया, उसके बाद सारस्वत, महियल, सरयूपारी, मैथिल ,चितपावन, कन्नड़ और केरल के नम्बूदरी आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए
मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए
‘इस तरह लोग मिलते गए और कारवां बनता गया’




इस जाति ने सत्ययुग से लेकर कलियुग तक किसी न किसी रूप में अपना स्तित्व और प्रभाव अक्षुण्ण रखा
अभी तक पचासों अखिल भारतीय भूमिहार सम्मलेन या भूमिहार महासभा या अखिल भारतीय त्यागी महासभा स्थापित कर और चितपावन, नम्बूदरी आदि ब्राह्मणों को इसका सभापतित्व देकर अयाचक ब्राह्मणों की एकता का परिचय दिया है
हालांकि महासभाओं में लिए गए निर्णयों/प्रस्तावों पर बाद में अग्रेत्तर करवाई या अमल नहीं किया गया
समृधि और सम्पन्नता के सुनहरे समय में गुमराही के दौर से गुजरने के बाद भी सुबह का भूला शाम को घर आने की क्षमता रखने वाली इस जाति के लिए अभी भी खोई प्रतिष्ठा प्राप्त करने की उम्मीद शेष है
इसमें सर्वाधिक आवश्यक है कठिन परिश्रम और मजबूत इरादे से जीवन के हर क्षेत्र में महारत हासिल करने की
सत्ययुग से ही अध्ययन या शिक्षा हमारी रक्तनलिका में प्रवाहित होती रही है
पूर्वजन्म के संस्कार और प्रारब्ध फलानुसार अल्प प्रयास से ही हम उसे वापिस प्राप्त कर सकते हैं
हमारे पास मानसिक शक्ति, बुद्धि, तर्क-शक्ति, दुर्धर्ष साहस और उछलकर वापस आने का अद्भुत कौशल है
जरूरत है इसे अपने व्यवहार में लाकर अपनी सफलता में परिवर्तित करने की


ले.कर्नल विद्या शर्मा (से.नि.)

Saturday, November 9, 2013

वत्स गोत्र – उद्भव एवं विकास का इतिहास

वत्स गोत्र – उद्भव एवं विकास का इतिहास

पौराणिक पृष्भूमि

“भ्रिगुं, पुलत्स्यं, पुलहं, क्रतुअंगिरिसं तथा

मरीचिं, दक्षमत्रिंच, वशिष्ठं चैव मानसान्” (विष्णु पुराण 5/7)

भ्रिगु, पुलत्स्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि तथा वशिष्ठ – इन नौ मानस पुत्रों को व्रह्मा ने प्रजा उत्पत्ति का कार्य भार सौंपा| कालान्तर में इनकी संख्या बढ़कर 26 तक हो गई और इसके बाद इनकी संख्या 56 हो गई| इन्हीं ऋषियों के नाम से गोत्र का प्रचलन हुआ और इनके वंशज अपने गोत्र ऋषि से संबद्ध हो गए|

हरेक गोत्र में प्रवर, गण और उनके वंशज(व्राह्मण) हुए| कुछ गोत्रों में सुयोग्य गोत्रानुयायी ऋषियों को भी गोत्र वर्धन का अधिकार दिया गया|

नौ मानस पुत्रों में सर्वश्रेष्ठ भृगु ऋषि गोत्रोत्पन्न वत्स ऋषि को अपने गोत्र नाम से प्रजा वर्धन का अधिकार प्राप्त हुआ| इनके मूल ऋषि भृगु रहे| इनके पांच प्रवर – भार्गव, च्यवन, आप्रवान, और्व और जमदग्नि हुए| मूल ऋषि होने के कारण भृगु ही इनके गण हुए| इनके वंशज(ब्राह्मण) शोनभद्र,(सोनभदरिया), बछ्गोतिया, बगौछिया, दोनवार, जलेवार, शमसेरिया, हथौरिया, गाणमिश्र, गगटिकैत और दनिसवार आदि भूमिहार ब्राह्मण हुए

लिखित साक्ष्य

छठी शदी ईशा पूर्व महाकवि वाणभट्ट रचित ‘हर्षचरितम्’ के प्रारंभ में महाकवि ने वत्स गोत्र का पौराणिक इतिहास साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया है| महाकवि वाणभट्ट के बारे में क्या कहना – “वाणोच्छिष्टम् जगत सर्वम्”| ‘वाण का छोड़ा हुआ जूठन ही समस्त जगत का साहित्य है’|
इस प्रचलित उक्ति से ही वाणभट्ट की विद्वता का पता चल जाता है| वाणभट्ट स्वयं वत्स गोत्रीय थे|

वाणभट्ट के अनुसार एक बार स्वर्ग की देव सभा में दुर्वासा ऋषि उपमन्यु ऋषि के साथ विवाद करते-करते क्रोधवश सामवेद गान करते हुए विस्वर गान (Out of Tune) गाने लगे| इसपर सरस्वती देवी हँस पड़ी| फिर क्या था; दुर्वासा ऋषि उनपर बरस पड़े और शाप दे डाला – ‘दुर्वुद्धे ! दुर्विद्ग्धे ! पापिनि ! जा, अपनी करनी का फल भोग, मर्त्यलोक में पतित होकर बस| स्वर्ग में तेरा स्थान नहीं|
इतना सुनकर सरस्वती देवी विलाप करने लगी| इसपर पितामह व्रह्मा ने दुर्वासा की बड़ी भर्त्सना की|
अनंतर अपनी मानसपुत्री सरस्वती पर द्रवीभूत होकर उससे कहा – ‘जा बेटी’ ! मर्त्यलोक में धैर्य धर कर जा, तेरी सखी सावित्री भी तेरे साथ वहाँ जायेगी| पुत्रमुख दर्शन तक ही तेरा यह शाप रहेगा, तदन्तर तू यहाँ वापस लौट आयेगी|

शापवश सरस्वती मर्त्यलोक में हिरण्यवाह नदी के पश्चिमी किनारे पर स्वर्ग से जा उतरी|
हिरण्यवाह को शोण नद भी कहते है जो आज कल सोन नदी के नाम से विख्यात हैं|
वहाँ की रमणीयता से मुग्ध हो वहीं पर्णकुटी बनाकर सावित्री के साथ रहने लगी|
इस प्रकार कुछ वर्ष व्यतीत हुए|


एक दिन कोलाहल सुन दोनों ने कुटिया के बाहर आकर देखा|
हजार सैनिकों के साथ एक अश्वारोही युवक उधर से गुजर रहा था|
सरस्वती के सौंदर्य पर वह राजकुमार मुग्ध हो गया और यही हालत सरस्वती की भी थी|
वह राजकुमार और कोई नहीं, महर्षि च्यवन और महाराज शर्यातपुत्री सुकन्या का पुत्र राजकुमार दधीच था|  च्यवनाश्रम शोण नदी के पश्चिमी तट पर दो कोश दूर था| दोनों के निरंतर मिलन स्वरूप प्रेमाग्नि इतनी प्रवल हुई कि दोनों ने गांधर्व विवाह कर लिया और पति-पत्नी रूप जीवन-यापन करने लगे|
जब घनिष्ठता और बढ़ी तो सरस्वती ने अपना परिचय दिया| सरस्वती एक वर्ष से ज्यादा दिन तक साथ रही| फलतः उसने एक पुत्र-रत्न जना| पुत्रमुखदर्शनोपरांत सरस्वती अपने पुत्र को सर्वगुणसंपन्नता का वरदान देकर स्वर्ग वापस लौट गयी| पत्नी वियोगाग्नि-दग्ध राजकुमार दधीचि ने वैराग्य धारण कर लिया| अपने पुत्र को स्वभ्राता-पत्नि अक्षमाला को पालन पोषण के लिए सौंप कर युवावस्था में ही तपश्चर्या के लिए च्यवन कानन में प्रवेश कर गए|

अक्षमाला भी गर्भवती थी| उसे भी एक पुत्र हुआ| सरस्वती के पुत्र का नाम सारस्वत पड़ा और अक्षमाला के पुत्र का नाम पड़ा “वत्स”| अक्षमाला ने अपना दूध पिलाकर दोनों बालकों का पुत्रवत पालन पोषण किया| एक ही माता के दुग्धपान से दोनों में सहोदर भ्रातृवत सम्बन्ध हो गया|
अपनी माता सरस्वती देवी के वरदान से सारस्वत सभी विद्याओं में निष्णात हो गए और इतनी क्षमता प्राप्त कर ली कि अपना पूरा ज्ञान, कौशल और सारी विद्याएँ अपने भाई वत्स के अंदर अंतर्निहित कर दी| परिणामस्वरूप वत्स भी सरस्वती देवी प्रदत्त सारी विद्याओं में निष्णात हो गए|
वत्स में सर्व विद्या अर्पण कर च्यावानाश्रम के पास ‘प्रीतिकूट’ नामक ग्राम में उन्हें बसाकर सारस्वत भी अपने पिता का अनुशरण कर च्यवन कानन में तपस्या करने चले गए|

युगोपरांत कलियुग आने पर वत्स वंश संभूत ऋषियों ने ‘वात्स्यायन’ उपाधि भी रखी|
वात्स्यायन ऋषि रचित ‘कामसूत्र’ जग प्रसिद्ध है|
वत्स वंश में बड़े-बड़े धीर-विज्ञ गृहमुनि जन्मे जो असाधारण विद्वता से पूर्ण थे|
ये किसी और ब्राह्मण की पंक्ति में बैठकर भोजन नहीं करते थे (विवर्जितः जनपंक्त्यः)|
अपना भोजन स्वयं पकाते थे (स्वयंपाकी)|
दान नहीं लेते थे, याचना नहीं करते थे (विधूताध्येषनाः)|
स्पष्टवादी तथा निर्भीक शास्त्रीय व्यवस्था देने के अधिकारी थे| कपट-कुटिलता, शेखी बघारना, छल-छद्म और डींग हांकने को वे निष्क्रिय पापाचार की श्रेणी में गिनते थे| निःष्णात विद्वान, कवि, वाग्मी और नृत्यगीतवाद्य आदि सभी ललित कलाओं में निपुण थे|

कालक्रमेण कलियुग के आने पर वत्स-कुल में कुबेर नामक तपस्वी विद्वान पैदा हुए जिनकी चरणकमलवंदना तत्कालीन गुप्तवंशीय नृपगण करते नहीं अघाते थे :-

“बभूव वात्स्यायन वंश सम्भ्वोद्विजो जगद्गीतगुणोग्रणी सताम|
अनेक गुप्ताचित पादपंकजः कुबेरनामांश इवस्वयंबभूवः||” (कादम्बरी)

कुबेर के चार पुत्र – अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत हुए| पाशुपत को एक पुत्र अर्थपति हुए जो बड़े महात्मा और ब्राह्मणों में अग्रगण्य थे| अर्थपति के एकादश पुत्र भृगु,हंस, शुचि आदि हुए जिनमे अष्टम थे चित्रभानु| इसी भाग्यवान चित्रभानु ने राजदेवी नामधन्य अपनी ब्राह्मण धर्मपत्नी के गर्भ से पाया एक पुत्र रत्न जिसका नाम था वाण जिसने वात्स्यायन से बदलकर भट्ट उपाधि रखी और वाणभट्ट बन गए| वाणभट्ट की युवावस्था उछ्रिंखलता, चपलता और इत्वरता (घुमक्कड़ी) से भरी थी|
अंततः वर्षों बाद अपनी जन्मस्थली प्रीतिकूट ग्राम लौट आये| कालक्रम से महाराजा हर्षदेव से संपर्क में आने के बाद उन्होंने ‘हर्षचरित’ की रचना की|

वत्स/वात्स्यायन गोत्र का भौगोलिक स्थान

600 वर्ष ई.पू. जो पौराणिक भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण विभाजन रेखा है, में वत्स प्रदेश अतिमहत्वपूर्ण 16 महाजनपदों में से एक था जो नीचे दिये गए मानचित्र में अच्छी तरह प्रदर्शित है|
वत्स साम्राज्य गंगा यमुना के संगम पर इलाहबाद से दक्षिण-पश्चिम दिशा में बसा था जिसकी राजधानी कौशाम्बी थी| पाली भाषा में वत्स को ‘वंश’ और तत्सामयिक अर्धमगधी भाषा में ‘वच्छ’ कहा जाता था| यह अर्धमगधी का ही प्रभाव है कि ‘वत्स गोत्रीय’ भूमिहार ब्राह्मण अनंतर में ‘वछगोतिया’ कहलाने लगे| छठी शताब्दी ई.पू. के सीमांकन के अनुसार वत्स जनपद के उत्तर में कोसल, दक्षिण में अवंती, पूरब में काशी और मगध, तथा पश्चिम में मत्स्य प्रदेश था|


बिहार में वत्स गोत्र का इतिहास/स्थान

कालक्रम से वत्स गोत्र का केंद्रीकरण मगध प्रदेश में शोनभद्र के च्यवनाश्रम के चतुर्दिक हो गया क्योंकि इसका प्रादुर्भाव च्यवनकुमार दधीच से जुड़ा हुआ था| मगध प्रदेश में काशी के पूरब और उत्तर से पाटलीपुत्र पर्यंत अंग प्रदेश से पश्चिम तक वत्स गोत्रीय समाज का विस्तार था| सम्प्रति वत्स गोत्र उत्तर प्रदेश के शोनभद्र से लेकर गाजीपुर तक तथा गया-औरंगाबाद में सोन नदी के किनारे से लेकर पटना, हजारीबाग, मुजफ्फरपुर-सीतामढ़ी-गोरखपुर तक फैला हुआ है|
पुरातन कालीन ‘प्रीतिकूट’ ग्राम आज का ‘पीरू’ गांव सिद्ध हो चुका है, (माधुरी पत्रिका 1932 का अंक) जो हिंदू समाज से उपेक्षित हो अपने दुर्भाग्य पर रो रहा है क्योंकि तत्कालीन प्रीतिकूट आज का ‘पीरू बनतारा’ है|
यह प्राचीन च्यवनाश्रम से पश्चिम करीब चार मील की दूरी पर स्थित है| इसके पास ही 6 मील पूरब बनतारा गांव अवस्थित है| कालक्रम से प्रीतिकूट ‘पीयरू’ और तदन्तर ‘पीरू’ बन गया| च्यवनाश्रम के चतुर्दिक वात्स्यायन ब्राह्मण (वछ्गोतिया, सोनभदरिया) के गांव बहुसंख्यक रूप में पाए जाते हैं|
शोन तटवासी होने के कारण ये सोनभद्र/सोनभदरिया कहलाते हैं|
इस्लामीकरण का इतिहास

मुस्लमान बादशाह खासकर हिंदुओं को जबरदस्ती इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दो तरीके अपनाते थे|
एक किसी जुर्म की सजा के बदले और दूसरा जजिया टैक्स नहीं देने के का| जजिया का अर्थ फिरौती Extortion Money रंगदारी, हफ्ता या poll tax है जो गैर मुस्लिमों से उनकी सुरक्षा के बहाने से लिया जाता है| यह प्रथा अभी भी पाकिस्तान में खासकर हिंदुओं के खिलाफ प्रचलित है| पिछले वर्ष अनेक हिंदुओं को इसलिए मार दिया गया क्योंकि वे अपनी गरीबी के कारण जजिया कर देने में असमर्थ थे| जिन लोगों पर जजिया का नियम लागू होता है उनको जिम्मी “कहा जाता है|
अर्थात सभी गैर मुस्लिम जिम्मी है जजिया की कोई दर निश्चित नहीं की गई थी ताकि मुसलमान मनमाना जजिया वसूल कर सकें| प्रोफेट मुहम्मद ने जजिया टैक्स को कुरान में भी लिखवा दिया ताकि मुस्लमान बादशाह इसे धार्मिक मान्यता के अधीन वसूल कर सके|
बादशाहों ने इस टैक्स से अपना घर भरना, और नहीं देने पर लोगों को मुसलमान बनने पर मजबूर करना शुरू कर दिया|
मुहम्मद की मौत के बाद भी मुस्लिम बादशाहों ने यही नीति अपनाई|
जजिया के धन से गैर मुसलमानों को सुरक्षा प्रदान करना मकसद था लेकिन मुसलमान बदशाह उस धन को अपने निजी कामों, जैसे अपनी शादियों, हथियार खरीदने, और दावतें करने और ऐश मौज करने में खर्च किया करता था| बीमार, गरीब, और स्त्रियों को भी नहीं छोड़ते थे और जो जजिया नहीं दे सकता था उसकी औरतें उठा लेते थे| यहांतक क़त्ल भी कर देते थे| जजिया तो एक बहाना था|
मुहम्मद लोगों को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर करना चाहता था जैसा मुसलमानों ने भारत में किया| औरंगजेब के शासनकाल में पीरू बनतारा आदि गाँवों के वछ्गोतिया ब्राह्मण का 1700-1712 के बीच इस्लामीकरण इसी परिप्रेक्ष्य में हुआ| पीरू के पठान एक समय बम्भई ग्रामवासियों के नजदीकी गोतिया माने जाते थे जिसका साक्ष्य आज भी किसी न किसी रूप में उपलब्ध है|
बम्भई और पीरू के बीच तो भाईचारा (भयियारो) अभी तक चल रहा है|
विवाह में शाकद्वीपीय ब्राह्मण पुरोहित भी आशीर्वाद देने और दक्षिणा लेने जाते हैं और उन्हें वार्षिक वृति भी मिलती है और विवाह में पांच सैकड़ा नेग भी|
औरंगजेब की मृत्यु (1707) तक और बहादुर शाह के जजिया टैक्स देने के फरमान पर केयालगढ़पति ज़मींदार वछ्गोतिया/सोनभदरिया भूमिहार ब्राह्मण अड़ गए|
यह समझा जा सकता हैं कि जजिया कर नहीं देने का निश्चय कितना साहसी और खतरनाक निर्णय था| यह सरकार के खिलाफ बगावत थी जो इने-गिने जान जोखिम में डालने वाले लोग ही कर सकते थे| इस बगावत के चलते केयालगढ़ को ध्वस्त कर दिया गया और बागियों को पिघलते लाह में साटकर मार दिया गया| जबरन लोगों को मुसलमान बनाना शुरू कर दिया गया|
केयालगढ़ी पूर्वज कमलनयन सिंह ने बाकी परिवार को धर्म परिवर्तन से बचाने के लिए एक योजना बनाई| उन्होंने निश्चय किया कि वे धर्म परिवर्तन कर लेंगे और अपनी जमींदारी परिवार के लोगों में बाँट देंगे ताकि वे हिंदू बने रहें| इस योजनानुसार अपने भाई के साथ दिल्ली गए और धर्म बदलकर एक भाई मुस्लिम शाहजादी से शादी कर दिल्ली में ही रह गए|

कमलनयन सिंह उर्फ अबुल नसीर खान धर्म परिवर्तन के बाद वापस लौट जमींदारी बाकी परिवार में बांटकर डिहरी गांव अपनी बहन को खोइंछा में देकर जिंदगीभर बम्भई में ही रहे| उनके चचेरे भाईओं नें उन्हें जिंदगी भर अपने साथ ही रखा| वहाँ एक कुआँ भी बनवाया| उनकी कब्र बाबू राम कृष्ण सिंह के हाते में अभी भी दृष्टिगोचर होती है जहां कृतज्ञतावश सब वछ्गोतिया परिवार अभी भी पूजते हैं|
उनके दो लड़के हुए – नजाकत चौधरी और मुबारक चौधरी| उनलोगों को धोबनी मौजा मिला|
लेकिन बेलहरा के जमींदार ब्राह्मण यशवंत सिंह के बहुत उपद्रव करने पर उनके चचेरे भाईओं ने कहा कि तब आप पुरानी डीह प्रीतपुर में जो चिरागी महल है, जाकर बस जाईये| नजाकत चौधरी प्रीतपुर में पुराने गढ़ पर और मुबारक चौधरी बनतारा में जा बसे| वहाँ उनके स्मारक की पूजा लोग अभी तक करते हैं| जब लोग अमझर के पीर को पूजने लगे तब प्रीतपुर का नाम बदलकर ‘कमलनयन-अबुलनसीरपुर पीरु’ रख दिया गया| खतियान में अभी भी यही चला आ रहा है| धीरे-धीरे लोग प्रीतपुर नाम को भूलते गए और पीरू का नाम प्रचलित हो गया| चूंकि पीरू और बनतारा दोनों में में एक ही बाप के दो बेटों की औलादें बस रही हैं इसलिए दोनों गांवों को एक ही साथ बोलते हैं ‘पीरू बनतारा'|
वत्स गोत्रीय/वात्स्यायनों के मुख्य दो ही गढ़ थे – केयालगढ़ और नोनारगढ़
कारण पता नहीं लेकिन नोनारगढ़ी सोनभदरिया/बछ्गोतिया ब्राह्मण अपने को केयालगढ़ी से श्रेष्ठ मानते हैं| ये दोनों गढ़ भी आजकल ध्वंसावशेष रूप में च्यवनाश्रम (देकुड़/देवकुंड/देवकुल)के आस-पास ही दो तीन कोस की दूरी पर हैं|

सोनभदरिया वत्स गोत्रीय लोगों के पूर्वजों के ही दो-दो देवमंदिर – देव का सूर्यमंदिर और देवकुल का शिवमंदिर देश में विख्यात हैं| देव के मंदिर के सरदार पंडा अभी तक सोनभदरिया/बछ्गोतिया ही होते चले आ रहे हैं|
शोनभद्र नदी के किनारे बसे रहने वाले वत्स गोत्रीय भूमिहार शोनभद्र (सोनभदरिया) कहलाये और अर्धमगधी भाषाभासी वत्सगोत्रीय बछगोतिया बगौछिया, दोनवार, जलेवार, शमसेरिया, हथौरिया, गाणमिश्र, गगटिकैत और दनिसवार आदि भूमिहार ब्राह्मण कहलाये लेकिन दोनों का मूल उद्गम स्थल केयालगढ़ या नोनारगढ़ ही था|
वत्स प्रतिज्ञा

जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, वत्स अपने वादे और वचनबद्धता के लिए विख्यात थे|
अपनी वचनबद्धता कायम रहे इसके लिए सुविख्यात वत्स सम्राट ‘आदर्श द्वितीय’ ने “वत्स-प्रतिज्ञा” कि प्रथा आरंभ की थी| यह एक शपथ के रूप में ली जाती थी| वत्स महाजनपद के ह्रास के साथ ही वत्स प्रतिज्ञा संस्कृति का भी ह्रास हो गया|

आदित्य तृतीय की पहली लिखित प्रतिज्ञा निम्नलिखित है:-

“आर्य जातीय वत्स गोत्रोत्पन्न मै ‘आदित्य त्रितीय’ 206वीं शपथ लेता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु तक प्रजा की रक्षा तबतक करूँगा जबतक मेरे कुल-गोत्र की सुरक्षा प्रभावित न हो”|
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि वत्स गोत्र में अपने कुल-गोत्र की रक्षा की भावना सर्वोपरी थी|

अन्य प्रान्तों में वत्स गोत्रीय समुदायों की उपाधियाँ

• बालिगा

• भागवत

• भैरव

• भट्ट

• दाबोलकर

• गांगल

• गार्गेकर

• घाग्रेकर

• घाटे

• गोरे

• गोवित्रिकर

• हरे

• हीरे

• होले

• जोशी

• काकेत्कर

• काले

• मल्शे

• मल्ल्या

• महालक्ष्मी

• नागेश

• सखदेव

• शिनॉय

• सोहोनी

• सोवानी

• सुग्वेलकर

• गादे

• रामनाथ

• शंथेरी

• कामाक्षी

600वीं शदी ई.पू. के सोलह महाजनपद

हालाँकि 600वीं शदी ई.पू. के जनपदों कि संख्या अठारह थी परन्तु महाजनपदों में निम्नलिखित सोलह की ही गणना होती थी (चेति और सूरसेन महाजनपद की श्रेणी में नहीं थे) :-

1. अंग

2. कौशल

3. मल्ल

4. काशी

5. वत्स

6. मगध

7. विज्जी

8. विदेह

9. कुरु

10. पांचाल

11. मत्स्य

12. अस्मक

13. अवंती

14. कुंतल

15. गांधार

16. कम्बोज

अन्य जातियों में वत्स गोत्र

हालांकि ब्राह्मणों (भूमिहार ब्राह्मण सम्मिलित) के अलावा अन्य जातियों में गोत्र प्रथा अनिवार्य नहीं है फिर भी कतिपय प्रमुख जातियों में गोत्र परंपरा देखी जाती है इनके गोत्र, 'गोत्र-ऋषि उत्पन्न' नहीं वल्कि गोत्र-आश्रम आधारित हैं अर्थात जिस ऋषि आश्रम में वे संलग्न रहे उन्होंने उसी ऋषि-गोत्र को अपना लिया|
इसी सिद्धांत पर कुछ क्षत्रिय परिवारों में वत्स गोत्र पाया जाता है| यही सिद्धांत अन्य कुछ जातियों में भी प्रचलित है| इस तरह वत्स गोत्र अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित एवं फलित हो दिन-दूनी और रात-चौगुनी विकास पथ पर अग्रसर होता चला जा रहा है|
मै एक विनीत वत्स गोत्रीय सोनभद्रीय सदस्य इसके सतत उत्तरोत्तर उन्नति की कामना करता हूँ|
ईश्वर हमें सद्बुधि दे और सदा सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे|
"तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय"
ईश्वर हमें अंधकार(अज्ञान) से प्रकाश(ज्ञान) की ओर एवं असत्य से सत्य की ओर ले चले|
ले.कर्नल विद्या शर्मा, (से.नि)





















Friday, January 4, 2013

समृद्धि के बीच विकास की बाट जोहता ग्राम गुलजाना...







गुलजाना गांव की पाती....

1. गुलजाना ग्राम भौगोलिक दृष्टि से इस धरा पर 240 57’43” डिग्री N अक्षांश तथा 84054’09” डिग्री E देशांतर पर अवस्थित है| समुद्र तल (Mean Sea Level)से इसकी ऊंचाई 92 मीटर है| जिला मुख्यालय गया शहर से 32 कि.मी उत्तर–पश्चिम दिशा में, प्रखंड एवं अनुमंडल शहर टिकारी से 6.5 कि.मी पूरब तथा बिहार प्रान्त की राजधानी पटना से 85 कि.मी. दक्षिण, पटना– गया रेलवे लाइन पर बेलागंज रेलवे स्टेशन से 8 कि.मी पश्चिम, बेलागंज – टिकारी रोड पर अवस्थित है|


2. गुलजाना उत्तर मे ग्राम भवनपुर, पूरब में ग्राम सिन्दानी तथा ग्राम बेलाढ़ी, दक्षिण में ग्राम मुस्सी और ग्राम पूरा एवं पश्चिम में ग्राम अलालपुर से घिरा है| गुलजाना को, सटे पूरब से बुढ़नदी तथा दक्षिण और पश्चिम से दरधा नदी अपने बाहुपाश में आलिंगित किये है जो एक दैविक वरदान ही है|
इतना ही नहीं, गुलजाना को सटे उत्तर-पूरब से पश्चिम की तरफ बेलागंज-टिकारी सड़क का प्राकृतिक वरदान भी प्राप्त है| ऐसा है हमारा सुन्दर, सुरम्य, मनोरम एवं यातायात सुलभ ग्राम गुलजाना!!!


3. गुलजाना का प्रशासनिक नियंत्रण गया जिला, टिकारी अनुमंडल, प्रखंड एवं थाना तथा पूरा पंचायत और अर्क ढिबरिया डाक घर के अधीन आता है| गुलजाना का सर्वे (Cadastral Map) संख्या 124 है तथा राजस्व हलका सं 5 है| अतः गुलजाना एक स्वतंत्र राजस्व ग्राम है| वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव के अनुसार गुलजाना टिकारी विधानसभा क्षेत्र सं 231 के अंतर्गत बूथ सं 253 में आता है| कुल मतदाताओं की संख्या 649, भूमिहार मतदाताओं की सं 335, कुल गृहों की सं 163 तथा भूमिहार गृहों की सं 71 है|
कुल पुरुष मतदाता 353 और महिला मतदाता 296 हैं, यद्यपि बाहर रहने वाले सभी गुलजाना बासियों को जोड़ने पर इसकी जनसँख्या 1487 के करीब हो जाती है|


4. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है, “गुलजाना” एक उर्दू शव्द है जिसका अर्थ है ‘फूल सा प्यारा” तथा गुलजाना का एक और अर्थ है “पुष्प-जनित”(Born out of flowers)| पुराने सर्वे नक़्शे में “गुलजाना” का नाम “गुल्जना” भी देखा जा सकता है जिसका अर्थ “पुष्प-जनित” ही है| गुलजाना के कुछ घरों और बाध-बधार के कुछ नामों से भी भी पता चलता है कि इस गाँव में मुस्लिम आबादी थी, उदाहरणार्थ –‘साईं घर’,“रोज़ा पर’’ आदि| गाँव से सटे पईन के पूरब और रोज़ा पर से सटे पश्चिमोत्तर के खाली गड्ढे में मुस्लिम कब्रिस्तान के लक्षण पाए गए थे जो इस बात को सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि गुलजाना में मुस्लिम आबादी थी|


5. तीस के दशक से ही भारतीय स्वतंत्रता की उत्तरोत्तर बढ़ती आगमन ध्वनि, तदोपर मुहम्मद अली जिन्नाह का भारतीय मुसलमानों को स्वतंत्र भारत के परिप्रेक्ष में भयाक्रांत करना तथा कुछ मुसलमानों का सिर्फ अपने बिरादरी में रहने की इच्छा जैसे कुछ ऐसे सवाल थे जिससे कुछ मुसलमान गांवों से अपनी ज़मीं-जायदाद समेट कर या तो मुस्लिम बहुल गांवों में रहने चले गए या सरो-सामान बांधे अवश्यम्भावी पाकिस्तान को रुख किये बेसब्री से इंतज़ार करने लगे| गुलजाना भी इस सिद्धांत का अपवाद नहीं था| यहाँ के मुसलमान भी खरामा-खरामा अपनी जायदाद राज़ी-खुशी से समेट कर हरे भरे मैदान (Greener Pastures) के रुख हो लिए| हाँ, यह अलग चिंतन का विषय है कि क्या वे आज पाकिस्तान या बंगलादेश में अपनी हिन्दुस्तानी बिरादरी के बनिस्पत ज्यादा स्वन्त्रत और खुशहाल हैं?

6. सिन्दानी जैसे मुस्लिम बहुल गांवों से भी अपनी जायदाद गुलजाना के भूमिहारों को बेच कर मुसलमानों का प्रयाण दो बातें सिद्ध करती हैं| एक तो यह कि उन्होंने भवनपुर, मुस्सी और पूरा के भूमिहारों के मुकाबले गुलजाना के भूमिहारों को ज़मीनें बेचना पसंद किया| यह सिर्फ तभी संभव है जब गुलजाना में हिंदू-मुस्लिम सम्बन्ध बहुत स्नेहपूर्ण रहा हो| दूसरा यह कि उन गांवों में भूमिहार पहले से बसे हों और ज़मीन की भूख और ज़रूरत उन्हें गुलजाना के मुकाबले कम हो| गुलजाना में भूमिहार, कायस्थ, बढ़ई, तेली, यादव, दुसाध (पासवान),मुसहर और डोम जाति के लोग सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहते हैं|

शैक्षणिक एवं आर्थिक विकास

7. 649 मतदाता वाला छोटा ग्राम होते हुए भी गुलजाना ने शिक्षा के क्षेत्र में अविश्वसनीय उपलब्धि कायम की है| इसने 11 राजपत्रित पदाधिकारी (जिसमे 1 आई.ए.एस, 2 सेना के पिता पुत्र ले.कर्नल, और 8 इंजिनियर आदि अन्य अफसर), 3 आईआईटियन मिलाकर 30 अन्य इंजीनियर, 1 डाक्टर, 4 एल.एल.बी, 7 एम.बी.ए, 8 मर्चेन्ट नेवी अफसर, 9 होटेल मैनेजर, 2 लेक्चरर, 6 एम.ए और 120 स्नातक पैदा कर एक आदर्श उपस्थित किया है| इस उपलब्धि में हर वर्ण के लोगों का हाथ है| इस ग्राम ने इतने इंजिनियर पैदा किये हैं जितना शायद कुल मिलाकर एक जिला मुख्यालय में होते हों!!!

राजकीय सहायता और विकास

8. आज़ादी के बाद आज के सुशासन सरकार को मिलाकर सरकारी संरचनाओं का विकास गुलजाना में नगण्य सा है| विकास के नाम पर गुलजाना के दरधा और बुढ़नदी पर बनने वाला पुल पिछले सात वर्षों से सरकारी अक्रमण्यता के चलते विकास रूपी धराशायी भीष्म के वक्ष में चुभे अर्जुन के तीर सा लटका ग्रामवासियों के वक्ष में चुभ रहा है| पुल निर्माण दिसंबर 2008 में पूरा हो जाना था| अगले चुनाव की पृष्ठभूमि में जल्दी काम पूरा करने की घोषणा वाली नींद की गोली हाल ही में मंत्री और स्थनीय विधायक द्वारा दी जा चुकी है ताकि चुनाव तक जनता निद्रावस्था कि आत्ममुग्धताकि स्थिति में पड़ी रहे| सिंचाई सुविधा के नाम पर दर्धा नदी पर एक चार फीट ऊँचा बांध बनाया गया है जिसका पहला लाभुक गुलजाना गांव है लेकिन ‘अति विशेषज्ञ’ लघु सिंचाई विभाग के अभियंताओं की विलक्षण सर्वेक्षण योग्यता के चलते गुलजाना के खेतों की उंचाई बांध की उंचाई से ज्यादा है| योजना फिर भी स्वीकृत हुई और कार्य संपन्न हुआ| जन निधि का ऐसा समुचित उपयोग(या उपभोग) सुनने को कहाँ मिलता है? आखिर किसी की जवाबदेही तो तय होनी चाहिए थी| मामला मुख्य मंत्री दरबार तक भी पहुंचा था लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज कहाँ सुनाई पड़ती है(Regn No 00000-1904100005)
जुलाई से नवम्बर तक यह गांव अपने प्रखंड टिकारी से कटा रहता है और पदाधिकारियों को चार महीने तक विकास कार्य नहीं करने का प्राकृतिक बहाना भी मिल जाता है| इस गांव का दुर्भाग्य ही कहा जायगा कि आजतक किसी भी सरकारी पदाधिकारी का पदार्पण(डी.एम.,एस.डी.ओ या बी.डी.ओ) इस ग्राम में विकास कार्य के लिए नहीं हुआ है, हालाँकि सुना जाता है कि “सरकार आपके द्वार” सरीखा जनाकर्षक कार्यक्रम मीडिया में बहु-प्रचारित है और राजधानी पटना के गलियारों में इस गांव का भी समुचित विकास हो ही रहा होगा| जिला स्तर का कोई भी उच्च अधिकारी अगर इस ग्राम में आ जाए तो तमाम सरकारी विकास योजनाओं की पोल खुल जाए| भानुमती का पिटारा खोले तो कौन???
9. यह एक अत्यंत दुर्भाग्य और आश्चर्य की ही बात है की बेला-टिकारी पथ पर होने के बावजूद भी इस गांव में पहुँच पथ नहीं है| अगर आम जनता चाहे तो कोई भी सरकारी व्यक्ति/वाहन पथ के अभाव में निजी भूमि से इस गांव में नहीं पहुँचने दे सकता लेकिन प्रशासन के कान में शायद अभी भी तेल ताजा है|


गुलजाना ग्राम की समग्र जानकारी के लिए www.guljana.weebly.com और www.guljanablogspot.com देखें
(ले.कर्नल विद्या शर्मा, से.नि)

Wednesday, September 21, 2011

Tekari Speaks....

Wednesday, August 31, 2011TEKARI…ONCE UPON A TIME…IN BIHAR…


A comprehensive book on Tekari Raj titled “TEKARI…ONCE UPON A TIME…IN BIHAR…” is ready for our esteemed readers of local history influencing the national scenario of the Mughal period. Right from Mughal emperor Shah Alam to Aliwardy Khan Mahabbat Jung, all paid rich tributes to some of the warrior kings of Tekari Raj in the eighteenth and nineteenth century.

The book lucidly deals with the rise and fall of the Tekari Raj encompassing the topics enumerated below:-

Introduction and Background
Bir/Dheer Singh
Founding of Tekari Raj
Tribhuwan Singh
Sunder Singh
Sunder Singh Vs Maharana Pratap and Shiva Ji – a comparison Fateh Singh
Pitambar Singh and Benares Estate
Buniad Singh
Mitrajit Singh
Nine Annas – Hit Narain Singh
Maharani Rajrup Kuer Marriages and Progeny of Gopal Sharan
Rani Bhuwaneshwari Kuer
Maksudpur Estate Raja Ajai Singh Chandreshwar Pd Narain Singh and others
“They Also Serve Who Stand and Wait”
Genealogical Chart/Table of Tekari Raj
Description of Tekari Fort
Administration of Tekari Estate
Anecdotes and Reminiscence

Interested readers and lovers of local history may contact the author on the following email :-

vidyashar@gmail.com

Wednesday, August 31, 2011

TEKARI HISTORY - A BOOK READY TO HIT THE STALL.


A comprehensive book on Tekari Raj titled “TEKARI…ONCE UPON A TIME…IN BIHAR…” is ready for our esteemed readers of local history influencing the national scenario of the Mughal period. Right from Mughal emperor Shah Alam to Aliwardy Khan Mahabbat Jung, all paid rich tributes to some of the warrior kings of Tekari Raj in the eighteenth and nineteenth century.

The book lucidly deals with the rise and fall of the Tekari Raj encompassing the topics enumerated below:-

Introduction and Background
Bir/Dheer Singh
Founding of Tekari Raj
Tribhuwan Singh
Sunder Singh
Sunder Singh Vs Maharana Pratap and Shiva Ji – a comparison Fateh Singh
Pitambar Singh and Benares Estate
Buniad Singh
Mitrajit Singh
Nine Annas – Hit Narain Singh
Maharani Rajrup Kuer Marriages and Progeny of Gopal Sharan
Rani Bhuwaneshwari Kuer
Maksudpur Estate Raja Ajai Singh Chandreshwar Pd Narain Singh and others
“They Also Serve Who Stand and Wait”
Genealogical Chart/Table of Tekari Raj
Description of Tekari Fort
Administration of Tekari Estate
Anecdotes and Reminiscence

Interested readers and lovers of local history may contact the author on the following email :-

vidyashar@gmail.com

Thursday, January 27, 2011

गुलजाना – एक गाँव की वृद्धि एवं विकास यात्रा



गुलजाना – एक गाँव की वृद्धि एवं विकास यात्रा

“ यह लेखन वास्तविक सन्दर्भों, ऐतिहासिक तथ्यों, व्यक्तिगत अनुभवों, श्रुतिओं, पारिवारिक स्वीकारोक्तियों/विवरणों, एवं ग्राम प्रचलित किम्वदंतियों का अविच्छिन्न यौगिक मिश्रण है| इसमें लेखक का कार्य निष्पक्षता पूर्वक आधे-अधूरे तथ्यों को जोड़कर सामंजस्य स्थापित करना व रुचिकर पूर्णता प्रदान कर पाठकों तक पहुँचाना मात्र भर है| किसी व्यक्ति विशेष, परिवार, या पारिवारिक समुदाय की निंदा, अवहेलना या प्रशंशा करना लेखक का उद्धेश्य कतई नहीं है| अगर प्रसंगवश ऐसा प्रतीत होता है तो पारिवारिक स्वीकारोक्तियों के आलोक में लेखक इसके लिए उत्तरदायी नहीं है| ”

भूमिका

1. सामान्यतः यह देखा जाता है कि गाँवों में ग्राम वासियों के बसने का समेकित एवं परिपूर्ण रिकॉर्ड रखने तथा इतिहास संजोने कि कोई भी रीति या परंपरा नहीं है| कभी-कभी तो ऐसी स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है कि कुछ लोगों को अपने निकटतम पूर्वजों (प्रपितामह आदि) के नाम तथा अपने उद्गम स्थान अदि का भी पता नहीं होता| मैं इसी चिंतन में डूबा था कि मेरी अंतरात्मा ने मुझे झकझोरा कि अब समय आ गया है कि मैं गुलजाना ग्रामवासियों का रिकॉर्ड तैयार करूँ जिसमें किस परिवार के मुखिया (परम पुरातन पुरुष) का, किस गाँव या स्थान से, किस कारण से और किस परिस्थिति में यहाँ पदार्पण हुआ और तदुपरांत उनकी वंशावली किस तरह विकसित हुई तथा गुलजाना के उत्थान में उनका क्या योगदान रहा, इत्यादि तथ्यों का पूरा-पूरा विवरण समाहित कर सकूँ और आज के इस सूचना-सहयोगी दुनिया (IT Savvy world) में इसे वेब साईट पर प्रकाशित कर दूं ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ बिना किसी की मदद के गुलजाना ग्राम के भूत एवं वर्तमान के बारे में न केवल पूरी जानकारी रखें बल्कि ग्रामवासियों को भी कुछ बता सके| यह बहुत सुखद अनुभूति का विषय है की हमारे समकालीन और हमारी संततियां मेट्रो की सीमा फांद कर विदेशों में कार्यरत है| मेरा यह प्रयास खासकर इनकी और इनकी संतानों के लिए तब–तब काफी मददगार साबित होगा जब-जब उनका रुख गुलजाना की तरफ मुखातिब होगा या जब भी वे अपनी माटी की गंध लेना चाहेंगे| गूगल की मदद से गुलजाना का एक नक्शा भी इसके साथ वेब साईट पर प्रकाशित कर रहा हूँ जिसमे गाँव से सटे कुछ स्थानों के नाम के साथ-साथ कुछ घरों को भी दिखा रहा हूँ ताकि हरेक आदमी को अपना घर ढूंढने में सहूलि़यत हो सके|

भौगोलिक स्थिति

2. गुलजाना ग्राम भौगोलिक दृष्टि से इस धरा पर 240 57’43” डिग्री N अक्षांश तथा 84054’09” डिग्री E देशांतर पर अवस्थित है| समुद्र तल (Mean sea level) से इसकी ऊंचाई 92 मीटर है| जिला मुख्यालय गया शहर से 32 कि.मी उत्तर–पश्चिम दिशा में, प्रखंड एवं अनुमंडल शहर टिकारी से 6.5 कि.मी पूरब तथा बिहार प्रान्त की राजधानी पटना से 85 कि.मी. दक्षिण, पटना – गया रेलवे लाइन पर बेलागंज रेलवे स्टेशन से 8 कि.मी पश्चिम, बेलागंज – टिकारी रोड पर अवस्थित है|

चौहद्दी

3. गुलजाना उत्तर मे ग्राम भवनपुर, पूरब में ग्राम सिन्दानी तथा ग्राम बेलाढ़ी, दक्षिण में ग्राम मुस्सी और ग्राम पूरा एवं पश्चिम में ग्राम अलालपुर से घिरा है| गुलजाना को, सटे पूरब से बुढ़नदी तथा दक्षिण और पश्चिम से दरधा नदी अपने बाहुपाश में आलिंगित किये है जो एक दैविक वरदान ही है| इतना ही नहीं, गुलजाना को सटे उत्तर-पूरब से पश्चिम कि तरफ बेलागंज-टिकारी सड़क का प्राकृतिक वरदान भी प्राप्त है| ऐसा है हमारा सुन्दर, सुरम्य, मनोरम एवं यातायात सुलभ ग्राम गुलजाना|

प्रशासनिक नियंत्रण

4. गुलजाना का प्रशासनिक नियंत्रण गया जिला, टिकारी अनुमंडल (Sub Division), प्रखंड एवं थाना तथा पूरा पंचायत और अर्क ढिबरिया डाक घर के अधीन आता है| गुलजाना का सर्वे (Cadastral Map) संख्या 124 है तथा राजस्व हलका सं 5 है| अतः गुलजाना एक स्वतंत्र राजस्व ग्राम है| वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव के अनुसार गुलजाना टिकारी विधानसभा क्षेत्र सं 231 के अंतर्गत बूथ सं 253 में आता है| कुल मतदाताओं की संख्या 649,कुल पुरुष मतदाता 353 और महिला मतदाता 296 हैं| भूमिहार मतदाताओं की सं 335,कुल गृहों की सं 163 तथा भूमिहार गृहों की सं 71 है| समस्त बाल-वर्ग एवं बाहर नौकरी करने वालों को मिलाकर गुलजाना कि कुल जनसँख्या 1487 है|

गुलजाना का इतिहास

5. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है, “गुलजाना” एक उर्दू शव्द है जिसका अर्थ है ‘फूल कि तरह प्यारा” तथा गुलजाना का एक और अर्थ है “पुष्प-जनित”(Born out of flowers)| पुराने सर्वे नक़्शे में “गुलजाना” का नाम “गुल्जना” भी देखा जा सकता है जिसका अर्थ “पुष्प-जनित” ही है| गुलजाना के कुछ घरों और बाध-बधार के कुछ नामों से भी भी पता चलता है कि इस गाँव में मुस्लिम आबादी थी, उदाहरणार्थ –‘साईं घर’,“रोज़ा पर’’ आदि| गाँव से सटे पईन के पूरब और रोज़ा पर से सटे पश्चिमोत्तर के खाली गड्ढे में मुस्लिम कब्रिस्तान के लक्षण पाए गए हैं जो इस बात को सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि गुलजाना में मुस्लिम आबादी थी| आगे आने वाले कुछ सन्दर्भों से भी इस गाँव में मुस्लिम आबादी सिद्ध होती है|


मुस्लिम आबादी का ह्रास
जिन्नाह का प्रभाव


6. तीस के दशक से ही भारतीय स्वतंत्रता की उत्तरोत्तर बढ़ती आगमन ध्वनि, तदोपर मुहम्मद अली जिन्नाह का भारतीय मुसलमानों को स्वतंत्र भारत के परिप्रेक्ष में भयाक्रांत करना तथा कुछ मुसलमानों का सिर्फ अपने बिरादरी में रहने की इच्छा जैसे कुछ ऐसे सवाल थे जिससे कुछ मुसलमान गांवों से अपनी ज़मीं-जायदाद समेट कर या तो मुस्लिम बहुल गांवों में रहने चले गए या सरो-सामान बांधे अवश्यम्भावी पाकिस्तान को रुख किये बेसब्री से इंतज़ार करने लगे| गुलजाना भी इस सिद्धांत का अपवाद नहीं था| यहाँ के मुसलमान भी खरामा-खरामा अपनी जायदाद राज़ी-खुशी से समेट कर हरे भरे मैदान (Greener Pastures) के रुख हो लिए| हाँ, यह अलग चिंतन का विषय है क्या वे आज पाकिस्तान या बंगलादेश में अपनी हिन्दुस्तानी बिरादरी के बनिस्पत ज्यादा स्वन्त्रत और खुशहाल हैं? खैर, मैं इसका निर्णय भविष्य के कंधे पर छोड़ कर यह कहना चाहता हूँ कि कभी मुस्लिम-बहुल रहे गुलजाना में भी अब दूसरे बाकी बचे एवं उपस्थापित हिंदुओं को बसने और ज़मीन खरीदने का उचित मौका मिला| गुलजाना से मुसलमानों की विदाई बहुत शांति एवं सौहर्द्रपूर्ण माहौल में हुई सी लगती है जो आने वाले उदाहरणों से स्पष्ट होता है|

सिन्दानी की ज़मीन

7. सिन्दानी जैसे मुस्लिम बहुल गांवों से भी अपनी जायदाद गुलजाना के भूमिहारों को बेच कर मुसलमानों का प्रयाण दो बातें सिद्ध करती हैं| एक तो यह कि उन्होंने भवनपुर, मुस्सी और पूरा के भूमिहारों के मुकाबले गुलजाना के भूमिहारों को ज़मीनें बेचना पसंद किया| यह सिर्फ तभी संभव है जब गुलजाना में हिंदू-मुस्लिम सम्बन्ध बहुत स्नेहपूर्ण रहा हो| दूसरा यह कि उन गांवों में भूमिहार पहले से बसे हों और ज़मीन की भूख और ज़रूरत उन्हें गुलजाना के मुकाबले कम हो|

मुगलकालीन स्थिति

8. सबसे पुराने दो भूमिहार वंशों यथा सोनभद्र 1(सोवरन सिंह) तथा सोनभद्र 2(मर्दन सिंह) के 9 पुश्तों का इतिहास तथा भारद्वाज 1(राजाराम सिंह) के 7 पुश्तों का इतिहास यह जाहिर करता है कि गुलजाना में भूमिहारों की आबादी कम से कम 200 वर्षों से ज्यादा समय से कायम है जो कि 1780 - 1800 ईस्वी पूर्व से है| इसका अर्थ यह हुआ कि वह समय मुग़ल साम्रज्य के अवसान तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के अभ्युदय या अंग्रेजी राज्य के सूर्योदय का था|

9. मुगलकालीन क्रूर, कठोर और अमानवीय लगान एवं कर संग्रह प्रणाली से उनके भोग-विलास और अनुत्पादक जीवन शैली का खर्च बमुश्किल पूरा होता था तथा उसके बदले कोई सिंचाई एवं कृषि संबंधी सहूलियत नहीं थी | एक ओर जहाँ हिंदू विरोधी “डोला प्रथा” लागू थी वहीं कर अदायगी न करने की सूरत में जबरन धर्म परिवर्तन किया जाता था | ये ऐसे कारण थे जिसने समकालीन भूमिहार राजाओं को इस समस्या के समाधान के लिए बाध्य किया|

गुलजाना ग्राम में भूमिहारों के बसने की पृष्ठभूमि

10. महाराजा कुमार गोपाल शरण नारायण सिंह के ननिहाल के पूर्वज राजा सुंदर सिंह के मन में शुरू से ही मुसलमानों के प्रति अविश्वास और विरोध की भावना घर कर गयी थी जिसके चलते उन्होंने अपने राज्य को सुरक्षित और मजबूत बनाने की योजना बनायीं| हालांकि बाद में दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह ने बिहार के सूबेदार अली वर्दी खान की मदद के एवज में 1739-40 में सुंदर सिंह को ‘राजा’ की पदवी अता की और उसके बाद राजा सुंदर सिंह की निष्ठा मुग़लों के प्रति बढ़ गयी|

11. गुलजाना की भौगोलिक स्थिति पर गौर करने पर पता चलता है की इसके सटे बुढ़नदी के पूरब सभी गाँव, यथा सिन्दानी, बेलाढ़ी लछ्मीपुर, कादिरपुर आदि मुस्लिम बहुल गाँव हैं| टिकारी राज की सैन्य योजनानुसार गुलजाना ही एक ऐसा प्रमुख गाँव था जिसके पूरब, पश्चिम और दक्षिण में बूढनदी और दरधा नदी जैसा प्राकृतिक अवरोध था जो टिकारी के पूरब से मुसलमानों के हमलों को रोक सकता था| सवाल सिर्फ यह था की गुलजाना में आबादी का स्वजातीय माहौल कायम किया जाय| इसी मकसद के मद्देनज़र राजा सुंदर सिंह ने यूपी तक के सुदूर प्रान्तों से, तथा और भी जहाँ कहीं भूमिहारों को मुसलमानों द्वारा सताया जा रहा था, वहाँ से निकल कर गुलजाना में बसने को प्रोत्साहित करना शुरू किया|


हिंदू-मुस्लिम सौहार्द्र का अटूट मिश्रण

12. अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं के बावजूद गुलजाना में हिंदू-मुस्लिम आबादी परस्पर आदर-सत्कार, सहयोग, एवं आपसी भाईचारे के साथ रह रही थी| इस सम्बन्ध में एक छोटे से वाकये का जिक्र संदार्भातिरेक नहीं होगा| इससे यह स्पष्ट होता है की गुलजाना में हिंदू और मुसलमान किस आपसी प्रेम-बिश्वास और समादर की भावना के साथ रहते थे| बात सन् 1935-36 की है जब गुलजाना से मुसलमानों का प्रस्थान उनके अधिक सुविधा जनक स्थानों के लिए हो गया था| गया में पृथ्वी सिंह (गुलजाना के कन्हाई सिंह के परपोते –भरद्वाज-2) की साइकिल खराब हो गयी थी| करीब करीब शाम का समय होने को था और उन्हें सुदामा सिंह (जिनका ज़िक्र पहले हो चुका है) के साथ गुलजाना साइकिल से वापस आना था| दोनों एक साइकिल-साज़ के पास गए और जल्दी से मरम्मत करने के लिए कहा| साइकिल मिस्त्री नूर मोहम्मद और गुल मोहम्मद ने कहा कि इसमे देर लगेगी| जब इन दोनों ने बताया कि शाम होने को है और उन्हें गुलजाना जाने में रात हो जायेगी| गुलजाना का नाम सुनते ही दोनों मिस्त्री भाइयों ने सब काम छोड़ कर इनकी साइकिल ठीक कर दी जिस पर खर्च एक रुपये हुआ| जब ये पैसे देने लगे तो नूर मोहम्मद ने पैसे लेने से इनकार कर दिया और कहा कि यह तो खुदा कि नेमत है कि उन्हें अपने हमवतन भाइयों के लिए कुछ करने का मौक़ा मिला| यहाँ यह बताना आवश्यक होगा कि 1935 में एक रुपये में चार लोगों का एक परिवार एक हफ्ता बहुत अच्छा खाना खा सकता था!!! आज के सन्दर्भ (2010) में चार लोगों के एक परिवार को एक हफ्ते के अच्छे खाने के लिए कितना खर्च होगा इसकी कल्पना हम अच्छी तरह कर सकते हैं जहाँ दाल 80/-रु किलो और चावल, आटा और सब्जी 20/-रु किलो बिकते हैं!!! इससे यह पता चलता है कि अगर गुलजाना में मुसलमानों का वास और वहाँ से उनकी बिदाई परस्पर बैमनश्य के माहौल में होती तो नूर और गुल मुहम्मद भाईयों का यह अनूठा, मार्मिक और हृदयस्पर्शी ब्यवहार देखने और सुनने को नहीं मिलता|

गुलजाना की जातीय संरचना

13. गुलजाना में निम्नलिखित जातियां सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहती हैं-

• भूमिहार
• कायस्थ
• बढ़ई
• तेली
• यादव
• दुसाध (पासवान)
• मुसहर
• डोम
नोट : यह समझना आवश्यक है कि यद्यपि सरकारी ब्यवस्थानुसार अभी तक जनसंख्या की गणना जाति आधारित नहीं है, तथापि मेरा यहाँ जातियों का उल्लेख ऐतिहासिक रूप से गुलजाना कि जातीय संरचना का निष्पक्ष वर्णन करना मात्र है| संकलन के दौरान मुझे यह आभास हुआ कि भूमिहारों के अलावा अन्य जातियों के लोगों ने अपने पूर्वजों के इतिहास का कोई भी ब्यौरा नहीं रखा है, अतः चाह कर भी मैं इसका विस्तृत विवरण नहीं दे सकता| इसलिए मेरा प्रयास गुलजाना में सिर्फ भूमिहारों के बसने और उनकी वंशावली का विस्तृत वर्णन करने तक सीमित रह जाता है|

गुलजाना में भूमिहारों का इतिहास

14. गुलजाना में भूमिहारों के बसने का इतिहास करीब-करीब 200 से भी ज्यादा पुराना है| गुलजाना में भूमिहारों कि निम्नलिखित प्रजातियां हैं:-
• सोनभद्र भूमिहार
• भारद्वाज भूमिहार
• अथर्व भूमिहार
• द्रोनटिकार (डोमकटार) भूमिहार

सोनभद्र भूमिहार

15. सोनभद्र भूमिहार के उद्गम कुल-पुरुष ‘वत्स ऋषि’ माने जाते हैं जिनका जिक्र वेदों में भी आता है| इसलिए सोनभद्र भूमिहार का गोत्र वत्स है| गुलजाना ग्राम में सोनभद्र भूमिहार के निम्नलिखित तीन परिवारों का निवास है:-

परिवार कुर्सी/पीढ़ी का इतिहास वंशावली
सोवरण सिंह 9 सोनभद्र 1
मर्दन सिंह 9 सोनभद्र 2
कोमल सिंह 3 सोनभद्र 3

सोनभद्र 1(सोवरण सिंह परिवार)

16. मैं सोनभद्र 1 (सोवरण सिंह) परिवार के सातवीं पीढ़ी में जन्म लेने पर अपने आप को धन्य एवं गौरवान्वित महसूस करता हूँ| अब तो हमसे नीचे भी दो पीढ़ियां इस परिवार के मुकुट में रत्न जोड़ने के लिए आगे आ गयीं है| यह मानते हुए कि अगर सोवरण परिवार में हर पूर्वज को 25 वर्ष कि उम्र में पहला बच्चा लड़का हुआ हो (हालांकि ऐसी बात नहीं भी हो सकती) तो भी सोवरण सिंह का जन्म करीब-करीब 1795 ई. में हुआ होगा| मै पुरुष बाल जन्म पर इसलिए जोर दे रहा हूँ क्योंकि पारम्परिक रूप से वंशावली का लेखा जोखा पुरुष जन्म पर आधारित होता है और बच्चियां विवाहोपरांत पति-कुल का सदस्य हो जाती हैं|

सोवरण परिवार के गुलजाना आगमन की कथा

17. गुलजाना में सोवरण परिवार का पदार्पण आज के औरंगाबाद जिले के केयाल ग्राम (जिसे केयाल-गढ़ भी कहते हैं) से हुआ था| केयाल गाँव कि ज़मीन हालांकि बहुत उपजाऊ थी लेकिन पूरी तरह अविश्वसनीय मानसून देवता की दया-दृष्टि पर निर्भर थी| इस कसर को पूरा करने के लिए अस्ताचल गामी मुगलिया सल्तनत के पुछल्ले बादशाहों की क्रूर और अमानवीय कर शोषण प्रणाली की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश राज के अग्रदूत ईस्ट इंडिया कंपनी का उत्तरोत्तर बढ़ता दबदबा रेयाया (प्रजा) के नस से खून का आखरी कतरा तक चूसने पर अमादा था| बाढ़, भुखमरी और अकाल की लपलपाती जिह्वा, सरकारी आव्पाशी (सिंचाई) की अनुपलब्धता के साथ मिलकर काश्तकारी को नामुमकिन बना दिया था| इन जानलेवा परिस्थितियों के बावजूद भी “कुछ भी हो लगान देना ही होगा” के परिप्रेक्ष में केयाल से भूमिहारों को ‘ज्यादा हरे-भरे मैदानों’(Greener Pastures) की ओर मुखातिब होने पर मजबूर कर दिया था|

मुगलिया खजाने की लूट

18. आभावों और जठराग्नि की ज्वाला में झुलसते परिवारों के जीवन रक्षार्थ क्षुधा तृप्ति के लिए तथा “बुभुक्षितम् किम् न करोति पापम्” की नैसर्गिक अपरिहार्यता के वशीभूत सोवरण सिंह के पिता और चाचा ने कुछ और लोगों के साथ मिलकर ऊँट की पीठ पर लाद कर ले जाते मुग़ल खजाने से अपनी अत्यावश्यक जरूरत के लिए कुछ रकम छीन लिया| सभी लोग पकड़े गए और उन्हें मुगल कचहरी में पेश किया गया| फरमान ये जारी हुआ कि या तो वे इस्लाम मजहब अपनाएं या उनका सर कलम कर दिया जाए| मरता क्या न करता? कुछ सोच विचार कर खतरे की लटकती तलवार से निजात पाने के लिए फ़िलहाल उन्होंने इस्लाम धर्म कबूलना स्वीकार किया क्योंकि ऐसे हर मुजरिम को जिसे धर्म परिवर्तन कराना होता था, अलग रखा जाता था और हरेक 15 दिनों पर ज़ुमा (शुक्रवार) के दिन इस्लाम धर्म कबूल कराया जाता था| इस तरह उन्हें करीब दस-पन्द्रह दिनों का समय मिल गया|

19. इस बीच मौक़ा पाकर वे वहाँ से भागकर रातोंरात केयाल आये और अपने परिवार के और लोगों को पूरी कहानी सुनायी| उन्होंने अपने परिवार को रातोंरात केयाल से पलायन कर टिकारी के तत्कालीन राजा मित्रजित सिंह के पास जाने का आदेश दिया| मैंने यह पहले ही बताया है कि राजा सुंदर सिंह के समय से ही ऐसे भुक्त- भोगी परिवारों को गुलजाना गाँव में बसाने का नीतिगत निर्णय हो चुका था| अपने परिवार को टिकारी जाने के लिए तैयार कर और उन्हें केयाल से विदा कर वे दोनों भाई खुद इस्लाम धर्म-परिवर्तन की ग्लानि से बचने के लिए रात के अन्धेरे में सदा के लिए गुम हो गए और ता-उम्र पकड़े नहीं गए| इस विस्थापित परिवार को मुगलों के सिपाहियों, जासूसों, मुखबिरों और कारिंदों की तेज़, तर्रार और सतर्क नज़रों से सुरक्षित बचा कर केयाल से टिकारी लाने का यह असंभव सा दीखने वाला दुस्तर, दुरूह, खतरनाक पर अत्यंत जबाबदेही भरा कार्य अकेले युवा-तरुण सोवरण जिसने अभी-अभी तुरत बीस-बाईसवें वसंत की तरुनाई देखी थी, के अनभ्यस्त पर मज़बूत कब्धों पर सौंपा गया था|

20. आज हम सोवरण सिंह के जीवित वंशजों का सर उनके इस अदम्य साहस, विवेकपूर्ण दूरदर्शिता, मौके की नजाकत को समझने की विलक्षण शक्ति और विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी जवाबदेही निर्वाह करने की दृढ़ इच्छा-शक्ति के सामने नत-मष्तक हुआ जाता है और हम सब उनके इस हैरत –अंगेज काम पर फूले नहीं समाते| क्या आज हम दुनिया में किसी और के सामने इतना कृतज्ञ, आभारी और ऋणी हो सकते हैं जितना की इस पुरुष-पुराण पूर्वज सोवरण सिंह के सामने? केयाल से टिकारी और टिकारी से गुलजाना की उनकी यह करीब 60 मील (100 कि.मी) कि पैदल, कंटकाकीर्ण, घुप्प काली अँधेरी रातोंरात की यात्रा और वह भी अपनी माता (हमारी आदि माता), अपनी 18-20 वर्षीया पत्नी और अपने छोटे तीन-चार साल के दुधमुहें बच्चे गनौरी को मुगलिया दुश्मनों की पैनी और सतर्क नज़रों तथा नापाक इरादों एवं मौसम कि दुरुहता से बचते-बचाते सुरक्षित लाना अपने आप में एक अभूत-पूर्व घटना रही होगी| खैर, किसी-किसी तरह वे सुरक्षित पहुँच कर नौ फुट्टा दरवाजे पर दस्तक देने में सफल हो गए| (टिकारी राज के किले के मुख्य महल द्वार की ऊँचाई नौ फीट है जिससे टिकारी राज की ज़मीन की पैमाइश नौ फुट्टा बांस से की जाती है| एक बांस लंबे और एक बांस चौड़े जमीन का एराजी (क्षेत्रफल) एक धुर (81 बर्ग फीट) होता है)| वहाँ पहुँच कर उन्होंने अपने विस्थापन की पूरी दर्दे दास्तां बयां की जहाँ इस विस्थापित परिवार और दुधमुहें बच्चे की समुचित देख-भाल की गयी| दूसरे दिन उन्हें गुलजाना लाकर रिहायशी और काश्तकारी कुछ ज़मीन देकर बसाया गया और जब तक खुद कुछ आमदनी का जरिया नहीं हुआ तबतक हफ्ता बार टिकारी राज से (सिद्धा) राशन का इन्तजाम भी किया जाने लगा| इस तरह सोवरण परिवार की केयाल से गुलजाना की यात्रा का मंगलमय अवसान हुआ| आज हम सोवरण परिवार जिसकी वर्तमान संख्या 57 तक पहुँच गयी है, अपने इस पूर्वज सोवरण सिंह के प्रति उनके अदम्य साहस एवं अटूट कर्त्तव्य निष्टा पर फूले नहीं समाते| सोवरण परिवार में मैं स्वयं अपने पुत्र, पुत्रियों, पोते और नातियों जिनकी सम्मिलित संख्या 15 तक पहुँच चुकी है, को साथ लेकर पूरी श्रद्धा, प्रेम एवं आदर से कृतज्ञता व्यक्त करने में गौरवान्वित महसूस करता हूँ और यह उम्मीद करता हूँ की हमारी आने वाली पीढ़ियां भी उनके अनुकरणीय साहसिक कार्य के लिए सादर नमन करेंगी और सोवरण परिवार को उन्नति के उच्च से उच्चतर शिखर पर ले जाएँगी|

कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ

21. आज के दिन तक इस सोवरण परिवार ने न सिर्फ अपने बल्कि अपने गाँव गुलजाना और अपने देश की रक्षा तंत्र और सुरक्षा के लिए भी दो कमीशंड ऑफिसर (लेफ्टिनेंट कर्नल) पिता पुत्र द्वय विद्या शर्मा (स्व. साहू सिंह के पौत्र तथा स्व. शिव नंदन शर्मा के पुत्र ) एवं मेरे सुपुत्र वसंत कुमार शर्मा (स्व. साहू सिंह के प्रपौत्र एवं स्व. शिव नंदन सिंह के पौत्र) के रूप में दिए| इसी परिवार ने एक इलेक्ट्रॉनिक एवं टेली-कम्युनिकेशन इंजिनियर अरुण शर्मा (मेरे द्वितीय सुपुत्र) के रूप में दिए हैं जो कि पृथ्वी पर उपग्रह संचार प्रणाली स्थापित करने में एक जवाबदेह सीनिअर मैनेजर के ओहदे पर कार्य-रत हैं| इसके अलावा इस परिवार ने दो आतिथ्य प्रबंधक अमित कुमार (स्व. शिव नंदन सिंह के पौत्र तथा वशिष्ठ नारायण के पुत्र) तथा मनीष कुमार (स्व. ईश्वर सिंह के पौत्र तथा मिथिलेश शर्मा के पुत्र) के रूप में दिए है|

22. इतना ही नहीं, नारी सशक्तिकरण, उत्थान एवं स्वावलंबन में भी इस परिवार की उपलब्धि अभूतपूर्व रही है| एक तरफ जहाँ पूनम शर्मा (स्व. शिव नंदन सिंह की पौत्री तथा ले.कर्नल विद्या शर्मा की सुपुत्री) सुदूर अमेरिका में सूचना तकनिकी के एनिमेशन एवं वेब डिजायनिंग विधा में अपना परचम लहरा रही है वहीँ दूसरी तरफ आरती कुमारी (स्व. शिव नंदन सिंह की पौत्री एवं वशिष्ठ नारायण की सुपुत्री) एमबीए के क्षेत्र में अपना कदम आत्म-विश्वास की मजबूती के साथ बढ़ा चुकी है| मैं इनकी उत्तरोत्तर सफलता एवं मांगलिक कल्याण की कामना करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ की भविष्य में भी इस परिवार के मुकुट में नए हीरे जड़ने वालों की कोई कमी नहीं हो| हालांकि प्रतियोगितात्मक ललक का सृजन और विपरीत चुनौतिओं का धैर्य एवं साहस पूर्वक शमन एवं विजय प्राप्ति की इच्छा-शक्ति के विकास की जिम्मेवारी उनके माता-पिता की ही होगी| अपनी असफलता/विफलता का दोष भाग्य और दुर्भाग्य पर मढ़कर हम अपनी जवाबदेही से मुकर नहीं सकते| मैंने सोवरण परिवार की वंशावली ब्लॉग पर भी डालने की कोशिश की लेकिन कुछ तकनिकी कारणों से प्रकाशित नहीं हो सकी| सोवरण परिवार की वंशावली सोनभद्र 1 पर http://guljana.weebly.com के ‘Download’ पर प्रकाशित कर चुका हूँ| पूरे गुलजाना गाँव की वंशावली इसी वेब साईट पर देखी जा सकती है|

सोनभद्र 2

23. मर्दन सिंह के वंशजों का वर्णन सोनभद्र 2 वंशावली पर किया जा रहा है| जब मर्दन सिंह अपने दो पुत्रों के साथ गुलजाना आये तो उनकी उम्र ढलने को आयी थी और उनके पुत्रों की उम्र काफी कम थी और इस तरह इस परिवार को कालांतर में बाबा-गोतिया के नाम से पुकारा जाने लगा| यह परिवार आज के औरंगाबाद जिले के डिलिया गाँव से गुलजाना ग्राम में आया| इस सन्दर्भ में एक बड़ी रोंचक कहानी है| उपरोक्त सोवरण सिंह के पितामह अपने अनुज द्वारा बड़े भाई की टोपी पहनने की एक छोटी सी बात पर नाराज होकर केयाल गाँव को छोड़कर सपरिवार डिलिया चले गए थे| कथा इस तरह है:-

“सोवरण सिंह के दादा जी दो भाई थे| उन दिनों एक बड़ी बाध्यकारी सामाजिक प्रथा यह थी की कोई भी उम्र-दराज सदस्य जब गाँव की सीमा से बाहर किसी दूसरे गाँव या शहर काम से जाता था तो वह अपनी टोपी अवश्य पहन कर जाता था| हरेक उम्र-दराज, इज्जत-मंद आदमी की स्वयं की टोपी हुआ करती थी जो घर/दालान की खूंटियों पर सिलसिलेवार ढंग से टंगी होती थी| अगर कोई दूसरा उस से उम्र में छोटा आदमी उसकी टोपी पहन ले तो इसे बुरा मना जाता था| सोवरण सिंह के दादा को किसी जरुरी काम से गाँव से कहीं बाहर जाना था| उन्होंने देखा की उनकी टोपी खूंटी से नीचे गिरकर गंदी हो गयी है इसलिए वे अपने बड़े भाई की साफ टोपी पहन कर चले गए| जब उनके बड़े भाई घर आये तो उन्होंने अपनी टोपी को अपनी जगह टंगी नहीं देखी| पूछ-ताछ से पता चला की उनके छोटे भाई उनकी टोपी पहन कर कहीं बाहर गए हैं| दूसरे दिन जब छोटे भाई घर लौटे तो बड़े भाई ने अपनी नाराजगी जाहिर की और उनके इस अपराध को अक्षम्य मानते हुए बड़े दुखी मन से केयाल ग्राम से सदा के लिए अपना नाता तोड़ डिलिया को प्रस्थान कर गए| छोटे भाई और ग्राम वासियों का कोई भी अनुनय-विनय उनके कठिन निर्णय को बदल नहीं सका| इसी बीच नीयती के क्रूर झंझावात ने सोवरण परिवार की नौका को केयाल-तट से बहा कर गुलजाना-तट पर ला पटका| कुछ दशकों बाद जब सोवरण सिंह का स्वर्गारोहन हो चुका था तब गुलजाना ग्राम में एक और सोनभद्र परिवार का पदार्पण मर्दन सिंह की अगुआई में डिलिया ग्राम से हुआ| (यह मानने में कोई शंका नहीं होनी चाहिए कि सोनभद्र २ परिवार (मर्दन सिंह परिवार) वही परिवार है जो केयाल से सोवरण सिंह के परिवार से बिछड़ कर डिलिया गया था और वहाँ ठीक से नहीं बसने के कारण गुलजाना आ गया जहाँ विस्थापित परिवारों के बसने कि असीम संभावनाएं थीं क्योंकि डिलिया से बसा बसाया परिवार तो गुलजाना आकर बसने से रहा)|”

24. यही कारण है कि मैंने यह निष्कर्ष निकला कि गुलजाना में सोनभद्र 1 (सोवरण सिंह परिवार) सोनभद्र 2 (मर्दन सिंह परिवार) से पुराना है और इस तरह सबसे पुराना है| (द्रोनटिकार परिवार कि अर्वाचीनता पर व्याख्या संदर्भानुसार बाद में करूँगा)|

सोनभद्र 2 परिवार कि कुछ विशेषताएं

25. भैरों सिंह कि कथा. मर्दन सिंह के कनिष्ठ पुत्र भैरों सिंह की सिर्फ एक पुत्री थीं जिनका विवाह उन्होंने टिकारी थाने के लोदीपुर ग्राम में किया था| चार पुत्रों को छोड़ कर भैरों सिंह कि पुत्री एवं
दामाद किसी महामारी में काल-कवलित हो गए| भैरों सिंह के चारो नातियों कि आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गयी थी| ये चारों नाती लोदीपुर से गुलजाना इस उम्मीद से आ गए कि उनके नाना भैरों सिंह जीवन-यापन में उनकी मदद करेंगे| भैरों सिंह के ये चारों नाती थे – गिरधर सिंह, जीवधर सिंह, बिग्गन सिंह और मनोहर सिंह जिनका वर्णन आगे अथर्व 2 अध्याय में मिलेगा जो स्वयं में एक अनूठी सत्य-कथा है|

26. ऋतू सिंह की कथा- मर्दन सिंह के चार पौत्रों में से एक ऋतू सिंह मानवीय संवेदना, दयालुता और विशाल सुहृदयता के लिए विख्यात थे| उन्होंने गाँव के किसी दुखाप्लावित परिवार/इंसान से मिलकर यथा संभव वैयक्तिक, आर्थिक और सामाजिक सहायता प्रदान करने का कभी कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं दिया| इतिहास का गर्त भी उन्हें ओझल नहीं कर सका और आज भी गाँव के जानकार बुजुर्ग उनके गुणों का बखान करते हैं|

27. बाबा गोतिया अपने सूक्ष्म वित्तीय एवं सम्पत्ति प्रबंधन के लिए भी जाना जाता है| धनोत्पार्जन एवं प्रबंधन के एक-दो गुर इनसे हमेशा ही सीखा जा सकता है| बाबा गोतिया की वंशावली http://guljana.weebly.com के ‘Download’सोनभद्र 2 पर देख सकते हैं|

ग्राम गौरव

28. सोनभद्र 2 परिवार ने गुलजाना को निम्न लिखित कुछ “सर्व प्रथम” व्यक्तित्व देकर कृतार्थ किया है:-
• प्रथम स्नातक – स्व. मथुरा सिंह – मर्दन सिंह के सातवें पायदान पर (स्व.शिव नारायण सिंह के पुत्र) |
• प्रथम राजपत्रित पदाधिकारी - स्व. डा. शत्रुघ्न प्र. सिन्हा - (B.V.Sc) - स्व. क्षत्रपति सिंह के सुपुत्र - मर्दन सिंह के सातवें पायदान पर|
• प्रथम भा.प्र.से.(Allied)-अरविन्द कुमार - डा. शत्रुघ्न प्र.सिन्हा के सुपुत्र |
• स्व.राम चंदर सिंह के पौत्र – मुनेश्वर शर्मा के सुपुत्र अभिषेक कुमार – Software Engineer.
• त्रितीय IITian – नितिन कुमार – स्व.क्षत्रपति सिंह के प्रपौत्र- स्व. ज्ञानदत्त सिंह के पौत्र एवं अनुरंजन शर्मा के सुपुत्र|
• इसके अलावा स्व.विष्णुपद सिंह के पौत्र तथा सत्येंद्र शर्मा के सुपुत्र मृत्युंजय शर्मा ने अभी-अभी BIT मेसरा से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है|

सोनभद्र 3 (कोमल सिंह)

29. यह एक ऐसा सोनभद्र परिवार है जिसकी कोमल सिंह वंशावली में सिर्फ चार पीढ़ियों का ही इतिहास शामिल है| स्व. कोमल सिंह, उनके पुत्र स्व. दीनानाथ सिंह उनके सुपुत्र श्री गौरी शंकर सिंह और उनकी तीन पुत्रियां ही सोनभद्र 3 परिवार को पूर्ण करते हैं| यद्यपि संख्या की दृष्टि से यह परिवार बहुत ही छोटा है तथापि सरलता, मानवता और ईमानदारी की दृष्टि से इस परिवार को सदा याद किया जायगा| किसी भी होली आदि संगीतमय सांस्कृतिक आयोजन में श्री गौरी शंकर सिंह का ढोलक वादन हमेशा याद किया जायेगा| यह हम लोगों का सौभाग्य है कि वे अभी हमारे बीच सही सलामत मौजूद हैं| इनकी वारिस तीन पुत्रियों में से कोई गुलजाना का स्थाई निवासी बनेगी यह कहा नहीं जा सकता|

भारद्वाज भूमिहार

30. भारद्वाज या भरद्वाजी जैसा कि बोलचाल कि भाषा में उन्हें कहा जाता है, अपनी उत्पत्ति ऋषि भरद्वाज से जोड़ते हैं और इस तरह उनका गोत्र “भारद्वाज”है| भारद्वाज भूमिहार मे श्री सुदामा सिंह जिनके बारे में मैं पहले ही बता चुका हूँ, गाँव के सबसे वयोवृद्ध पुरुष हैं, जिनकी उम्र करीब 94 वर्ष हो चुकी है| उन्होंनें ही मुझे भारद्वाज 1, 3 और 4 के बारे में विस्तार से बताया|

31. गुलजाना में निम्नलिखित चार भारद्वाज परिवार थे लेकिन आज पूरा बुलक सिंह परिवार (भारद्वाज 4) और भारद्वाज 3 के तीन में से 2 शाखाएं कालकवलित हो चुकी हैं फिर भी ऐतिहासिक महत्व कि दृष्टि से उनका पूर्ण वर्णन किया गया है| पूरे भारद्वाज भूमिहार परिवार को निम्नलिखित चार वंशावलियों में वर्णित किया जा रहा है:-

परिवार कुर्सी/पीढ़ी का इतिहास वंशावली
राजाराम सिंह 7 भारद्वाज 1
तेजा सिंह 7 भारद्वाज 2
रामाधीन सिंह 2 भारद्वाज 3
बुलक सिंह 2 भारद्वाज 4

राजाराम सिंह परिवार

32. यह परिवार उत्तर प्रदेश से विस्थापित होकर टिकारी राज की मदद से गुलजाना ग्राम में बसाया गया| इसमें भी टिकारी राज की मंशा दरधा (बुढ़ नदी) के पश्चिम टिकारी राज का दृढ़ीकरण ही रही थी| आज के दिन इस परिवार की संख्या 33 है| इस परिवार के बसने की स्थानीय स्थिति के कारण इसे “पइन पर” कहा जाता है| इनकी वंशावली भारद्वाज 1 http://guljana.weebly.com के ‘Download’ पर देखी जा सकती है|

ग्राम गौरव

33. आज की तारीख में इस परिवार ने गुलजाना ग्राम को पांच इन्जिनियर (अभियंता) और तीन ऍम.बी.ए दिए हैं जिनके नाम निम्नलिखित हैं:-
• अवधेश शर्मा– स्व.राम विलास सिंह के सुपुत्र.
• धनञ्जय कुमार-श्री बालेश्वर शर्मा के सुपुत्र.
• संजय कुमार-श्री बालेश्वर शर्मा के सुपुत्र.
• विजय भरद्वाज-श्री सुरेश शर्मा के सुपुत्र.
• अजय शर्मा-श्री अवध सिंह के सुपुत्र.
• ऍम.बी.ए.के क्षेत्र में श्री ब्रिज नंदन शर्मा के सुपुत्र, श्री प्रमोद शर्मा की सुपुत्री (गुलजाना की पहली लड़की) तथा श्री चित्तरंजन शर्मा के पुत्र राजीव कुमार शामिल हैं|


तेजा सिंह परिवार (भारद्वाज 2)

34. यह परिवार एक से ज्यादा मामलों में विख्यात, कुख्यात, तथा स्मरणीय रहा है जिसकी वंशावली http://guljana.weebly.com के ‘Download’ भारद्वाज 2 पर दे चुका हूँ| जहाँ तक इसकी ख्याति का सवाल है इस परिवार ने अंगरेजों के ज़माने में स्व. बाल गोविन्द सिंह (तेजा सिंह के पौत्र, कन्हाई सिंह के पुत्र) तथा स्व. व्रह्मदेवसिंह (तेजा सिंह के प्रपौत्र, झरी सिंह के पौत्र) के रूप में गुलजाना गांव को दो मैंट्रीकुलेट्स दिए थे| बाल गोविन्द सिंह ने एक सभ्य औसत जीवन यापन किया| इनके वंश में आज ब्रज भूषण शर्मा और उनके भाईयों का परिवार है| व्रह्मदेव सिंह परिस्थिति वश नशे का शिकार होकर दो पुत्रों (पारस नाथ सिंह तथा केशव प्र. सिंह) के जन्म के बाद घर छोड़कर कहीं और चले गए| झरी सिंह के वंशजों ने अमीरी से गरीबी और गरीबी से अमीरी (Riches to Rags and Rags to Riches) की यात्रा चक्र पूर्ण कर एक अत्युत्तम उर्ध्वोंनत्ति और पुनरुत्थान का उदाहरण चरितार्थ किया है|


पारिवारिक कलह

35. तेजा सिंह के पौत्र तथा कन्हाई सिंह के ज्येष्ठ पुत्र शिव गोविन्द सिंह को लोग मुख़्तार साहब कहा कहते थे| इन्होंने ज़मींदारी हासिल की| रेयाया से लगन वसूलना और मुग़ल दरबार/अँगरेज़ बहादुर के खजाने में जमा करवाना ही ज़मींदारों का मुख्य ब्यवसाय, कर्त्तव्य और आमदनी का जरिया था| कहा तो यहाँ तक जाता है कि ज़मींदारी की खुमारी में मुख़्तार साहब ने अपने बड़े बेटे रघुनंदन सिंह उर्फ बड़े बाबू (निःसंतान) की मिलीभगत से अपने सहोदर भाई बाल गोविन्द सिंह तथा अपने चचेरे भाइयों रुपमंगल सिंह और नान्हू सिंह की संपत्ति की जिला जज की डिक्री को हाई कोर्ट में अपील कर येन केन प्रकारेण नीलाम करा कर खुद खरीद कर सम्पत्ति से बेदखल कर गांव बदर (ग्राम निष्कासित) कर दिया| महिलाएं सपरिवार अपने मैके चली गईं| शनैः-शनैः उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगी और एक दिन वे पुनः गुलजाना वापस आ गए| आज उनका परिवार धन-धान्य संपन्न है और मुख़्तार साहब का परिवार जिनकी तूती बोलती थी, भूत कालीन परंपरा का आवरण ओढ़े गुमनामी के अँधेरे में सिमटता चला गया| सुरेश सिंह (अब स्व.) एवं उनके पुत्रों ने इस दुखद इतिहास से शिक्षा लेकर, कर्म और परिश्रम को मूलमन्त्र मानकर तथा जीवन-मूल्यों का पुनर्निर्धारण कर प्रगति पथ पर अग्रसर होना शुरू कर कर दिया है| मैं उनके इस ईमानदार प्रयास में उनकी प्रगति की कामना करता हूँ| दूसरी ओर व्रह्मदेव सिंह के पौत्र एवं स्व. पारस नाथ सिंह के चारों मुंबई-वासी पुत्र न केवल कामयाबी के उच्च से उच्चत्तर बुलंदियों को छू रहे हैं बल्कि अपने दिलीप आदि चचरे भाइयों कि यथा संभव मदद भी कर रहे हैं| अर्श से फर्श और फर्श से अर्श तक की ऐसी यात्रा अद्भुत सी लगती है| भाग्य-चक्र शायद इसी तरह चलता है|


रामाधीन सिंह परिवार (भारद्वाज 3)

36. इस परिवार की तीन शाखाओं में से दो गुलजाना से विलुप्त हो चुकी है| रामाधीन सिंह की दो वंश शाखाएं अर्थात रामौतार सिंह और कैलाश सिंह का वंश समाप्त हो चुका है| रामौतार सिंह के बेटे मथुरा सिंह अविवाहित एवं राजशेखर सिंह युवावस्था में मृत्यु के कारण निःसंतान रहे और उनके भांजे निमसर से भुनेश्वर सिंह (बिस्नोवा भूमिहार) उत्तराधिकारी बने| कैलाश सिंह के दोनों बेटे अर्जुन और बलि सिंह भी अविवाहित ही मरे और उनकी बची खुची सम्पत्ति उनके भांजे को मिली जो गुलजाना नहीं रहते| सिर्फ मुखी सिंह के दो बेटों (शिवपति सिंह और मुसाफिर सिंह) में शिवपति सिंह का ही विवाह हो सका जिनका वंश कायम है और जिसे http://guljana.weebly.com पर download भारद्वाज 3 पर देखा जा सकता है| रामाधीन परिवार की आश्चर्यजनक बात यह है कि यह परिवार सिर्फ चार पीढ़ी पुरानी है लेकिन अंतिम पायदान के उत्तराधिकारी सदस्य (भुनेश्वर सिंह) को अपने नाना के पिता का नाम भी मालूम नहीं है| हालाँकि यह सच्चाई नहीं हो सकती, फिर भी लोगों को ऐसा प्रतीत हो भी सकता है कि उन्हें सिर्फ संपत्ति लेने भर का स्वार्थ ही सिद्ध करना था !!!

बुलक सिंह परिवार (भारद्वाज 4)

37. यह परिवार भी तीन पीढ़ियों का परिवार है| चौथी पीढ़ी में अमरेन्द्र शर्मा (राम वृक्ष सिंह के नाती) इक्किल गांव से भागिनमान उत्तराधिकारी बने और सभी बाहरी उत्तराधिकारियों कि तरह उन्हें भी अपने नाना से तीन सीढ़ी ऊपर के लोगों के बारे में कुछ भी मालूम नहीं और यह भी मालूम नहीं कि उनके नाना कहाँ से गुलजाना आए थे|

अथरब परिवार

38. उद्गम. अथरब शब्द अथर्व का अपभ्रंश है| अथरब अपना उद्गम ऋषि अथर्व से मानते हैं लेकिन उनका गोत्र कौण्डिन्य है| इसका मतलब यह हुआ कि ऋषि कौण्डिन्य ने अथर्व के वंशज होते हुए भी अपने कुल पुरुष (ऋषि अथर्व) के स्तित्व को नकारते हुए अपनी वंशावली आरंभ की| गुलजाना में अथरब भूमिहार के निम्नलिखित परिवार हैं:-

परिवार कुर्सी/पीढ़ी का इतिहास वंशावली
सनेही सिंह 7 अथरब 1
बुलक सिंह 4 अथरब 1A
गिरधर भ्रातागण 5 अथरब 2
झंखुरी सिंह 5 अथरब 3A
दुर्गा सिंह 5 अथरब 3B
भागवत सिंह 5 अथरब 3C


39. गुलजाना में अथरब भूमिहार निम्नलिखित तीन गांवों से आए हैं :-
• संडा विस्थापित परिवार
• लोदीपुर विस्थापित परिवार
• परशुरामपुर विस्थापित परिवार

संडा विस्थापित परिवार

40. संडा गांव से गुलजाना अथरब भूमिहार के दो परिवार आए – सनेही सिंह परिवार (अथरब 1) और बुलक सिंह परिवार (अथरब 1A)| सनेही सिंह परिवार इनमे सबसे पुराना (सात पीढ़ियों का) है| चूँकि संडा गांव गुलजाना से सिर्फ 5-6 कि.मी. दूर है इसलिए इन दोनों परिवारों का संडा से पलायन के पीछे या तो इनकी गरीबी हो सकती है या गंभीर पारिवारिक कलह या फिर कोई अकथनीय घटना| हालांकि संडा से गुलजाना आने से गरीबी उन्मूलन कैसे हो सकता है यह संदेह का विषय है| फिर भी यह परिवार राजीव कुमार के रूप में(स्व.यदुनंदन मिश्र के पौत्र एवं वैदेही शर्मा के सुपुत्र) होटल प्रवंधन क्षेत्र में एक स्नातक देकर गांव का नाम अंग्रजों के देश इंग्लैंड में भी रौशन कर रहा है| बुलक सिंह का परिवार भी चार सीढ़ी पहले ही संडा से अकथनीय कारणवश गुलजाना आया| इस परिवार ने भी अनैरका (अमेरिका) सिंह के पुत्र रघुवंश शर्मा के रूप में एक अभियंता और सुबंश शर्मा के रूप में एक ओवरसीयर गांव को देकर मान बढ़ाया|

लोदीपुर-विस्थापित परिवार

41. सोनभद्र 2 (बाबा गोतिया) के बारे में लिखते समय यह पहले ही बता चुका हूँ कि स्व.मर्दन सिंह के द्वितीय पुत्र स्व. भैरो सिंह कि सिर्फ एक बेटी थीं जिनका विवाह टिकारी के पास लोदीपुर ग्राम में अथरब परिवार में हुआ था| उनके चार नाती थे| माता-पिता के स्वर्गवास के बाद और कतिपय अव्यक्त कारणों से लोदीपुर ग्राम में इन नातियों का जीवन दूभर हो गया था| अपने नाना भैरो सिंह के दिलाशे और भरोसे पर ये चारों नाती रोजी-रोटी की तलाश में अपने ननिहाल गुलजाना आ गए अतः यह परिवार बाबा गोतिया के भागिनमान हुए| ये चारों नाती थे – गिरधर सिंह, मनोहर सिंह, बिग्गन सिंह और जीवधर सिंह| नाना भैरो सिंह ने इनको स्थापित होने में बटाई अदि पर ज़मीन देकर यथा संभव मदद की लेकिन अपने नाना से भी इनकी नहीं बनी| शायद अपने नाना से इन्हें कुछ ज्यादा ही अपेक्षा थी| अंततः ये चारों भाई फिर रोजी-रोटी की तलाश में गुलजाना छोड़कर खिज़रसराय थाने के उचौली गांव में चले गए और अपने को स्थापित करने का प्रयास किया| पता नहीं क्या बात थी, यहाँ भी ये चारों भाई अपने परिवार को स्थायित्व देने में असफल रहे| घूम फिर कर ये चारों भाई पुनः गुलजाना वापस आ गए|

42. विपरीत परिस्थितियों में जीतने की जिजीविषा. इस बार यह परिवार कुछ खास ही इच्छा-शक्ति के साथ गुलजाना लौटा था| ‘कुछ भी हो, निश्चय कर अपनी जीत करूँ’ के नारे के साथ ये चारों भाई जीवन संग्राम में पिल पड़े| ज़मीन-जायदाद थी नहीं, बटइया-चौठईया पर कम कर के ये अपना जीवन-यापन करने लगे| गरीबी की इस विकट परिस्थिति में चार में से सिर्फ दो सबसे बड़े और सबसे छोटे भाइयों (गिरधर और जीवधर सिंह) का ही विवाह हो सका| मनोहर और बिग्गन सिंह कुंआरे रह गए| ज्येष्ठ की दुपहरी में एक दिन जब गिरिधर सिंह भवनपुर स्कूल के सड़क पर पीपल के नीचे बैठ कर अपने सुनहरे भविष्य का दिवा-स्वप्न देख रहे थे, ठीक उसी समय भवनपुर के एक सज्जन जिनका नाम बालक सिंह था मनो इनके सपने को मूर्त रूप देने के लिए आ पहुंचे| जब उन्होंने पीपल के नीचे बैठे गिरधर सिंह से इनकी उदासी का कारण पूछा तो इनके सब्र का बांध टूट गया और वे फफक पड़े और अपनी तंग हाली का पूरा हल बयां कर दी| उदारमना बालक सिंह का बाल-मन द्रवित हो गया और उन्होंने इनको इस विपदा से उबारने के लिए व्रह्म स्थान का साढ़े सात बीघे का अपना एक प्लाट मात्र 56रुपये में देने का प्रस्ताव रख दिया| गिरधर सिंह ने इसके लिए कुछ समय माँगा ताकि पैसों का इन्तजाम कर सकें| घर आकार भाइयों से राय-मशवरा करने के बाद अपने घर की पूरी चल-अचल संपत्ति बेच कर कुल 28रु ही जमा कर सके| भवनपुर बालक सिंह से मिलकर उन्होंने 56रु जमा करने में अपने असमर्थता जाहिर की| स्व. बालक सिंह इतने दयालु थे कि 28रु लेकर ही उन्होंने 7.5 बीघे का प्लाट इस विश्वास पर दे दिया की बाकि के 28रु. धीरे धीरे उस खेती की आमदनी से उन्हें चुका दिया जाय| महानता, सरलता और दूसरे गांव के आदमी पर इस तरह का विश्वास आज के दिन एक राम-राज्यीय आदर्श वाक्य की तरह लगता है|

43. उस दिन से आजतक उस परिवार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा| अपने हाड़-मांस को पसीने में पिघलाकर दिन रात मेहनत कर इस परिवार ने अपना कर्ज चुकाया, अपनी आर्थिक दशा मजबूत की और गांव को पहला एम.ए (अर्थशास्त्र) योग्यता-धारी स्व. भुवनेश्वर सिंह के रूप में दिया| आज यह परिवार खुश हाल है और कोई भी सामाजिक उत्सव/कार्य इस परिवार के सहयोग के बिना अधूरा सा प्रतीत होता है| इस परिवार की वंशावली अथरव -2 http://guljana.weebly.com के Download पेज पर दे चुका हूँ|

परशुरामपुर विस्थापित परिवार (अथरब 3A,B&C)

44. यह परिवार गुलजाना गांव के हिसाब से सबसे बाद में ताजा-ताजा आया हुआ परिवार है क्योंकि गुलजाना में इस परिवार का इतिहास सिर्फ चार पीढ़ी ही पुराना है| ये तीनों परिवार एक ही गांव परशुरामपुर से एक ही समय आए और एक ही खानदान के हैं लेकिन तीन पीढ़ी उपर के अपने मूल पूर्वज का नाम किसी को मालूम नहीं है| इनकी वंशावली http://guljana.weebly.com के Download पेज पर अथरब 3A, B और C के रूप में दे चुका हूँ| इस परिवार ने स्व. रामदेव सिंह के पौत्र एवं स्व. कपिलदेव शर्मा के सुपुत्र रणजीत कुमार के रूप में एक बैंक प्रबंधक देकर गुलजाना को कृतार्थ किया है|

द्रोनकटार (डोमकटार) भूमिहार

हुसेनी सिंह परिवार – 5 पीढ़ियों का इतिहास

45. गुलजाना ग्राम में द्रोनकटार भूमिहार जिसे बोलचाल की भाषा में डोमकटार भूमिहार के नाम से भी पुकारते हैं, का सिर्फ एक ही घर हैं | महाराजा टिकारी भी डोमकटार भूमिहार ही थे| डोमकटार भूमिहार भरद्वाज गोत्र के होते हैं| इस परिवार के सबसे छोटे सदस्य ने अभी अभी इसके पांचवें पायदान पर कदम रखा है| किंवदन्ती है कि यह परिवार गुलजाना का सबसे पुराना बसा भूमिहार परिवार है लेकिन इनके पास करीब 70-80 साल पहले के पूर्वजों का कोई विवरण उपलब्ध नहीं है| गुलजाना के इर्दगिर्द के गांव जैसे कि पूरा, मुस्सी, भोरी और सोवाल आदि के वासी डोमकटार भूमिहार हैं लेकिन गुलजाना में यह परिवार कहाँ से आया वह आज हुसेनी परिवार का कोई भी जीवित सदस्य नहीं जानता| इस सन्दर्भ में एक और बात गौरतलब है कि अगर यह परिवार गुलजाना का सबसे पुराना मूल निवासी है तो इनका इतिहास 200 साल से भी ज्यादा पुराना और इनके पास नौ-दस पीढ़ियों का ब्यौरा होना चाहिए था क्योंकि 200 साल से ज्यादा पुराना नौ पीढ़ियों का भूमिहार परिवार इस गांव में मौजूद है| अगर यह परिवार इतना पुराना होता तो इसकी वर्तमान पारिवारिक संख्या भी कम से 40-50 के करीब होनी चाहिए थी, जबकि इस परिवार कि वर्तमान संख्या 8-9 के करीब है, हालांकि आज इस परिवार के कृष्ण देव शर्मा के पितामह के एक भाई गुलजाना से विस्थापित होकर भैंसमारा गांव में जाकर बसे हुए हैं|

ग्राम-गौरव में योगदान

46. जो कुछ भी हो, इस डोमकटार परिवार ने गुलजाना को पहला इंजीनियर कृष्ण देव शर्मा के रूप में देने का इतिहास कायम किया है| इतना ही नहीं, इनके प्रथम सुपुत्र राकेश शर्मा ने भी अपने पिता के पदचिन्हों पर चलकर पिता-पुत्र की इंजीनियर जोड़ी बनाकर दूसरा इतिहास रचा है| इनकी वंशावली द्रोनकटार भूमिहार नाम से http://guljana.weebly.com के Download पेज पर दे चुका हूँ|

उपसंहार

47. यहाँ अब मैं गुलजाना सम्बन्धी भूत और वर्तमान की सूचनाओं और तथ्यों के संकलन, परिमार्जन और प्रस्तुतीकरण के अपने प्रयास को विराम दे रहा हूँ| इनमें कुछ ऐसे भी तथ्य शामिल हैं जिनको अगर वक्त रहते उजागर नहीं किया जाता तो ये वक्त के अँधेरे में विलीन हो जाते| मेरी चिर-पोषित इच्छा थी कि अति साधारण ऐतिहासिक विरासत वाले अपने गांव गुलजाना को अगर अपनी योग्यता से नहीं तो किसी और स्वीकार्य तरीके से विश्व-पटल पर लाकर ही चैन कि साँस लूँ|

48. घर-घर जाकर सूचनओं के छोटे-मोटे टूटे धागों को इकट्ठा कर, उसे जोड़ कर, स्वविवेक और सर्व-स्वीकार्य तर्क के आधर पर उसे बुनकर इस लेख के रूप में लाना, मुझ अकेले के लिए मुश्किल था| इस प्रयास में मुझे सर्वश्री सुदामा सिंह, बच्चू सिंह, भजुराम सिंह, महेंद्र शर्मा, कृष्ण देव शर्मा, मुनेश्वर शर्मा, वैदेही शर्मा, दिलीप कुमार तथा जीतेन्द्र कुमार आदि का भरपूर सहयोग मिला जिसके लिए मै इन सबों का आभार प्रकट करता हूँ| http://guljanaavillageingayabihar.blogspot.com/ पर इससे पहले मैंने अंग्रेजी ब्लॉग में गुलजाना के बारे में इन्ही तथ्यों को प्रकाशित किया है| पाठकों की प्रतिक्रियायों से लगता है कि इन्टरनेट-पहुँच वाले लोगों को यह बहुत पसंद आया है, जिसे http://guljana.weebly.com पर लिंक के रूप में देखा जा सकता है| इस हिंदी संस्करण को भी मै http://guljana.weebly.com पर प्रकाशित कर रहा हूँ|

49. अब तो हालत यह है की गूगल पर सिर्फ गुलजाना लिखकर सर्च बटन दबाइए और गुलजाना का पूरा इतिहास आपके सामने होगा| मुझे इस बात कि और भी खुशी है कि इसके देखा-देखी और भी कुछ गाँवों के लोग ऐसा ही करने का प्रयास कर रहे हैं| मैं उनके इस प्रयास के लिए उन्हें अपनी हार्दिक शुभ कामनाएं देता हूँ|

50. इस लेख के माध्यम से मैं गुलजाना के युवकों और आने वाली नई पीढ़ी के नव-युवकों से अपील और आग्रह करना चाहता हूँ कि वे अपनी असीम युवा-शक्ति को पहचानें और उसपर भरोसा कर अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति और आत्म-विश्वास के साथ आने वाली चुनौतियों का सामना करें| इस गांव के इतिहास में ही आपने देखा है कि किस तरह सिर्फ अटूट इच्छा शक्ति के सहारे अशिक्षित तो नहीँ पर निरक्षर से निरक्षर लोगों ने भी गरीबी के दलदल से निकलकर आसमान कि बुलंदियों को छुआ हैं| आप तो जानते ही हैं – “जहाँ चाह है वहाँ राह है”| किसी दूसरे पर अमरलता कि तरह परावलम्बी और पराश्रयी होना मानवीय अवनति की पराकाष्ठा हैं| आपमें वह असीम शक्ति है, जो अगर आपको दुर्गुणों में दक्ष कर सकती है तो वही शक्ति उचित दिशा में संचालित होकर आपको उन्नत्ति के उच्च शिखर पर भी ले जा सकती है| ‘आप क्या थे , क्या हैं और आपका वर्तमान क्रिया-कलाप आपको कहाँ ले जायेगा’ - इसे सदा अपने दिमाग में गांठ बाँधकर रख लें| अपनी विरासत, विकासोन्मुख परंपरा और संस्कारों का ख्याल रखकर आप अपनी शक्ति को पहचानें और उसका समुचित उपयोग कर उच्च से उच्चतम शिखर पर पहुंचें| आपके लिए यही हमारी ईश्वर से प्रार्थना है|

51. मै जहाँ भी रहूँ, न रहूँ, या जिस रूप में भी रहूँ, आपकी उन्नत्ति हमें कुछ न कुछ खुशी अवश्य देगी| ईश्वर आपको सदा सदबुद्धि और सफलता दे| चूँकि यह प्रस्तुति ग्राम वासियों द्वारा दी गई सूचनाओं पर आधारित है और कुछ महत्वपूर्ण तथ्य छूट जाने की संभावना हो सकती है जिसके लिए मुझे ई. मेल/फोन कर अपना बहुमूल्य सुझाव देकर कृतार्थ करें| और हाँ, मैं हिंदी भाषा के अपने अल्प ज्ञान और व्याकरण की अशुद्धियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ|


ले.कर्नल विद्या शर्मा, (से.नि.)
Email - vidyashar@gmail.com
(Mob-09693812578, 09470053198.)

Monday, June 28, 2010

गुलजाना प्रकरण - अब हिंदी में

गुलजाना – एक गाँव की वृद्धि एवं विकास यात्रा

“ यह लेखन वास्तविक सन्दर्भों, ऐतहासिक तथ्यों, व्यक्तिगत अनुभवों, श्रुतिओं, पारिवारिक स्वीकारोक्तियों/विवरणों, एवं ग्राम प्रचलित किम्वदंतियों का अविच्छिन्न यौगिक मिश्रण है| इसमें लेखक का कार्य निष्पक्षता पूर्वक आधे-अधूरे तथ्यों को जोड़कर सामंजस्य स्थापित करना व रुचिकर पूर्णता प्रदान कर पाठकों तक पहुँचाना मात्र भर है| किसी व्यक्ति विशेष, परिवार, या पारिवारिक समुदाय की निंदा, अवहेलना या प्रशंशा करना लेखक का उद्धेश्य कतई नहीं है| अगर प्रसंगवश ऐसा प्रतीत होता है तो पारिवारिक स्वीकारोक्तियों के आलोक में लेखक इसके लिए उत्तरदायी नहीं है| ”

भूमिका

1. सामान्यतः यह देखा जाता है कि गाँवों में ग्राम वासियों के बसने का समेकित एवं परिपूर्ण रिकॉर्ड रखने तथा इतिहास संजोने कि कोई भी रीति या परंपरा नहीं है| कभी-कभी तो ऐसी स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है कि कुछ लोगों को अपने निकटतम पूर्वजों (प्रपितामह आदि) के नाम तथा अपने उद्गम स्थान अदि का भी पता नहीं होता| मैं इसी चिंतन में डूबा था कि मेरी अंतरात्मा ने मुझे झकझोरा कि अब समय आ गया है कि मैं गुलजाना ग्रामवासियों का रिकॉर्ड तैयार करूँ जिसमें किस परिवार के मुखिया (परम पुरातन पुरुष) का, किस गाँव या स्थान से, किस कारण से और किस परिस्थिति में यहाँ पदार्पण हुआ और तदुपरांत उनकी वंशावली किस तरह विकसित हुई तथा गुलजाना के उत्थान में उनका क्या योगदान रहा, इत्यादि तथ्यों का पूरा-पूरा विवरण समाहित कर सकूँ और आज के इस सूचना-सहयोगी दुनिया (IT Savvy world) में इसे वेब साईट पर प्रकाशित कर दूं ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ बिना किसी की मदद के गुलजाना ग्राम के भूत एवं वर्तमान के बारे में न केवल पूरी जानकारी रखें बल्कि ग्रामवासियों को भी कुछ बता सके| यह बहुत सुखद अनुभूति का विषय है की हमारे समकालीन और हमारी संततियां मेट्रो की सीमा फांद कर विदेशों में कार्यरत है| मेरा यह प्रयास खासकर इनकी और इनकी संतानों के लिए तब–तब काफी मददगार साबित होगा जब-जब उनका रुख गुलजाना की तरफ मुखातिब होगा या जब भी वे अपनी माटी की गंध लेना चाहेंगे| गूगल की मदद से गुलजाना का एक नक्शा भी इसके साथ वेब साईट पर प्रकाशित कर रहा हूँ जिसमे गाँव से सटे कुछ स्थानों के नाम के साथ-साथ कुछ घरों को भी दिखा रहा हूँ ताकि हरेक आदमी को अपना घर ढूंढने में सहुलि़त हो सके|

भौगोलिक स्थिति

2. गुलजाना ग्राम भौगोलिक दृष्टि से इस धरा पर 24.57’43” डिग्री N अक्षांश तथा 84.54’09” डिग्री E देशांतर पर अवस्थित है| समुद्र तल (Mean sea level) से इसकी ऊंचाई 92 मीटर है| जिला मुख्यालय गया शहर से 32 कि.मी उत्तर–पश्चिम दिशा में, प्रखंड एवं अनुमंडल शहर टिकारी से 6.5 कि.मी पूरब तथा बिहार प्रान्त की राजधानी पटना से 85 कि.मी. दक्षिण, पटना – गया रेलवे लाइन पर बेलागंज रेलवे स्टेशन से 8 कि.मी पश्चिम, बेलागंज – टिकारी रोड पर अवस्थित है|


चौहद्दी
3. गुलजाना उत्तर मे ग्राम भवनपुर, पूरब में ग्राम सिन्दानी तथा ग्राम बेलाढ़ी, दक्षिण में ग्राम मुस्सी और ग्राम पूरा एवं पश्चिम में ग्राम अलालपुर से घिरा है| गुलजाना को, सटे पूरब से बुढ़नदी तथा दक्षिण और पश्चिम से दरधा नदी अपने बाहुपाश में आलिंगित किये है जो एक दैविक वरदान ही है| इतना ही नहीं, गुलजाना को सटे उत्तर-पूरब से पश्चिम की तरफ बेलागंज-टिकारी सड़क का प्राकृतिक वरदान भी प्राप्त है| ऐसा है हमारा सुन्दर, सुरम्य, मनोरम एवं यातायात सुलभ ग्राम गुलजाना|

प्रशासनिक नियंत्रण

4. गुलजाना का प्रशासनिक नियंत्रण गया जिला, टिकारी अनुमंडल (Sub Division), प्रखंड एवं थाना तथा पूरा पंचायत और अर्क ढिबरिया डाक घर के अधीन आता है| गुलजाना का सर्वे (Cadastral Map) संख्या 124 है तथा राजस्व हलका सं 5 है|अतः गुलजाना एक स्वतंत्र राजस्व ग्राम है| वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव के अनुसार गुलजाना टिकारी विधानसभा क्षेत्र सं 231 के अंतर्गत बूथ सं 253 में आता है|कुल मतदाताओं की संख्या 649, भूमिहार मतदाताओं की सं 335,कुल गृहों की सं 163 तथा भूमिहार गृहों की सं 71 है| कुल पुरुष मतदाता 353 और महिला मतदाता 296 हैं|

गुलजाना का इतिहास

5. जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है, “गुलजाना” एक उर्दू शव्द है जिसका अर्थ है ‘फूल कि तरह प्यारा” तथा गुलजाना का एक और अर्थ है “पुष्प-जनित”(Born out of flowers)| पुराने सर्वे नक़्शे में “गुलजाना” का नाम “गुल्जना” भी देखा जा सकता है जिसका अर्थ “पुष्प-जनित” ही है| गुलजाना के कुछ घरों और बाध-बधार के कुछ नामों से भी भी पता चलता है कि इस गाँव में मुस्लिम आबादी थी, उदाहरणार्थ –‘साईं घर’,“रोज़ा पर’’ आदि| गाँव से सटे पईन के पूरब और रोज़ा पर से सटे पश्चिमोत्तर के खाली गड्ढे में मुस्लिम कब्रिस्तान के लक्षण पाए गए हैं जो इस बात को सिद्ध करने के लिए काफी हैं कि गुलजाना में मुस्लिम आबादी थी| आगे आने वाले कुछ सन्दर्भों से भी इस गाँव में मुस्लिम आबादी सिद्ध होती है|


मुस्लिम आबादी का ह्रास
जिन्नाह का प्रभाव

6. तीस के दशक से ही भारतीय स्वतंत्रता की उत्तरोत्तर बढ़ती आगमन ध्वनि, तदोपर मुहम्मद अली जिन्नाह का भारतीय मुसलमानों को स्वतंत्र भारत के परिप्रेक्ष में भयाक्रांत करना तथा कुछ मुसलमानों का सिर्फ अपने बिरादरी में रहने की इच्छा जैसे कुछ ऐसे सवाल थे जिससे कुछ मुसलमान गांवों से अपनी ज़मीं-जायदाद समेट कर या तो मुस्लिम बहुल गांवों में रहने चले गए या सरो-सामान बांधे अवश्यम्भावी पाकिस्तान को रुख किये बेसब्री से इंतज़ार करने लगे| गुलजाना भी इस सिद्धांत का अपवाद नहीं था| यहाँ के मुसलमान भी खरामा-खरामा अपनी जायदाद राज़ी-खुशी से समेट कर हरे भरे मैदान (Greener Pastures) के रुख हो लिए| हाँ, यह अलग चिंतन का विषय है की क्या वे आज पाकिस्तान या बंगलादेश में अपनी हिन्दुस्तानी बिरादरी के बनिस्पत ज्यादा स्वन्त्रत और खुशहाल हैं? खैर, मैं इसका निर्णय भविष्य के कंधे पर छोड़ कर यह कहना चाहता हूँ कि कभी मुस्लिम-बहुल रहे गुलजाना में भी अब दूसरे बाकी बचे एवं उपस्थापित हिंदुओं को बसने और ज़मीन खरीदने का उचित मौका मिला| गुलजाना से मुसलमानों की विदाई बहुत शांति एवं सौहर्द्रपूर्ण माहौल में हुई सी लगती है जो की पीछे आने वाले उदाहरणों से स्पष्ट होता है|

सिन्दानी की ज़मीन

7. सिन्दानी जैसे मुस्लिम बहुल गांवों से भी अपनी जायदाद गुलजाना के भूमिहारों को बेच कर मुसलमानों का प्रयाण दो बातें सिद्ध करती हैं| एक तो यह कि उन्होंने भवनपुर, मुस्सी और पूरा के भूमिहारों के मुकाबले गुलजाना के भूमिहारों को ज़मीनें बेचना पसंद किया| यह सिर्फ तभी संभव है जब गुलजाना में हिंदू-मुस्लिम सम्बन्ध बहुत स्नेहपूर्ण रहा हो| दूसरा यह कि उन गांवों में भूमिहार पहले से बसे हों और ज़मीन कि भूख और ज़रूरत उन्हें गुलजाना के मुकाबले कम हो|

मुगलकालीन स्थिति

8. सबसे पुराने दो भूमिहार वंशों यथा सोनभद्र 1(सोवरन सिंह) तथा सोनभद्र 2(मर्दन सिंह) के 9 पुश्तों का इतिहास तथा भारद्वाज 1(राजाराम सिंह) के 7 पुश्तों का इतिहास यह जाहिर करता है कि गुलजाना में भूमिहारों की आबादी कम से कम 200 वर्षों से ज्यादा समय से कायम है जो कि 1780 - 1800 ईस्वी पूर्व से है| इसका अर्थ यह हुआ कि वह समय मुग़ल साम्रज्य के अवसान तथा ईस्ट इंडिया कंपनी के अभ्युदय या अंग्रेजी राज्य के सूर्योदय का था|

9. मुगलकालीन क्रूर, कठोर और अमानवीय लगान एवं कर संग्रह प्रणाली से उनके भोग-विलास और अनुत्पादक जीवन शैली का खर्च बमुश्किल पूरा होता था तथा उसके बदले कोई सिंचाई एवं कृषि संबंधी सहूलियत नहीं थी | एक ओर जहाँ हिंदू विरोधी “डोला प्रथा” लागू थी वहीं कर अदायगी न करने की सूरत में जबरन धर्म परिवर्तन किया जाता था | ये ऐसे कारण थे जिसने समकालीन भूमिहार राजाओं को इस समस्या के समाधान के लिए बाध्य किया|



गुलजाना ग्राम में भूमिहारों के बसने की पृष्ठभूमि

10. महाराजा कुमार गोपाल शरण नारायण सिंह के पूर्वज सुंदर सिंह को पहली बार दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह ने बंगाल और बिहार के सूबेदार अली वर्दी खान की मदद के एवज में 1793 में ‘राजा’ की पदवी, अता की| (हालाँ की टिकारी राज की स्थापना राजा सुंदर सिंह के पिता धीर सिंह ने की थी, लेकिन उन्हें ‘राजा’ की औपचारिक रूप से सरकारी पदवी नहीं मिली थी)| राजा सुंदर सिंह के दत्तक पुत्र बुनियाद सिंह को कासिम अली द्वारा डुबा कर हत्या करने के बाद सुंदर सिंह के मन में मुसलमानों के प्रति अविश्वास की भावना घर कर गयी जिसके चलते उन्होंने अपने राज्य को सुरक्षित और मजबूत बनाने की योजना बनायीं|

11. गुलजाना की भौगोलिक स्थिति पर गौर करने पर पता चलता है कि इसके सटे बुढ़नदी के पूरब सभी गाँव, यथा सिन्दानी, बेलाढ़ी लछ्मीपुर, कादिरपुर आदि मुस्लिम बहुल गाँव हैं| टिकारी राज की सैन्य योजनानुसार गुलजाना ही एक ऐसा प्रमुख गाँव था जिसके पूरब, पश्चिम और दक्षिण में बूढनदी और दरधा नदी जैसा प्राकृतिक अवरोध था जो टिकारी के पूरब से मुसलमानों के हमलों को रोक सकता था| सवाल सिर्फ यह था कि गुलजाना में आबादी का स्वजातीय माहौल कायम किया जाय| इसी मकसद के मद्देनज़र राजा सुंदर सिंह ने यूपी तक के सुदूर प्रान्तों से, तथा और भी जहाँ कहीं भूमिहारों को मुसलमानों द्वारा सताया जा रहा था, वहाँ से निकल कर गुलजाना में बसने को प्रोत्साहित करना शुरू किया|



हिंदू-मुस्लिम सौहार्द्र का अटूट मिश्रण

12. अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं के बावजूद गुलजाना में हिंदू-मुस्लिम आबादी परस्पर आदर-सत्कार, सहयोग, एवं आपसी भाईचारे के साथ रह रही थी| इस सम्बन्ध में एक छोटे से वाकये का जिक्र संदार्भातिरेक नहीं होगा| इससे यह स्पष्ट होता है की गुलजाना में हिंदू और मुसलमान किस आपसी प्रेम-बिश्वास और समादर की भावना के साथ रहते थे| बात सन् 1935-36 की है जब गुलजाना से मुसलमानों का प्रस्थान उनके अधिक सुविधा- जनक स्थानों के लिए हो गया था| गया में पृथ्वी सिंह (गुलजाना के कन्हाई सिंह के परपोते –भरद्वाज-2) की साइकिल खराब हो गयी थी| करीब करीब शाम का समय होने को था और उन्हें सुदामा सिंह (जिनका ज़िक्र पहले हो चुका है) के साथ गुलजाना साइकिल से वापस आना था| दोनों एक साइकिल-साज़ के पास गए और जल्दी से मरम्मत करने के लिए कहा| साइकिल मिस्त्री नूर मोहम्मद और गुल मोहम्मद ने कहा कि इसमे देर लगेगी| जब इन दोनों ने बताया कि शाम होने को है और उन्हें गुलजाना जाने में रात हो जायेगी| गुलजाना का नाम सुनते ही दोनों मिस्त्री भाइयों ने सब काम छोड़ कर इनकी साइकिल ठीक कर दी जिस पर खर्च एक रुपये हुआ| जब ये पैसे देने लगे तो नूर मोहम्मद ने पैसे लेने से इनकार कर दिया और कहा कि यह तो खुदा कि नेमत है कि उन्हें अपने हमवतन भाइयों के लिए कुछ करने का मौक़ा मिला| यहाँ यह बताना आवश्यक होगा कि 1935 में एक रुपये में चार लोगों का एक परिवार एक हफ्ता बहुत अच्छा खाना खा सकता था!!! आज के सन्दर्भ (2010) में चार लोगों के एक परिवार को एक हफ्ते के अच्छे खाने के लिए कितना खर्च होगा इसकी कल्पना हम अच्छी तरह कर सकते हैं जहाँ दाल 80/-रु किलो और चावल, आटा और सब्जी 20/-रु किलो बिकते हैं!!! इससे यह पता चलता है कि अगर गुलजाना में मुसलमानों का वास और वहाँ से उनकी बिदाई परस्पर बैमनश्य के माहौल में होती तो नूर और गुल मुहम्मद भाईयों का यह अनूठा, मार्मिक और हृदयस्पर्शी ब्यवहार देखने और सुनने को नहीं मिलता|

गुलजाना की जातीय संरचना

13. गुलजाना में निम्नलिखित जातियां सौहार्दपूर्ण वातावरण में रहती हैं-

• भूमिहार
• कायस्थ
• बढ़ई
• तेली
• यादव
• दुसाध (पासवान)
• मुसहर
• डोम
नोट : यह समझना आवश्यक है कि यद्यपि सरकारी ब्यवस्थानुसार अभी तक जनसंख्या कि गणना जाति आधारित नहीं है, तथापि मेरा यहाँ जातियों का उल्लेख ऐतिहासिक रूप से गुलजाना कि जातीय संरचना का निष्पक्ष वर्णन करना मात्र है| संकलन के दौरान मुझे यह आभास हुआ कि भूमिहारों के अलावा अन्य जातियों के लोगों ने अपने पूर्वजों के इतिहास का कोई भी ब्यौरा नहीं रखा है, अतः चाह कर भी मैं इसका विस्तृत विवरण नहीं दे सकता| इसलिए मेरा प्रयास गुलजाना में सिर्फ भूमिहारों के बसने और उनकी वंशावली का विस्तृत वर्णन करने तक सीमित रह जाता है|




गुलजाना में भूमिहारों का इतिहास

14. गुलजाना में भूमिहारों के बसने का इतिहास करीब-करीब 200 से भी ज्यादा पुराना है| गुलजाना में भूमिहारों कि निम्नलिखित प्रजातियां हैं:-
• सोनभद्र भूमिहार
• भारद्वाज भूमिहार
• अथर्व भूमिहार
• द्रोनटिकार (डोमकटार) भूमिहार

सोनभद्र भूमिहार
15. सोनभद्र भूमिहार के उद्गम कुल-पुरुष ‘वत्स ऋषि’ माने जाते हैं जिनका जिक्र वेदों में भी आता है| इसलिए सोनभद्र भूमिहार का गोत्र वत्स है| गुलजाना ग्राम में सोनभद्र भूमिहार के निम्नलिखित तीन परिवारों का निवास है:-

परिवार कुर्सी/पीढ़ी का इतिहास वंशावली
सोवरण सिंह 9 सोनभद्र 1
मर्दन सिंह 9 सोनभद्र 2
कोमल सिंह 3 सोनभद्र 3


सोनभद्र 1(सोवरण सिंह परिवार)

16. मैं सोनभद्र 1 (सोवरण सिंह) परिवार के सातवीं पीढ़ी में जन्म लेने पर अपने आप को धन्य एवं गौरवान्वित महसूस करता हूँ| अब तो हमसे नीचे भी दो पीढ़ियां इस परिवार के मुकुट में रत्न जोड़ने के लिए आगे आ गयीं है| यह मानते हुए कि अगर सोवरण परिवार में हर पूर्वज को 25 वर्ष कि उम्र में पहला बच्चा लड़का हुआ हो (हालांकि ऐसी बात नहीं भी हो सकती) तो भी सोवरण सिंह का जन्म करीब-करीब 1795 ई. में हुआ होगा| मै पुरुष बाल जन्म पर इसलिए जोर दे रहा हूँ क्योंकि पारम्परिक रूप से वंशावली का लेखा जोखा पुरुष जन्म पर आधारित होता है और बच्चियां विवाहोपरांत पति-कुल का सदस्य हो जाती हैं|





सोवरण परिवार के गुलजाना आगमन की कथा

17. गुलजाना में सोवरण परिवार का पदार्पण आज के औरंगाबाद जिले के केयाल ग्राम (जिसे केयाल-गढ़ भी कहते हैं) से हुआ था| केयाल गाँव की ज़मीन हालांकि बहुत उपजाऊ थी लेकिन पूरी तरह अविश्वसनीय मानसून देवता की दया-दृष्टि पर निर्भर थी| इस कसर को पूरा करने के लिए अस्ताचल गामी मुगलिया सल्तनत के पुछल्ले बादशाहों की क्रूर और अमानवीय कर शोषण प्रणाली की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश राज के अग्रदूत ईस्ट इंडिया कंपनी का उत्तरोत्तर बढ़ता दबदबा रेयाया (प्रजा) के नस से खून का आखरी कतरा तक चूसने पर अमादा था| बाढ़, भुखमरी और अकाल की लपलपाती जिह्वा, सरकारी आव्पाशी (सिंचाई) की अनुपलब्धता के साथ मिलकर काश्तकारी को नामुमकिन बना दिया था| इन जानलेवा परिस्थितियों के बावजूद भी “कुछ भी हो लगान देना ही होगा” के परिप्रेक्ष में केयाल से भूमिहारों को ‘ज्यादा हरे-भरे मैदानों’(Greener Pastures) की ओर मुखातिब होने पर मजबूर कर दिया था|

मुगलिया खजाने की लूट

18. आभावों और जठराग्नि की ज्वाला में झुलसते परिवारों के जीवन रक्षार्थ क्षुधा तृप्ति के लिए तथा “बुभुक्षितम् किम् न करोति पापम्” की नैसर्गिक अपरिहार्यता के वशीभूत सोवरण सिंह के पिता और चाचा ने कुछ और लोगों के साथ मिलकर ऊँट की पीठ पर लाद कर ले जाते मुग़ल खजाने से अपनी अत्यावश्यक जरूरत के लिए कुछ रकम छीन लिया| सभी लोग पकड़े गए और उन्हें मुगल कचहरी में पेश किया गया| फरमान ये जारी हुआ की या तो वे इस्लाम मजहब अपनाएं या उनका सर कलम कर दिया जाए| मरता क्या न करता? कुछ सोच विचार कर खतरे की लटकती तलवार से निजात पाने के लिए फ़िलहाल उन्होंने इस्लाम धर्म कबूलना स्वीकार किया क्योंकि ऐसे हर मुजरिम को जिसे धर्म परिवर्तन कराना होता था, अलग रखा जाता था और हरेक 15 दिनों पर ज़ुमा (शुक्रवार) के दिन इस्लाम धर्म कबूल कराया जाता था| इस तरह उन्हें करीब दस-पन्द्रह दिनों का समय मिल गया|

19. इस बीच मौक़ा पाकर वे वहाँ से भागकर रातोंरात केयाल आये और अपने परिवार के और लोगों को पूरी कहानी सुनायी| उन्होंने अपने परिवार को रातोंरात केयाल से पलायन कर टिकारी के राजा सुंदर सिंह के पास जाने का आदेश दिय| मैंने यह पहले ही बताया है कि राजा सुंदर सिंह पहले से ही ऐसे भुक्त- भोगी परिवारों को गुलजाना गाँव में बसाने की फिराक में थे| अपने परिवार को टिकारी जाने के लिए तैयार कर और उन्हें केयाल से विदा कर वे दोनों भाई खुद इस्लाम धर्म-परिवर्तन की ग्लानि से बचने के लिए रात के अन्धेरे में सदा के लिए गुम हो गए और ता-उम्र पकड़े नहीं गए| इस विस्थापित परिवार को मुगलों के सिपाहियों, जासूसों, मुखबिरों और कारिंदों की तेज़, तर्रार और सतर्क नज़रों से सुरक्षित बचा कर केयाल से टिकारी लाने का यह असंभव सा दिखने वाला दुस्तर, दुरूह, खतरनाक पर अत्यंत जबाबदेही भरा कार्य अकेले युवा-तरुण सोवरण जिसने अभी-अभी तुरत बीस-बाईसवें वसंत की तरुनाई देखी थी, के अनभ्यस्त पर मज़बूत कब्धों पर सौंपा गया था|

20. आज हम सोवरण सिंह के जीवित वंशजों का सर उनके इस अदम्य साहस, विवेकपुर्ण दूरदर्शिता, मौके की नजाकत को समझने की विलक्षण शक्ति और विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी जवाबदेही निर्वाह करने की दृढ़ इच्छा-शक्ति के सामने नत-मष्तक हुआ जाता है और हम सब उनके इस हैरत –अंगेज काम पर फूले नहीं समाते| क्या आज हम दुनिया में किसी और के सामने इतना कृतज्ञ, आभारी और ऋणि हो सकते हैं जितना की इस पुरुष-पुराण पूर्वज सोवरण सिंह के सामने? केयाल से टिकारी और टिकारी से गुलजाना की उनकी यह करीब 60 मील (100 कि.मी) कि पैदल, कंटकाकीर्ण, घुप्प काली अँधेरी रातोंरात कि यात्रा और वह भी अपनी माता (हमारी आदि माता), अपनी 18-20 वर्षीया पत्नी और अपने छोटे तीन-चार साल के दुधमुहें बच्चे गनौरी को मुगलिया दुश्मनों कि पैनी और सतर्क नज़रों तथा नापाक इरादों एवं मौसम कि दुरुहता से बचते-बचाते सुरक्षित लाना अपने आप में एक अभूत पूर्ण घटना रही होगी| खैर, किसी किसी तरह वे सुरक्षित पहुँच कर नौ फुट्टा दरवाजे पर दस्तक देने में सफल हो गए| (टिकारी राज के किले के मुख्य महल द्वार की ऊँचाई नौ फीट है जिस से टिकारी राज की ज़मीन की पैमाइश नौ फुट्टा बांस से की जाती है| एक बांस लंबे और एक बांस चौड़े जमीन का एराजी (क्षेत्रफल) एक धुर (81 बर्ग फीट) होता है)| वहाँ पहुँच कर उन्होंने अपने विस्थापन की पूरी दर्दे दास्तां बयां की जहाँ इस विस्थापित परिवार और दुधमुहें बच्चे की समुचित देख-भाल की गयी| दूसरे दिन उन्हें गुलजाना लाकर रिहायशी और काश्तकारी कुछ ज़मीन देकर बसाया गया और जब तक खुद कुछ आमदनी का जरिया नहीं हुआ तबतक हफ्ता बार टिकारी राज से (सिद्धा) राशन का इन्तजाम भी किया जाने लगा| इस तरह सोवरण परिवार की केयाल से गुलजाना की यात्रा का मंगलमय अवसान हुआ| आज हम सोवरण परिवार जिसकी वर्तमान संख्या 57 तक पहुँच गयी है, अपने इस पूर्वज सोवरण सिंह के प्रति उनके अदम्य साहस एवं अटूट कर्त्तव्य निष्टा पर फूले नहीं समाते| सोवरण परिवार में मैं स्वयं अपने पुत्र, पुत्रियों, पोते और नातियों जिनकी सम्मिलित संख्या 15 तक पहुँच चुकी है, को साथ लेकर पूरी श्रद्धा, प्रेम एवं आदर से कृतज्ञता व्यक्त करने में गौरवान्वित महसूस करता हूँ और यह उम्मीद करता हूँ की हमारी आने वाली पीढ़ियां भी उनके अनुकरणीय साहसिक कार्य के लिए सादर नमन करेंगी और सोवरण परिवार को उन्नति के उच्च से उच्चतर शिखर पर ले जाएँगी|

कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ

21. आज के दिन तक इस सोवरण परिवार ने न सिर्फ अपने बल्कि अपने गाँव गुलजाना और अपने देश की रक्षा तंत्र और सुरक्षा के लिए भी दो कमीशंड ऑफिसर (लेफ्टिनेंट कर्नल) पिता पुत्र द्वय विद्या शर्मा (स्व. साहू सिंह के पौत्र तथा स्व. शिव नंदन शर्मा के पुत्र ) एवं मेरे सुपुत्र वसंत कुमार शर्मा (स्व. साहू सिंह के प्रपौत्र एवं स्व. शिव नंदन सिंह के पौत्र) के रूप में दिए| इसी परिवार ने एक इलेक्ट्रॉनिक एवं टेली-कम्युनिकेशन इंजिनियर अरुण शर्मा (मेरे द्वितीय सुपुत्र) के रूप में दिए हैं जो कि पृथ्वी पर उपग्रह संचार प्रणाली स्थापित करने में एक जवाबदेह सीनिअर मैनेजर के ओहदे पर कार्य-रत हैं| इसके अलावा इस परिवार ने दो आतिथ्य प्रबंधक अमित कुमार (स्व. शिव नंदन सिंह के पौत्र तथा वशिष्ठ नारायण के पुत्र) तथा मनीष कुमार (स्व. ईश्वर सिंह के पौत्र तथा मिथिलेश शर्मा के पुत्र) के रूप में दिए है|

22. इतना ही नहीं, नारी सशक्तिकरण, उत्थान एवं स्वावलंबन में भी इस परिवार की उपलब्धि अभूतपूर्व रही है| एक तरफ जहाँ पूनम शर्मा (स्व. शिव नंदन सिंह की पौत्री तथा ले.कर्नल विद्या शर्मा की सुपुत्री) सुदूर अमेरिका में सूचना तकनिकी के एनिमेशन एवं वेब डिजायनिंग विधा में अपना परचम लहरा रही है वहीँ दूसरी तरफ आरती कुमारी (स्व. शिव नंदन सिंह की पौत्री एवं वशिष्ठ नारायण की सुपुत्री) एमबीए के क्षेत्र में अपना कदम आत्म-विश्वास की मजबूती के साथ बढ़ा चुकी है| मैं इनकी उत्तरोत्तर सफलता एवं मांगलिक कल्याण की कामना करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ की भविष्य में भी इस परिवार के मुकुट में नए हीरे जड़ने वालों की कोई कमी नहीं हो| हालांकि प्रतियोगितात्मक ललक का सृजन और विपरीत चुनौतिओं का धैर्य एवं साहस पूर्वक शमन एवं विजय प्राप्ति की इच्छा-शक्ति के विकास की जिम्मेवारी उनके माता-पिता की ही होगी| अपनी असफलता/विफलता का दोष भाग्य और दुर्भाग्य पर मढ़कर हम अपनी जवाबदेही से मुकर नहीं सकते| मैंने सोवरण परिवार की वंशावली ब्लॉग पर भी डालने की कोशिश की लेकिन कुछ तकनिकी कारणों से प्रकाशित नहीं हो सकी| सोवरण परिवार की वंशावली सोनभद्र 1 पर http://guljana.weebly.com के ‘Download’ पर प्रकाशित कर चुका हूँ| पूरे गुलजाना गाँव की वंशावली इसी वेब साईट पर देखी जा सकती है|


सोनभद्र 2

23. मर्दन सिंह के वंशजों का वर्णन सोनभद्र 2 वंशावली पर किया जा रहा है| जब मर्दन सिंह अपने दो पुत्रों के साथ गुलजाना आये तो उनकी उम्र ढलने को आयी थी और उनके पुत्रों की उम्र काफी कम थी और इस तरह इस परिवार को कालांतर में बाबा-गोतिया के नाम से पुकारा जाने लगा| यह परिवार आज के औरंगाबाद जिले के डिलिया गाँव से गुलजाना ग्राम में आया| इस सन्दर्भ में एक बड़ी रोंचक कहानी है| उपरोक्त सोवरण सिंह के पितामह अपने अनुज द्वारा बड़े भाई की टोपी पहनने की एक छोटी सी बात पर नाराज होकर केयाल गाँव को छोड़कर सपरिवार डिलिया चले गए थे| कथा इस तरह है:-

“सोवरण सिंह के दादा जी दो भाई थे| उन दिनों एक बड़ी बाध्यकारी सामाजिक प्रथा यह थी की कोई भी उम्र-दराज सदस्य जब गाँव की सीमा से बाहर किसी दूसरे गाँव या शहर काम से जाता था तो वह अपनी टोपी अवश्य पहन कर जाता था| हरेक उम्र-दराज, इज्जत-मंद आदमी की स्वयं की टोपी हुआ करती थी जो घर/दालान की खूंटियों पर सिलसिलेवार ढंग से टंगी होती थी| अगर कोई दूसरा उस से उम्र में छोटा आदमी उसकी टोपी पहन ले तो इसे बुरा मना जाता था| सोवरण सिंह के दादा को किसी जरुरी काम से गाँव से कहीं बाहर जाना था| उन्होंने देखा की उनकी टोपी खूंटी से नीचे गिरकर गंदी हो गयी है इसलिए वे अपने बड़े भाई की साफ टोपी पहन कर चले गए| जब उनके बड़े भाई घर आये तो उन्होंने अपनी टोपी को अपनी जगह टंगी नहीं देखी| पूछ-ताछ से पता चला की उनके छोटे भाई उनकी टोपी पहन कर कहीं बाहर गए हैं| दूसरे दिन जब छोटे भाई घर लौटे तो बड़े भाई ने अपनी नाराजगी जाहिर की और उनके इस अपराध को अक्षम्य मानते हुए बड़े दुखी मन से केयाल ग्राम से सदा के लिए अपना नाता तोड़ डिलिया को प्रस्थान कर गए| छोटे भाई और ग्राम वासियों का कोई भी अनुनय-विनय उनके कठिन निर्णय को बदल नहीं सका| इसी बीच नीयती के क्रूर झंझावात ने सोवरण परिवार की नौका को केयाल-तट से बहा कर गुलजाना-तट पर ला पटका| कुछ दशकों बाद जब सोवरण सिंह का स्वर्गारोहन हो चुका था तब गुलजाना ग्राम में एक और सोनभद्र परिवार का पदार्पण मर्दन सिंह की अगुआई में डिलिया ग्राम से हुआ| (यह मानने में कोई शंका नहीं होनी चाहिए कि सोनभद्र २ परिवार (मर्दन सिंह परिवार) वही परिवार है जो केयाल से सोवरण सिंह के परिवार से बिछड़ कर डिलिया गया था और वहाँ ठीक से नहीं बसने के कारण गुलजाना आ गया जहाँ विस्थापित परिवारों के बसने कि असीम संभावनाएं थीं क्योंकि डिलिया से बसा बसाया परिवार तो गुलजाना आकर बसने से रहा)|”

24. यही कारण है कि मैंने यह निष्कर्ष निकला कि गुलजाना में सोनभद्र 1 (सोवरण सिंह परिवार) सोनभद्र 2 (मर्दन सिंह परिवार) से पुराना है और इस तरह सबसे पुराना है| (द्रोनटिकार परिवार कि अर्वाचीनता पर व्याख्या संदर्भानुसार बाद में करूँगा)|

सोनभद्र 2 परिवार कि कुछ विशेषताएं
25. भैरों सिंह कि कथा. मर्दन सिंह के कनिष्ठ पुत्र भैरों सिंह की सिर्फ एक पुत्री थीं जिनका विवाह उन्होंने टिकारी थाने के लोदीपुर ग्राम में किया था| चार पुत्रों को छोड़ कर भैरों सिंह कि पुत्री एवं
दामाद किसी महामारी में काल-कवलित हो गए| भैरों सिंह के चारो नातियों कि आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गयी थी| ये चारों नाती लोदीपुर से गुलजाना इस उम्मीद से आ गए कि उनके नाना भैरों सिंह जीवन-यापन में उनकी मदद करेंगे| भैरों सिंह के ये चारों नाती थे – गिरधर सिंह, जीवधर सिंह, बिग्गन सिंह और मनोहर सिंह जिनका वर्णन आगे अथर्व 2 अध्याय में मिलेगा जो स्वयं में एक अनूठी सत्य-कथा है|

26. ऋतू सिंह की कथा- मर्दन सिंह के चार पौत्रों में से एक ऋतू सिंह मानवीय संवेदना, दयालुता और विशाल सुहृदयता के लिए विख्यात थे| उन्होंने गाँव के किसी दुखाप्लावित परिवार/इंसान से मिलकर यथा संभव वैयक्तिक, आर्थिक और सामाजिक सहायता प्रदान करने का कभी कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं दिया| इतिहास का गर्त भी उन्हें ओझल नहीं कर सका और आज भी गाँव के जानकार बुजुर्ग उनके गुणों का बखान करते हैं|

27. बाबा गोतिया अपने सूक्ष्म वित्तीय एवं सम्पत्ति प्रबंधन के लिए भी जाना जाता है| धनोत्पार्जन एवं प्रबंधन के एक-दो गुर इनसे हमेशा ही सीखा जा सकता है| बाबा गोतिया की वंशावली http://guljana.weebly.com के ‘Download’सोनभद्र 2 पर देख सकते हैं|

ग्राम गौरव
28. सोनभद्र 2 परिवार ने गुलजाना को निम्न लिखित कुछ “सर्व प्रथम” व्यक्तित्व देकर कृतार्थ किया है:-
• प्रथम स्नातक – स्व. मथुरा सिंह – मर्दन सिंह के सातवें पायदान पर (स्व.शिव नारायण सिंह के पुत्र) |
• प्रथम राजपत्रित पदाधिकारी - स्व. डा. शत्रुघ्न प्र. सिन्हा - (B.V.Sc) - स्व. क्षत्रपति सिंह के सुपुत्र - मर्दन सिंह के सातवें पायदान पर|
• प्रथम भा.प्र.से.(Allied)-अरविन्द कुमार - डा. शत्रुघ्न प्र.सिन्हा के सुपुत्र |
• स्व.राम चंदर सिंह के पौत्र – मुनेश्वर शर्मा के सुपुत्र अभिषेक कुमार – Software Engineer.
• त्रितीय IITian – नितिन कुमार – स्व.क्षत्रपति सिंह के प्रपौत्र- स्व. ज्ञानदत्त सिंह के पौत्र एवं अनुरंजन शर्मा के सुपुत्र|
• इसके अलावा स्व.विष्णुपद सिंह के पौत्र तथा सत्येंद्र शर्मा के सुपुत्र मृत्युंजय शर्मा ने अभी-अभी BIT मेसरा से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है|

सोनभद्र 3 (कोमल सिंह)

29. यह एक ऐसा सोनभद्र परिवार है जिसकी कोमल सिंह वंशावली में सिर्फ चार पीढ़ियों का ही इतिहास शामिल है| स्व. कोमल सिंह, उनके पुत्र स्व. दीनानाथ सिंह उनके सुपुत्र श्री गौरी शंकर सिंह और उनकी तीन पुत्रियां ही सोनभद्र 3 परिवार को पूर्ण करते हैं| यद्यपि संख्या की दृष्टि से यह परिवार बहुत ही छोटा है तथापि सरलता, मानवता और ईमानदारी की दृष्टि से इस परिवार को सदा याद किया जायगा| किसी भी होली आदि संगीतमय सांस्कृतिक आयोजन में श्री गौरी शंकर सिंह का ढोलक वादन हमेशा याद किया जायेगा| यह हम लोगों का सौभाग्य है कि वे अभी हमारे बीच सही सलामत मौजूद हैं| इनकी वारिस तीन पुत्रियों में से कोई गुलजाना का स्थाई निवासी बनेगी यह कहा नहीं जा सकता|

भारद्वाज भूमिहार
30. भारद्वाज या भरद्वाजी जैसा कि बोलचाल कि भाषा में उन्हें कहा जाता है, अपनी उत्पत्ति ऋषि भरद्वाज से जोड़ते हैं और इस तरह उनका गोत्र “भारद्वाज”है| भारद्वाज भूमिहार मे श्री सुदामा सिंह जिनके बारे में मैं पहले ही बता चुका हूँ, गाँव के सबसे वयोवृद्ध पुरुष हैं, जिनकी उम्र करीब 94 वर्ष हो चुकी है| उन्होंनें ही मुझे भारद्वाज 1, 3 और 4 के बारे में विस्तार से बताया|

31. गुलजाना में निम्नलिखित चार भारद्वाज परिवार थे लेकिन आज पूरा बुलक सिंह परिवार (भारद्वाज 4) और भारद्वाज 3 के तीन में से 2 शाखाएं कालकवलित हो चुकी हैं फिर भी ऐतिहासिक महत्व कि दृष्टि से उनका पूर्ण वर्णन किया गया है| पूरे भारद्वाज भूमिहार परिवार को निम्नलिखित चार वंशावलियों में वर्णित किया जा रहा है:-

परिवार कुर्सी/पीढ़ी का इतिहास वंशावली
राजाराम सिंह 7 भारद्वाज 1
तेजा सिंह 7 भारद्वाज 2
रामाधीन सिंह 2 भारद्वाज 3
बुलक सिंह 2 भारद्वाज 4



राजाराम सिंह परिवार

32. यह परिवार उत्तर प्रदेश से विस्थापित होकर टिकारी राज की मदद से गुलजाना ग्राम में बसाया गया| इसमें भी टिकारी राज की मंशा दरधा (बुढ़ नदी) के पश्चिम टिकारी राज का दृढ़ीकरण ही रही थी| आज के दिन इस परिवार की संख्या 33 है| इस परिवार के बसने की स्थानीय स्थिति के कारण इसे “पइन पर” कहा जाता है| इनकी वंशावली भारद्वाज 1 http://guljana.weebly.com के ‘Download’ पर देखी जा सकती है|

ग्राम गौरव
33. आज की तारीख में इस परिवार ने गुलजाना ग्राम को पांच इन्जिनियर (अभियंता) और तीन ऍम.बी.ए दिए हैं जिनके नाम निम्नलिखित हैं:-
• अवधेश शर्मा– स्व.राम विलास सिंह के सुपुत्र.
• धनञ्जय कुमार-श्री बालेश्वर शर्मा के सुपुत्र.
• संजय कुमार-श्री बालेश्वर शर्मा के सुपुत्र.
• विजय भरद्वाज-श्री सुरेश शर्मा के सुपुत्र.
• अजय शर्मा-श्री अवध सिंह के सुपुत्र.
• ऍम.बी.ए.के क्षेत्र में श्री ब्रिज नंदन शर्मा के सुपुत्र, श्री प्रमोद शर्मा की सुपुत्री (गुलजाना की पहली लड़की) तथा श्री चित्तरंजन शर्मा के पुत्र राजीव कुमार शामिल हैं|




तेजा सिंह परिवार (भारद्वाज 2)

34. यह परिवार एक से ज्यादा मामलों में विख्यात, कुख्यात, तथा स्मरणीय रहा है जिसकी वंशावली http://guljana.weebly.com के ‘Download’ भारद्वाज 2 पर दे चुका हूँ| जहाँ तक इसकी ख्याति का सवाल है इस परिवार ने अंगरेजों के ज़माने में स्व. बाल गोविन्द सिंह (तेजा सिंह के पौत्र, कन्हाई सिंह के पुत्र) तथा स्व. व्रह्मदेवसिंह (तेजा सिंह के प्रपौत्र, झरी सिंह के पौत्र) के रूप में गुलजाना गांव को दो मैंट्रीकुलेट्स दिए थे| बाल गोविन्द सिंह ने एक सभ्य औसत जीवन यापन किया| इनके वंश में आज ब्रज भूषण शर्मा और उनके भाईयों का परिवार है| व्रह्मदेव सिंह परिस्थिति वश नशे का शिकार होकर दो पुत्रों (पारस नाथ सिंह तथा केशव प्र. सिंह) के जन्म के बाद घर छोड़कर कहीं और चले गए| झरी सिंह के वंशजों ने अमीरी से गरीबी और गरीबी से अमीरी (Riches to Rags and Rags to Riches) की यात्रा चक्र पूर्ण कर एक अत्युत्तम उर्ध्वोंनत्ति और पुनरुत्थान का उदाहरण चरितार्थ किया है|


पारिवारिक कलह

35. तेजा सिंह के पौत्र तथा कन्हाई सिंह के ज्येष्ठ पुत्र शिव गोविन्द सिंह को लोग मुख़्तार साहब कहा कहते थे| इन्होंने ज़मींदारी हासिल की| रेयाया से लगन वसूलना और मुग़ल दरबार/अँगरेज़ बहादुर के खजाने में जमा करवाना ही ज़मींदारों का मुख्य ब्यवसाय, कर्त्तव्य और आमदनी का जरिया था| कहा तो यहाँ तक जाता है कि ज़मींदारी की खुमारी में मुख़्तार साहब ने अपने बड़े बेटे रघुनंदन सिंह उर्फ बड़े बाबू (निःसंतान) की मिलीभगत से अपने सहोदर भाई बाल गोविन्द सिंह तथा अपने चचेरे भाइयों रुपमंगल सिंह और नान्हू सिंह की संपत्ति की जिला जज की डिक्री को हाई कोर्ट में अपील कर येन केन प्रकारेण नीलाम करा कर खुद खरीद कर सम्पत्ति से बेदखल कर गांव बदर (ग्राम निष्कासित) कर दिया| महिलाएं सपरिवार अपने मैके चली गईं| शनैः शनैः उनकी आर्थिक स्थिति में सुधर होने लगी और एक दिन वे पुनः गुलजाना वापस आ गए और आज उनका परिवार धन धान्य संपन्न है और मुख़्तार साहब का परिवार जिनकी तूती बोलती थी, भूत कालीन परंपरा का आवरण ओढ़े गुमनामी के अँधेरे में सिमता चला जा रहा है| भाग्य-चक्र इसी तरह चलता है| दूसरी ओर व्रह्मदेव सिंह के पौत्र एवं पारस नाथ सिंह के चारों पुत्र न केवल कामयाबी के उच्च से उच्चत्तर बुलंदियों को छू रहे हैं बल्कि अपने चचरे भाइयों कि यथा संभव मदद भी कर रहे हैं|





रामाधीन सिंह परिवार (भारद्वाज 3)

36. इस परिवार की तीन शाखाओं में से दो गुलजाना से विलुप्त हो चुकी है| रामाधीन सिंह की दो वंश शाखाएं अर्थात रामौतार सिंह और कैलाश सिंह का वंश समाप्त हो चुका है| रामौतार सिंह के बेटे मथुरा सिंह अविवाहित एवं राजशेखर सिंह युवावस्था में मृत्यु के कारण निःसंतान रहे और उनके भांजे निमसर से भुनेश्वर सिंह (बिस्नोवा भूमिहार) उत्तराधिकारी बने| कैलाश सिंह के दोनों बेटे अर्जुन और बलि सिंह भी अविवाहित ही मरे और उनकी बची खुची सम्पत्ति उनके भांजे को मिली जो गुलजाना नहीं रहते| सिर्फ मुखी सिंह के दो बेटों (शिवपति सिंह और मुसाफिर सिंह) में शिवपति सिंह का ही विवाह हो सका जिनका वंश कायम है और जिसे http://guljana.weebly.com पर download भारद्वाज 3 पर देखा जा सकता है| रामाधीन परिवार की आश्चर्यजनक बात यह है कि यह परिवार सिर्फ चार पीढ़ी पुरानी है लेकिन अंतिम पायदान के उत्तराधिकारी सदस्य (भुनेश्वर सिंह) को अपने नाना के पिता का नाम भी मालूम नहीं है| हालाँकि यह सच्चाई नहीं हो सकती, फिर भी लोगों को ऐसा प्रतीत हो भी सकता है कि उन्हें सिर्फ संपत्ति लेने भर का स्वार्थ ही सिद्ध करना था !!!


बुलक सिंह परिवार (भारद्वाज 4)

37. यह परिवार भी तीन पीढ़ियों का परिवार है| चौथी पीढ़ी में अमरेन्द्र शर्मा (राम वृक्ष सिंह के नाती) इक्किल गांव से भागिनमान उत्तराधिकारी बने और सभी बाहरी उत्तराधिकारियों कि तरह उन्हें भी अपने नाना से तीन सीढ़ी ऊपर के लोगों के बारे में कुछ भी मालूम नहीं और यह भी मालूम नहीं कि उनके नाना कहाँ से गुलजाना आए थे|

अथरब परिवार
38. उद्गम. अथरब शब्द अथर्व का अपभ्रंश है| अथरब अपना उद्गम ऋषि अथर्व से मानते हैं लेकिन उनका गोत्र कौण्डिन्य है| इसका मतलब यह हुआ कि ऋषि कौण्डिन्य ने अथर्व के वंशज होते हुए भी अपने कुल पुरुष (ऋषि अथर्व) के स्तित्व को नकारते हुए अपनी वंशावली आरंभ की| गुलजाना में अथरब भूमिहार के निम्नलिखित परिवार हैं:-

परिवार कुर्सी/पीढ़ी का इतिहास वंशावली
सनेही सिंह 7 अथरब 1
बुलक सिंह 4 अथरब 1A
गिरधर भ्रातागण 5 अथरब 2
झंखुरी सिंह 5 अथरब 3A
दुर्गा सिंह 5 अथरब 3B
भागवत सिंह 5 अथरब 3C




39. गुलजाना में अथरब भूमिहार निम्नलिखित तीन गांवों से आए हैं :-
• संडा विस्थापित परिवार
• लोदीपुर विस्थापित परिवार
• परशुरामपुर विस्थापित परिवार

संडा विस्थापित परिवार

40. संडा गांव से गुलजाना अथरब भूमिहार के दो परिवार आए – सनेही सिंह परिवार (अथरब 1) और बुलक सिंह परिवार (अथरब 1A)| सनेही सिंह परिवार इनमे सबसे पुराना (सात पीढ़ियों का) है| चूँकि संडा गांव गुलजाना से सिर्फ 5-6 कि.मी. दूर है इसलिए इन दोनों परिवारों का संडा से पलायन के पीछे या तो इनकी गरीबी हो सकती है या गंभीर पारिवारिक कलह या फिर कोई अकथनीय घटना| हालांकि संडा से गुलजाना आने से गरीबी उन्मूलन कैसे हो सकता है यह संदेह का विषय है| फिर भी यह परिवार राजीव कुमार के रूप में(स्व.यदुनंदन मिश्र के पौत्र एवं वैदेही शर्मा के सुपुत्र) होटल प्रवंधन क्षेत्र में एक स्नातक देकर गांव का नाम अंग्रजों के देश इंग्लैंड में भी रौशन कर रहा है| बुलक सिंह का परिवार भी चार सीढ़ी पहले ही संडा से अकथनीय कारणवश गुलजाना आया| इस परिवार ने भी अनैरका (अमेरिका) सिंह के पुत्र रघुवंश शर्मा के रूप में एक अभियंता और सुबंश शर्मा के रूप में एक ओवरसीयर गांव को देकर मान बढ़ाया|

लोदीपुर-विस्थापित परिवार

41. सोनभद्र 2 (बाबा गोतिया) के बारे में लिखते समय यह पहले ही बता चुका हूँ कि स्व.मर्दन सिंह के द्वितीय पुत्र स्व. भैरो सिंह कि सिर्फ एक बेटी थीं जिनका विवाह टिकारी के पास लोदीपुर ग्राम में अथरब परिवार में हुआ था| उनके चार नाती थे| माता-पिता के स्वर्गवास के बाद और कतिपय अव्यक्त कारणों से लोदीपुर ग्राम में इन नातियों का जीवन दूभर हो गया था| अपने नाना भैरो सिंह के दिलाशे और भरोसे पर ये चारों नाती रोजी-रोटी की तलाश में अपने ननिहाल गुलजाना आ गए अतः यह परिवार बाबा गोतिया के भागिनमान हुए| ये चारों नाती थे – गिरधर सिंह, मनोहर सिंह, बिग्गन सिंह और जीवधर सिंह| नाना भैरो सिंह ने इनको स्थापित होने में बटाई अदि पर ज़मीन देकर यथा संभव मदद की लेकिन अपने नाना से भी इनकी नहीं बनी| शायद अपने नाना से इन्हें कुछ ज्यादा ही अपेक्षा थी| अंततः ये चारों भाई फिर रोजी-रोटी की तलाश में गुलजाना छोड़कर खिज़रसराय थाने के उचौली गांव में चले गए और अपने को स्थापित करने का प्रयास किया| पता नहीं क्या बात थी, यहाँ भी ये चारों भाई अपने परिवार को स्थायित्व देने में असफल रहे| घूम फिर कर ये चारों भाई पुनः गुलजाना वापस आ गए|

42. विपरीत परिस्थितियों में जीतने की जिजीविषा. इस बार यह परिवार कुछ खास ही इच्छा-शक्ति के साथ गुलजाना लौटा था| ‘कुछ भी हो, निश्चय कर अपनी जीत करूँ’ के नारे के साथ ये चारों भाई जीवन संग्राम में पिल पड़े| ज़मीन-जायदाद थी नहीं, बटइया-चौठईया पर कम कर के ये अपना जीवन-यापन करने लगे| गरीबी की इस विकट परिस्थिति में चार में से सिर्फ दो सबसे बड़े और सबसे छोटे भाइयों (गिरधर और जीवधर सिंह) का ही विवाह हो सका| मनोहर और बिग्गन सिंह कुंआरे रह गए| ज्येष्ठ की दुपहरी में एक दिन जब गिरिधर सिंह भवनपुर स्कूल के सड़क पर पीपल के नीचे बैठ कर अपने सुनहरे भविष्य का दिवा-स्वप्न देख रहे थे, ठीक उसी समय भवनपुर के एक सज्जन जिनका नाम बालक सिंह था मनो इनके सपने को मूर्त रूप देने के लिए आ पहुंचे| जब उन्होंने पीपल के नीचे बैठे गिरधर सिंह से इनकी उदासी का कारण पूछा तो इनके सब्र का बांध टूट गया और वे फफक पड़े और अपनी तंग हाली का पूरा हल बयां कर दी| उदारमना बालक सिंह का बाल-मन द्रवित हो गया और उन्होंने इनको इस विपदा से उबारने के लिए व्रह्म स्थान का साढ़े सात बीघे का अपना एक प्लाट मात्र 56/-रुपये में देने का प्रस्ताव रख दिया| गिरधर सिंह ने इसके लिए कुछ समय माँगा ताकि पैसों का इन्तजाम कर सकें| घर आकार भाइयों से राय-मशवरा करने के बाद अपने घर की पूरी चल-अचल संपत्ति बेच कर कुल 28/- रु ही जमा कर सके| भवनपुर बालक सिंह से मिलकर उन्होंने 56/-रु जमा करने में अपने असमर्थता जाहिर की| स्व. बालक सिंह इतने दयालु थे की 28/-लेकर ही उन्होंने 7.5 बीघे का प्लाट इस विश्वास पर दे दिया की बाकि के 28/-रु. धीरे धीरे उस खेती की आमदनी से उन्हें चुका दिया जाय| महानता, सरलता और दूसरे गांव के आदमी पर इस तरह का विश्वास आज के दिन एक राम-राज्यीय आदर्श वाक्य की तरह लगता है|

43. उस दिन से आजतक उस परिवार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा| अपने हाड़-मांस को पसीने में पिघलाकर दिन रात मेहनत कर इस परिवार ने अपना कर्ज चुकाया, अपनी आर्थिक दशा मजबूत की और गांव को पहला एम.ए (अर्थशास्त्र) योग्यता-धारी स्व. भुवनेश्वर सिंह के रूप में दिया| आज यह परिवार खुश हाल है और कोई भी सामाजिक उत्सव/कार्य इस परिवार के सहयोग के बिना अधूरा सा प्रतीत होता है| इस परिवार की वंशावली अथरव -2 http://guljana.weebly.com के Download पेज पर दे चुका हूँ|

परशुरामपुर विस्थापित परिवार (अथरब 3A,B&C)

44. यह परिवार गुलजाना गांव के हिसाब से सबसे बाद में ताजा-ताजा आया हुआ परिवार है क्योंकि गुलजाना में इस परिवार का इतिहास सिर्फ चार पीढ़ी ही पुराना है| ये तीनों परिवार एक ही गांव परशुरामपुर से एक ही समय आए और एक ही खानदान के हैं लेकिन तीन पीढ़ी उपर के अपने मूल पूर्वज का नाम किसी को मालूम नहीं है| इनकी वंशावली http://guljana.weebly.com के Download पेज पर अथरब 3A, B और C के रूप में दे चुका हूँ| इस परिवार ने स्व. रामदेव सिंह के पौत्र एवं स्व. कपिलदेव शर्मा के सुपुत्र रणजीत कुमार के रूप में एक बैंक प्रबंधक देकर गुलजाना को कृतार्थ किया है|


द्रोनटिकार(डोमकटार) भूमिहार

हुसेनी सिंह परिवार – 5 पीढ़ियों का इतिहास

45. गुलजाना ग्राम में द्रोनटिकार भूमिहार जिसे बोलचाल की भाषा में डोमकटार भूमिहार के नाम से भी पुकारते हैं, का सिर्फ एक ही घर हैं | महाराजा टिकारी भी डोमकटार भूमिहार ही थे| डोमकटार भूमिहार भरद्वाज गोत्र के होते हैं| इस परिवार के सबसे छोटे सदस्य ने अभी अभी इसके पांचवें पायदान पर कदम रखा है| किंवदन्ती है कि यह परिवार गुलजाना का सबसे पुराना बसा भूमिहार परिवार है लेकिन इनके पास करीब 70-80 साल पहले के पूर्वजों का कोई विवरण उपलब्ध नहीं है| गुलजाना के इर्दगिर्द के गांव जैसे कि पूरा, मुस्सी, भोरी और सोवाल आदि के वासी डोमकटार भूमिहार हैं लेकिन गुलजाना में यह परिवार कहाँ से आया वह आज हुसेनी परिवार का कोई भी जीवित सदस्य नहीं जानता| इस सन्दर्भ में एक और बात गौरतलब है कि अगर यह परिवार गुलजाना का सबसे पुराना मूल निवासी है तो इनका इतिहास 200 साल से पुराना और इनके पास नौ-दस पीढ़ियों का ब्यौरा होना चाहिए था क्योंकि 200 साल से ज्यादा पुराना नौ पीढ़ियों का भूमिहार परिवार इस गांव में मौजूद है| अगर यह परिवार इतना पुराना होता तो इसकी वर्तमान पारिवारिक संख्या भी कम से 40-50 के करीब होती, जबकि इस परिवार कि वर्तमान संख्या 8-9 के करीब है, हालांकि आज इस परिवार के कृष्ण देव शर्मा के पितामह के एक भाई गुलजाना से विस्थापित होकर भैंसमारा गांव में जाकर बस गए हैं|

ग्राम-गौरव में योगदान

46. जो कुछ भी हो, इस डोमकटार परिवार ने गुलजाना को पहला इंजीनियर कृष्ण देव शर्मा के रूप में देने का इतिहास कायम किया है| इतना ही नहीं, इनके प्रथम सुपुत्र राकेश शर्मा भी इनके पदचिन्हों पर चलकर पिता-पुत्र की इंजीनियर जोड़ी बनाकर दूसरा इतिहास कायम किया| इनकी वंशावली द्रोनटिकार भूमिहार नाम से http://guljana.weebly.com के Download पेज पर दे चुका हूँ|

उपसंहार

47. यहाँ अब मैं गुलजाना सम्बन्धी भूत और वर्तमान की सूचनाओं और तथ्यों के संकलन, परिमार्जन और प्रस्तुतीकरण के अपने प्रयास को विराम दे रहा हूँ| इनमें कुछ ऐसे भी तथ्य शामिल हैं जिनको अगर वक्त रहते उजागर नहीं किया जाता तो ये वक्त के अँधेरे में विलीन हो जाते| मेरी चिर-पोषित इच्छा थी कि अति साधारण ऐतिहासिक विरासत वाले अपने गांव गुलजाना को अगर अपनी योग्यता से नहीं तो किसी और स्वीकार्य तरीके से विश्व-पटल पर लाकर ही चैन कि साँस लूँ| घर घर जाकर सूचनओं के छोटे-मोटे टूटे धागों को इकट्ठा कर, उसे जोड़ कर, स्वविवेक और सर्व-स्वीकार्य तर्क के आधर पर उसे बुनकर इस लेख के रूप में लाना, मुझ अकेले के लिए मुश्किल था| इस प्रयास में मुझे सर्वश्री सुदामा सिंह, बच्चू सिंह, भजुराम सिंह, महेंद्र शर्मा, कृष्ण देव शर्मा, मुनेश्वर शर्मा, वैदेही शर्मा, दिलीप कुमार तथा जीतेन्द्र कुमार आदि का भरपूर सहयोग मिला जिसके लिए मै इन सबों का आभार प्रकट करता हूँ| http://guljanaavillageingayabihar.blogspot.com/ पर इससे पहले मैंने अंग्रेजी ब्लॉग में गुलजाना के बारे में इन्ही तथ्यों को प्रकाशित किया है| लगता है कि इन्टरनेट-पहुँच वाले लोगों को यह बहुत पसंद आया है, जिसे http://guljana.weebly.com पर लिंक के रूप में देखा जा सकता है| इस हिंदी संस्करण को भी मै http://guljana.weebly.com पर प्रकाशित कर रहा हूँ| अब तो हालत यह है की गूगल पर सिर्फ गुलजाना लिखकर सर्च बटन दबाइए और गुलजाना का पूरा इतिहास आपके सामने होगा| मुझे इस बात कि और भी खुशी है कि इसके देखा-देखी और भी कुछ गाँवों के लोग ऐसा ही करने का प्रयास कर रहे हैं| मैं उनके इस प्रयास के लिए उन्हें अपनी हार्दिक शुभ कामनाएं देता हूँ|

48. इस लेख के माध्यम से मैं गुलजाना के युवकों और आने वाली नई पीढ़ी के नव-युवकों से अपील और आग्रह करना चाहता हूँ कि वे अपनी असीम युवा-शक्ति को पहचानें और उसपर भरोसा कर अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति और आत्म-विश्वास के साथ आने वाली चुनौतियों का सामना करें| इस गांव के इतिहास में ही आपने देखा है कि किस तरह सिर्फ अटूट इच्छा शक्ति के सहारे अशिक्षित तो नहीँ पर निरक्षर से निरक्षर लोगों ने भी गरीबी के दलदल से निकलकर आसमान कि बुलंदियों को छुआ हैं| आप तो जानते ही हैं – “जहाँ चाह है वहाँ राह है”| किसी दूसरे पर अमरलता कि तरह परावलम्बी और पराश्रयी होना मानवीय अवनति की पराकाष्ठा हैं| आपमें वह असीम शक्ति है जो आपको अगर दुर्गुणों में दक्ष कर सकती है तो वही शक्ति उचित दिशा में संचालित होकर आपको उन्नत्ति के उच्च शिखर पर भी ले जा सकती है| आप क्या थे? क्या हैं और आपका वर्तमान कार्य आपको कहाँ ले जायेगा? यह बात सदा अपने दिमाग में गांठ बाँधकर रख लें| अपनी विरासत, विकासोन्मुख परंपरा और संस्कारों का ख्याल रखकर आप अपनी शक्ति को पहचानें और उसका समुचित उपयोग कर उच्च से उच्चतम शिखर पर पहुंचें| आपके लिए यही हमारी ईश्वर से प्रार्थना है| मै जहाँ भी रहूँ, न रहूँ, या जिस रूप में भी रहूँ, आपकी उन्नत्ति हमें कुछ न कुछ खुशी अवश्य देगी| ईश्वर आपको सदा सदबुद्धि और सफलता दे| चूँकि यह प्रस्तुति ग्राम वासियों द्वारा दिए सूचनाओं पर आधारित है और कुछ महत्वपूर्ण तथ्य छूट जाने की संभावना हो सकती है जिसके लिए मुझे ई. मेल/फोन कर अपना बहुमूल्य सुझाव देकर कृतार्थ करें| और हाँ, मैं हिंदी भाषा के अपने अल्प ज्ञान और व्याकरण की अशुद्धियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ|


ले.कर्नल विद्या शर्मा, (से.नि.)
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(Mob-09693812578, 09304497009, 09470053198)