Saturday, April 22, 2023

 

ब्रह्मर्षि परशुराम का इतिहास

 

कान्यकुब्ज (कन्नौज) नामक नगर में गाधि नामक राजा था| उसे एक अप्सरावत सुंदर कन्या पैदा हुई जिसका नाम सत्यवती था| भृगुनन्दन ऋचीक मुनि ने गाधि राजा से कन्या की याचना की| विष्णुपुराण के अनुसार गाधि ने अति क्रोधी और वृद्ध ब्राह्मण ऋचीक को अपनी पुत्री नहीं देने की इच्छा से कन्याशुल्क रूप में अतिदुर्लभ एक सहस्त्र श्यामकर्ण  श्वेत अश्वों की मांग की हालांकि उस काल में विवाह में कन्या-शुल्क शास्त्रवर्जित था| ऋचीक मुनि वरुण के पास गए और एक श्यामकर्ण वाले सहश्र अश्व मांग लाए जिसे गाधि को देकर उनकी कन्या से विवाह किया| वाल्मीकीयरामायण में कोई शुल्क का जिक्र नहीं है और राजा गाधि ने सहर्ष उस कन्या का विवाह ऋचीक मुनि से कर दिया| विवाहोपरांत भृगु ऋषि आये और अपने पुत्र को सपत्नीक देखकर प्रसन्न हो पुत्रवधू को वर मांगने को कहा| सत्यवती ने अपने और अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की| एवमस्तु कह भृगु जी ने कहा कि तुम्हारी माता पीपल वृक्ष और तुम गूलर वृक्ष की शरण में रहकर  उसका आलिंगन करना तथा तीर्थों के पवित्र जल से स्वयं चरु तैयारकर एक सत्यवती और एक उसकी माता को खाने के लिए दिया| श्रीमद्भागवतपुराणानुसार भृगु ऋषि नहीं बल्कि ऋचीक ने ही चरु एवं वर प्रदान किये| सत्यवती की माता ने यह सोचकर की ऋषि ने अपनी पुत्रवधू के लिए अवश्य ही अच्छे पुत्र के लिए ऐसा किया होगा, उसने पीपल की जगह गूलर का आलिंगन  कर लिया और बेटी के लिए निश्चित चरु को खा लिया एवं उनकी पुत्री को पीपल का आलिंगन और माँ के निमित्त चरु का भक्षण करना पड़ा|

 

बहुत दिनों बाद जब भृगु ऋषि वापस आये तो उन्होंने दिव्य दृष्टि से सब जान लिया| (श्रीमद्भागवत के अनुसार ऋचीक मुनि ने योगबल से सब जान लिया)| उन्होंने अपनी पुत्रवधू से कहा कि तेरी माता ने तुझे धोखा दिया है| अब तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रियों जैसा आचरण वाला होगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणोचित  आचारण वाला होगा| सत्यवती ने अपने स्वसुर भृगु ऋषि से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र ऐसा न हो भले ही मेरा पौत्र ऐसा हो जाये| भृगु ऋषि तथास्तु कह लौट गए| यथासमय सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि मुनि का जन्म हुआ जो बड़े तेजस्वी और प्रतापी थे| कालक्रम से जमदग्नि मुनि ने राजा प्रसेनजित की कन्या रेणुका से विवाह किया जिससे पांच पुत्र हुए जिनमें परशुराम सबसे छोटे थे| परशुराम जी का जन्म वैशाख शुक्लपक्ष द्वितीया को हुआ था| कहीं कहीं परशुराम का जन्म वैशाख शुक्लपक्ष अक्षय त्रितीया को हुआ माना जाता है लेकिन स्कन्धपुराण के वैशाखमाहात्म्य में वर्णित अक्षयतृतीया में इसका कोई जिक्र नहीं है| भाईयों में छोटे होने पर भी परशुराम  गुणों में सबसे बढ़चढ़ कर थे हालांकि चरु प्रभाव से ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रियोचित गुणसम्पन्न थे|

 

एक दिन रेणुका नदी में स्नान करने गई तो राजा चित्ररथ को जलक्रीड़ा करते देख मन से विचलित हो गई| आश्रम में लौटने पर जमदग्नि मुनि ने उसके मानसिक विकार को जान लिया और ब्रह्मतेज से च्युत होने पर उन्हें बहुत धिक्कारा| इतने में उनके चारो पुत्र रुक्मवान, सुषेण, वसु और विश्वावसु आ गए| उन्होंने चारों से अपनी माँ को मार डालने के लिए कहा किन्तु मोहवश उनके चारों पुत्रों ने आज्ञा पालन नहीं किया| मुनि के श्राप से वे जड़बुद्धि हो गए| इतने में कनिष्ठ पुत्र परशुरामजी आ गए| मुनि ने उन्हें भी अपनी पापिनि माता को मारने के लिए कहा| परशुरामजी ने आव देखा न ताव,  तुरंत परशु से अपनी माता का सर काट डाला| जमदग्नि जी ने  प्रसन्न हो वर मांगने के लिए कहा| परशुराम जी ने माता के जीवित होने, उन्हें इस मृत्यु की याद न रहने, भाईयों के स्वस्थ होने, अपने लिए युद्ध में उन्हें कोई परास्त न करने तथा दीर्घायु होने का वर माँगा जिसे जमदग्नि मुनि ने सहर्ष प्रदान किया|

 

क्षत्रिय-विनाश

श्रीमद्भागवतपुराण (९/१५/१४,१५) स्कंध ९, अध्याय १५, श्लोक सं १४,१५ के अनुसार हैहयवंशी तथा अन्य कर्मच्युत, रजो एवं तमोगुणी, आततायी क्षत्रियों के नाश के लिए ही स्वयं विष्णु ने  परशुराम के रूप में छठा अवतार लिया था| ब्रह्मर्षि परशुराम के सामर्थ्य के लिए निम्नलिखित श्लोक रचा गया है:-

अग्रतः चतुरो वेदाः, पृष्ठतः सशरः धनुः|

इदं ब्राह्मः, इदं क्षात्रः, शास्त्रादपि शरादपि||

“मुख में वेद, पीठ पर तरकश, कर में कठिन कुठार विमल;

शाप और शर दोनों ही थे, जिस महान ऋषि के सम्बल| (राष्ट्रकवि दिनकर)

अर्थात् परशुराम जी के समक्ष चारो वेदों का ज्ञान, पीठ पर वाणों से भरा तरकशविद्यमान था|  ब्राह्म और क्षात्र गुण सम्पन्न यह ऋषि शास्त्र से या शस्त्र से हर हालत में विजय पाने में समर्थ थे| इन्होने स्वयं भगवान शंकर से शस्त्र की शिक्षा ली थी और शंकर ने उन्हें अपना एक धनुष उनकी वीरता से प्रसन्न होकर दिया था जिसपर बाण चढ़ाने वाले सिर्फ विष्णु या उनके अवतार ही हो सकते थे| इन्हीं गुणों के कारण इन्हें ब्रह्मक्षत्रिय भी कहते हैं| शास्त्रों के अध्ययन से आभास होता है कि ब्रह्मास्त्र संचालन ज्ञान का एकाधिकार मूलतः परशुराम जी के पास ही था| बाद में उन्होंने ने भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण को इसकी शिक्षा दी हालांकि कर्ण की शिक्षा शापवश उसके काम नहीं आई|

एक बार हैहयवंशी कार्तवीर्य का पुत्र अर्जुन जिसे हजार भुजाओं के कारण सहश्रार्जुन भी कहा जाता था, जमदग्नि ऋषि के आश्रम  को नष्ट कर होमधेनु के बछड़े (श्रीमद्भागवत के अनुसार होमधेनु) को ले भागा| सहश्रार्जुन ने रावण को भी बात बात में कैद कर रखा था| परशुरामजी जी ने उस सहश्रार्जुन की भुजाओं को काटकर मार डाला| इससे सहश्रार्जुन के पुत्रों को बहुत क्रोध आया और उन्होंने जमदग्नि जी को ही मार डाला| जब परशुरामजी आश्रम आये तो आग बबूला हो गए और न सिर्फ सहस्रार्जुन के सभी पुत्रो को मार डाला बल्कि उसके सहस्त्र अक्षौहिणी सेना तथा जो भी क्षत्रिय उसका साथ दे रहे थे सबका सफाया कर दिया| इतना ही नहीं, महाभारत के आश्वमेधिकपर्व (संक्षिप्त महाभारत द्वितीय खण्ड पृष्ठ सं ६७७) के अनुसार क्षत्रियों के मारे जाने पर ब्राह्मणों ने उनकी स्त्रियों से नियोगविधि से पुत्र उत्पन्न किये परन्तु उन्हें भी परशुराम जी ने मौत के घाट उतार दिए|  इस तरह हैहयवंश वंश ही नहीं कालक्रम से २१ बार उन्होंने पृथ्वी को आततायी धर्मभ्रष्ट क्षत्रियों से विहीन कर दिया था| तब उनके पित्रिगणों ने उन्हें रोका और पुनः शुचितापूर्वक तपस्या करने की आज्ञा दी|

इस तरह पृथ्वी को २१ बार क्षत्रियविहीन कर उन्होंने समन्तपंचक क्षेत्र में पांच  सरोवर कुण्डों को क्षत्रियों के रक्त से भर दिया और सम्पूर्ण पृथिवी की भूमि कश्यप गोत्रीय ब्राह्मणों को सौंपकर सुदूर दक्षिण महेंद्र पर्वत पर चले गए| यहीं से ब्राह्मणों का वह समुदाय जिसने भूमिप्रवंधन, तथा इसके उपयोग और उपभोग का कार्य सम्भाला, अपने आप को ब्रह्मर्षि परशुराम वंशज या स्वयंभू-ब्रह्मर्षि की उपाधि से अपने आप को विभूषित कर लिया हालांकि परशुराम आजीवन ब्रह्मचारी और अविवाहित थे| इस तरह भूमिहार ब्राह्मणों का अपने आप को ब्रह्मर्षि परशुराम वंशज कहना और कहलवाना कितना तथ्यपरक है, कहने की आवश्यकता नहीं| फिर भी ब्राह्मणों को समय समय पर मिले भूमि-दान की परम्परा अर्वाचीन है|

भूमिहार ब्राह्मण का तार्किक और अकाट्य उद्भव और विकास की जानकारी के लिए मेरा लेख भूमिहार ब्राह्मण का इतिहास, वर्तमान स्थिति और पुनरुद्धार के उपाय को उद्धृत किया जा सकता है जो www.facebook.com/vidyasharmaguljana और हमारे ब्लॉग http://guljanaavillageingayabihar.blogspot.in/ पर भी उपलब्ध है| ज्ञानपिपासु पाठक उसे आसानी से देख सकते हैं|

परशुराम और राम

         परशुराम और राम का साक्षात्कार तीन ग्रंथों यथा वाल्मीकिरामायण, महाभारत और तुलसीकृत रामचरितमानस के अनुसार निम्नलिखित तीन विभिन्न परिस्थितियों में हुआ जो एक दूसरे से भिन्न हैं -

वाल्मीकिरामायण जो इन ग्रंथों में सबसे प्राचीन ग्रंथ है, के अनुसार जब महेंद्रगिरि पर परशुराम जी को मिथिला में राम द्वारा शिवधनुष तोड़ने का समाचार मिला तो वे  अपनी त्वरित गमन-शक्ति प्राप्त वरदान के कारण जनकपुर को प्रस्थान कर गए| रास्ते में विवाह के बाद अयोध्या लौटते दशरथ और राम आदि मिले| शिव जी का दूसरा धनुष जो परशुराम जी के पास था उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए उन्होंने राम को  दिया| राम ने प्रत्यंचा चढ़ाकर आपने वाण से परशुराम के तपोबल का नाश कर दिया लेकिन उनके त्वरितगमन शक्ति को नष्ट नहीं किया| राम के विष्णु-अवतार होने से आश्वस्त हो वे वापस महेंद्रगिरि पर्वत पर वापस जाकर पुनः तपोनिष्ट हो गए| 

          महाभारत के वनपर्व के अनुसार महेंद्रगिरि पर  दशरथ के पुत्र रूप विष्णुअवतारी राम की अद्भुत शौर्यगाथा सुनकर परशुराम जी को बड़ा कुतुहल हुआ| इसलिए राम से मिलने और इसकी सत्यता तथा राम के पराक्रम की परीक्षा लेने के लिए परशुराम जी अयोध्या नगरी पहुंचे| वहाँ पहुंचकर उन्होंने राम से कहा कि अगर तुममें सामर्थ है तो मेरे इस कराल शिव धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाओ जिसे राम ने हंसी-खेल में ही चढ़ा दिया| तब परशुराम जी ने उन्हें एक दिव्य बाण देकर कहा की इसे चढ़ाकर अपने कान तक खींचकर दिखाओ| इस पर राम को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा कि भृगुनन्दन आप बड़े अभिमानी जान पड़ते हैं|आपने अपने पितामह ऋचीक की कृपा से क्षत्रियों का वधकर यह तेज प्राप्त किया है, इसी से आप मेरा भी तिरष्कार कर रहे हैं| फिर भी मैं आपको दिव्य नेत्र देता हूँ जिससे आप मेरे वास्तविक स्वरूप को देखिये| राम ने उन्हें अपना विष्णु ऐश्वर्य दिखाया जिसमें सारी श्रृष्टि समाहित थी| फिर राम ने वह बाण संधानकर छोड़ दिया जो परशुराम के तेजोबल का नाश कर पुनः राम के पास वापस आ गया| जब परशुराम को कुछ चेत हुआ तो वे  विष्णुअंशधारी राम को प्रणाम कर महेंद्रगिरि पर वापस आ गए और उदास एवं लज्जित रहने लगे| पित्रिगणों ने जब उन्हें तेजहीन देखा तो उन्होंने राम के प्रति परशुराम के व्यवहार की निंदा की| उन्हें पुनः तेजोमय होने के लिए वधूसरकृता नामक नदी में, जिसके किनारे उनके प्रपितामह भृगु ऋषि की  तपस्या करने के कारण वह अति तेजोमय और पवित्र फलदायिनी हो गई थी, स्नान करने को कहा| ऐसा कर परशुराम जी ने अपनी तेजश्विता और अपना सामर्थ पुनः प्राप्त कर लिया|   

          रामचरितमानस जो सबसे नया ग्रंथ है, में तुलसीदास ने तो परशुराम को सीधे जनकपुरी के धनुषयज्ञ में ही पहुंचा दिया जहाँ राम-परशुराम-लक्ष्मण-सम्वाद को अति  नाटकीयता के साथ रोमांचकारी स्थिति में लोकप्रियता की चरम सीमा पर पहुंचा दिया गया| तुलसीदास ने परशुराम की उग्रता, प्रभाव और भयोत्पादकता का वर्णन  निम्नलिखित चौपाई के माध्यम से किया है:-

"भुजबल भूमि भूप बिनु किन्हीं|
बिपुल बार मही देवन दीन्ही||

उपरोक्त सन्दर्भों के आधार पर एक बात बड़ी ही स्पष्टता से कही जा सकती है कि हमारे शास्त्रों में सदा ही तथ्य और कथ्य की भिन्नता रही है जो शास्त्रकारों के संदर्भ-गठन के आधार पर निर्भर करती रही है| वाल्मीकि और तुलसीकृत रामायण में तो ऐसे संदर्भ-वैभिन्य उदाहरणों की बहुलता रही है| इसमें यह कहना कि कौन शास्त्रकार सही है और कौन गलत, यह निरर्थक होगा| हाँ, इससे एक बात स्पष्टता से कही जा सकती है कि शास्त्रों का उदेश्य उदाहरणों के द्वारा  मार्गदर्शन और शिक्षा प्रदान करना होता है न कि सन्दर्भों की सत्यता सिद्ध करना| त्रेतायुगीन राम के समकालीन वाल्मीकि को क्या मालूम था कि द्वापरयुगीन कृष्णद्वैपायन (वेदव्यास) परशुराम को किस संदर्भ में प्रस्तुत करेंगे और इन दोनों को क्या मालूम कि तुलसीदास नानापुराणनिगमागमसम्मतंयत्, रामायणोंनिगधितम् क्वचिदन्यतोऽपि कहकर परशुराम का महिमामंडन भुजबल भूमि  भूप बिनु किन्हीं| बिपुल बार मही देवन दीन्हीं के रूप में करेंगे|

इस तरह हम भूमिहार ब्राह्मण तार्किक या अतार्किक कारणों से अपने आपको आजन्म ब्रह्मचारी परशुराम के वंशज और ब्रह्मर्षिनंदन के रूप में स्थापित कर बैठे हालांकि हमे अपने आपको ब्राह्मण कहने में कहीं-कहीं हिचकिचाहट होती है| मानो या न मानो हम हैं तो ब्राह्मण ही| जितनी जल्दी हमारा समाज इस वास्तविकता को स्वीकारेगा उतनी ही जल्दी हमारा दम्भ समाप्त होगा और हम उत्तरोत्तर उन्नति के उच्च शिखर पर आरूढ़ होंगे| साथ ही जबतक हम परशुराम द्वारा पृथ्वी को २१ बार क्षत्रियविहीन करने की कथा पर झूठा गर्व प्रदर्शन करते रहेंगे तबतक न सिर्फ क्षत्रियों की इर्ष्या वरण द्वेष और अप्रत्यक्ष शत्रुता का आघात भी झेलते रहेंगे| ब्रह्मर्षि समाज कहलाने में कोई दोष या आपत्ति नहीं लेकिन अविवाहित, नैष्ठिक ब्रह्मचारी परशुराम  की संतान (ब्रह्मर्षि नंदन)?? खासकर हमारी युवा पीढ़ी को इसपर मनन करना होगा|

वर्तमानकाल में परशुराम मंदिर हिमाचल प्रदेश के नहान शहर से ४० किलोमीटर दूर गिरि और जलाल नदी के संगम पर सिरमौर जिला में स्थित है| वहीं पर रेणुका झील भी है जहाँ कार्तिक शुक्ल एकादशी को बहुत बड़ा मेला का आयोजन होता है| भारत में आठ स्थान परशुराम क्षेत्र के नाम से जाने जाते हैं जिनका नाम निम्नलिखित है:-

१.उडुपी, २सुब्रमण्यम, ३. कोल्लूर, ४.शंकरनारायण, ५.कोटेश्वर, ६.कुम्बासी,  ७.गोकर्ण और ८.परशुराम कुण्ड, अरुणाचल प्रदेश|

 

(ले.कर्नल विद्या शर्मा, से.नि.)

गया, १५ जनवरी २०१५                          

                                                           

                                                                     

 

 

 

 

 

Saturday, October 20, 2018

स्तन कर (मलयालम में मुलाक्करम/मूला-करम) Breast Tax.


स्तन कर (मलयालम में मुलाक्करम/मूला-करम) Breast Tax.

सामाजिक विकास की कथा कंटकाकीर्ण इतिहास के पथरीले रास्ते पर संघर्षपूर्ण  अभियान की लोमहर्षक यात्रा रही है| इस विकास यात्रा में सफल वही रहा है जिसने हर स्थिति में अपने स्तित्व की रक्षा की है| सर्व शक्तिमान का स्तित्व (Survival of the fittest) कमजोर और निर्बल पर अपना एकाधिकार स्थापित कर अपना शासनतन्त्र कायम करता आया है| इसीलिए कोई भी सम्वैधानिक शून्यता की स्थिति में प्राचीन काल के नृप को ईश्वर का प्रतिनिधि मान लिया जाता था जिससे नृप कोई गलती नहीं कर सकता (King can do no wrong) की अवधारणा सर्वमान्य हो चुकी थी| राजाज्ञा के विरुद्ध कोई विकल्प नहीं था|

ज्यादा दूर की बात नहीं, हाल की 19वीं सदी में भी कुछ ऐसी क्रूर एवं अमानवीय परम्पराएँ प्रचलित थीं जिसे आज मात्र 100-150 वर्ष बाद ही विश्वास करने में संशय होता है लेकिन ऐतिहासिक सच्चाई से मुंह भी मोड़ा नहीं जा सकता|

बात 1859 की है| केरल के त्रावणकोर में उत्तम थिरूनल मार्तण्ड वर्मा द्वितीय (1846 -1860) का राज था| तत्कालीन त्रावणकोर में एक अति निंदनीय प्रथा व्याप्त थी| दलित, अछूत, अवर्ण एवं शूद्र महिलाओं को अपना स्तन ढकने की राजकीय मनाही थी| उनके लिए खुले समाज में  ऊर्ध्व वस्त्र पहनने की मनाही थी|  अगर कोई महिला खुले समाज में अपना वक्ष ढक कर निकलना चाहे तो उसे स्तन कर देना पड़ता था जो राजकोष में जमा होता था| स्तन कर को मलयालम में ‘मुलाक्करम’ कहा जाता था| स्तन कर की रकम का निर्धारण  महिलाओं के स्तन के आकार के हिसाब से तय होता था| स्तन के विकास के साथ ही स्तन कर लगा दिया जाता था| खुले समाज में इनके  स्तनों का नहीं ढकना उच्च जाति के सवर्णों के प्रति  प्रतिष्ठा प्रदर्शन का सूचक  था| नायर जाति की औरतों को नम्बूदरी ब्राह्मणों के सामने स्तन वस्त्रहीन करके रखना पड़ता था, नम्बूदरी ब्राह्मण स्त्रियाँ  देवताओं की मूर्तियों के सामने वस्त्रहीन स्तन रखती थीं| और भी नीची जाति के नाडार (शनार) महिलाओं को स्तन ढकने पर पूरा प्रतिबंध था| इतना ही नहीं, इन महिलाओं के लिए आभूषन पहनने पर और इनके मर्दों को मूंछ रखने पर भी टैक्स लगता था|

काले कानून के इस सन्दर्भ में चेरथला गाँव की एझावा जाति की एक गरीब अछूत कन्या नान्गेली स्तन कर देने में न तो समर्थ थी और ना हीं स्तन कर देना स्वीकार करती थी| इस तरह वह अपना वक्ष सदा ढक कर रखती थी| दिन-रात  स्थानीय कर संग्राहकों (प्रवथियार) का हुजूम उसके घर के आगे चक्कर लगाता रहता था| स्तन कर देने के लिए तरह-तरह से उसे तंग किया जाता था| इस तरह उसका जीवन दूभर हो गया|
इस तरह तंग और लाचार होकर नांगेली ने स्तन कर का विरोध कर दिया| न तो वह कर देती और ना हीं वक्ष को नंगा रखती| स्तन कर वसूलने के लिए अंततः त्रावणकोर रियासत का टैक्स कलेक्टर आ पहुंचा|
लाचार होकर नांगेली घर में गयी और धार-दार हथियार से अपना दोनों उरोज काटकर केले के पत्ते पर रखकर उसने रियासत के टैक्स कलेक्टर को दे दिए और ज्यादा रक्त बहाव के कारण अपनी दहलीज़ पर ही गिर कर उसने दम तोड़ दिए| इस घटना को देखकर टैक्स कलेक्टर जान प्राण की परवाह किये बगैर बेतहाशा भाग खड़ा हुआ| नान्गेली का पति चिरुकंदन इस दुःख को बर्दाश्त नहीं कर सका और उसकी चिता में कूद कर अपनी इहलीला समाप्त कर दी| मानव इतिहास में पुरुष सती होने का यह पहला और शायद अंतिम उदाहरण है| यह सनसनीखेज घटना जंगल की आग की तरह पूरी रियासत में फ़ैल गयी| सैंकड़ो  लोगों की विद्रोह श्रृंखला (चन्नार विद्रोह आदि) फूट पड़ी जिसके चलते इस क्रूर अमानवीय कुरीति का खात्मा 1959 में तत्सामयिक मद्रास के गवर्नर के हस्तक्षेप से समाप्त हुआ| नांगेली के इस बलिदान के कारण वह  स्थल मुलाचीपरम्बू (स्तन वाली औरत का स्थान) के नाम से प्रसिद्ध हो गया| नान्गेली का नाम इतिहास के पन्नों में बहादुरी के साथ अपनी स्मिता की रक्षा और अमानुषिक कुरीति के उन्मूलन के लिए सदा अमिट हो गया|
BBC इस पर एक डॉक्यूमेंट्री बना रही है| इसे देखकर नकलची हिन्दुस्तानी इतिहासकार भी इसे केरल के सरकारी लिखित दस्तावेज में सम्मिलित करने के प्रयास में हैं|

Tuesday, February 18, 2014

ब्राह्मण (भूमिहार) का इतिहास,वर्तमान स्थिति और पुनरुद्धार के उपाय

ब्राह्मण (भूमिहार) का इतिहास वर्तमान स्थिति और पुनरुद्धार के उपाय


भूमिका

ब्राह्मण (भूमिहार) या भूमिहार ब्राह्मण के इतिहास पर बात करने से पहले हमें ब्राह्मण के इतिहास पर गौर करना होगा इसके लिए श्रृष्टि की रचना पर विचार करना होगा
सिर्फ तभी हम भूमिहार ब्राह्मण के इतिहास को समग्रता से समझ सकेंगे
श्रृष्टि-रचना की धार्मिक मान्यता के रहस्य को विज्ञान की कसौटी पर कसे बिना हम इसके वास्तविक स्वरूप को नहीं समझ सकेंगे


श्रृष्टि-रचना में श्रीमद्भागवतपुराण और डार्विन के सिद्धांत का विश्लेषण

श्रृष्टि-रचना के सिद्धांत की व्याख्या श्रीमद्भागवतपुराण (2/5/32-35) द्वितीय स्कन्द, पंचम अध्याय के श्लोक सं 32-35 में विशेष रूप से किया गया है हालांकि पूरा पांचवां और छठा अध्याय श्रृष्टि रचना की ही व्याख्या करता है
भागवतपुराण के अनुसार पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) की रचना करीब-करीब एक साथ एक के बाद एक हुई लेकिन वैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी महाध्वनि (Big Bang Theory) की उपज है जो किसी बड़े ग्रह के सूर्य से टकराने से हुई


भागवतपुराण के अनुसार पंचमहाभूत अपनी रचना के बाद बड़ी असंगठित अवस्था में थे जिसे चार्ल्स डार्विन ने अपनी पुस्तक ‘The Origin of Species’ में ‘Difused and Unsythecised State’ की संज्ञा दी है
मूलतः भागवतपुराण की असंगठित अवस्था और डार्विन का ‘Difused and Unsynthecysed State’ का अर्थ एक ही है
असंगठित अवस्था के ये महाभूत काफी लम्बे समय तक मूर्त पिंड का आकार नहीं ले पाए थे
पंचमहाभूत जब संगठित हुए तब एक महाकाय ब्रह्माण्ड रूप अंड-पिण्ड बना
ब्रह्माण्ड रूपी पिंड सहस्त्र वर्षों तक निर्जीव अचेतन अवस्था में जल में पड़ा रहा
इस निर्जीव पिंड और जल में जब क्षोभ हुआ जिसे डार्विन ने ‘Process of Agitation’ कहा अर्थात जल, वायु, आकाश और अग्नि के परस्पर भौतिक-रासायनिक प्रक्रिया से क्षोभ के कारण उस महापिंड में चेतना का संचार हुआ या वह जीवित हो गया
हमारा धर्मशास्त्र इसका कारण इश्वरीय कृपा और डार्विन आदि आधुनिक वैज्ञानिक इसे ‘Physio-Chemical Reaction’ की प्रक्रिया कहते हैं
आज स्थिर जल जमावट में जब मच्छर, शैवाल आदि जलजीव पैदा हो जाते हैं तो हम उसे ईश्वरीय कृपा नहीं समझते


हम इस बात पर जोर देकर किसी के धार्मिक विश्वास को प्रभावित करना नहीं चाहते लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि विज्ञान सदा धार्मिक रहस्यों और अंधविश्वासों पर से पर्दा उठाता आया है
जो चाँद कुछ वर्ष पहले तक हमारे लिए ‘चन्द्रलोक’ था वह आज मरुस्थल और बियावान पथरीला निर्जीव उपग्रह है
वैसे भी ब्रह्माण्ड को आकार देने वाले ‘Higs Bosone’ या ‘God Particle’ की खोज कर ली गई है और इसके अन्वेषक प्रोफेसर पीटर हिग्स को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है
वह दिन अब दूर नहीं जब श्रृष्टि की रचना का वैज्ञानिक तथ्य ही सामने होगा


अब हम इस बात पर विचार करें कि वह विशाल चेतन पिंड क्या था
डार्विन उसे ‘विभिन्न गुण-रूपों के बैक्टीरिया का एक प्राकृतिक मूर्त रूप’ (Formation of Heterogeneous Bacterial Growth) कहता है
इस विशाल चेतन पिण्ड के विभिन्न हिस्से को उसकी आकृति के अनुसार मुँह, बाजू, वक्ष, जानू और पाद की संज्ञा दी गई जैसे बादल का विशाल पिण्ड कभी मुंह, हाथ या पैर की तरह नजर आता है और कभी किसी जानवर की तरह लगता है
इसके विभिन्न हिस्से से इसकी प्रकृति के अनुसार विभिन्न जीव-जन्तु उत्पन्न हुए क्योंकि इसके विभिन्न हिस्सों की उर्वरा शक्ति भिन्न थी
(उदाहरणार्थ एक गन्ने के पौधे के विभिन्न हिस्से में गुणों के अनुसार मिठास अलग-अलग होती है)
यह चेतन पिण्ड कोई सौ-दो सौ गज में फैला हुआ नहीं बल्कि हजारों-हजार मील में फैला हुआ पदार्थ था और ऐसे ऐसे हजारों पिंड हजारों जगह फैले हुए थे जिससे देश-काल की भिन्नता एवं महाभूतों की स्थानीय विशेषताओं के चलते एक ही प्रकार के जीव के विभिन्न रंग, रूप और आकार बनते गए
कहीं हाथी सफेद तो कहीं हाथी कला, कहीं ऊंट तो कहीं जिराफ, कहीं मानव तो कहीं दानव
इसी के विभिन्न हिस्सों से सर्प, नाग, दानव, वृक्ष, लताएँ आदि सभी पैदा हुए
ये जीव-जन्तु भी सब अचानक एक साथ पैदा नहीं हुए
अंतरिक्ष में मिले मच्छर के जीवाष्मों के अध्ययन से पता चला है कि मच्छर मनुष्यों से 50 करोड़ वर्ष पहले उत्पन्न हुए थे जबकि मनुष्य की उत्पत्ति आज से करीब 16 से 20 करोड़ वर्ष पहले हुई थी
खुद पृथ्वी ही आज से करीब 4.55GA (Giga/Billion years) अरब साल पहले स्तित्व में आई है
क्रमिक विकास इतनी मंद गति से होता है कि मनुष्यों को ही अपने चार पैरों से दो पैरों पर खड़े होने में कई लाख वर्ष लगे
सबों पर डार्विन का क्रमिक विकास का सिद्धांत (Theory of Gradual Evolution) ही लागू होता है


ब्राह्मण की उत्पत्ति

इस परिप्रेक्ष्य में अब हम ब्राह्मण की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विचार करें
हमारा शास्त्र कहता है :-

(१) ब्राह्मणो स्य मुखमासीद्बाहू राजन्य: कृत:। ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥ (अध्याय ३१(११) पुरुष सूक्त, यजुर्वेद)

(२) चतुर्वर्णम् मयाश्रिष्ठ्यम् गुणकर्माविभागशः (गीता)

यजुर्वेद ३१वें अध्याय के पुरुष सूक्त श्लोक सं ११ की पुष्टि ऋग्वेद, और अथर्ववेद के साथ श्रीमद्भागवतपुराण ने भी की है
इसका सटीक अर्थ समझने के लिए हमें पहले यजुर्वेद के श्लोक सं १० का अर्थ समझना होगा
दसवें श्लोक में पूछा गया है कि “उस विराट पुरुष का मुख कौन है, बाजू कौंन है, जंघा कौन है तथा पैर कौन है? इसके उत्तर में श्लोक सं ११ आता है जिसमे कहा गया है कि “ ब्राह्मण ही उसका मुख है, क्षत्रिय बाजू है, वैश्य जंघा है और शूद्र पैर है”
यह कहीं नहीं लिखा है कि प्रजापति (ब्रह्मा) के मुख से ब्राह्मण, बाजूओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शुद्र पैदा हुए
ऐसा अर्थ मात्र भ्रान्ति है
इस पर मैं कोई शास्त्रार्थ करना नहीं चाहता क्योंकि इसकी वास्तविकता मैं पहले ही बता चुका हूँ
हम तो उस दिन की कल्पना भर कर सकते हैं जब अणुओं के टकराव और विष्फोट से उत्पन्न हिग्स बोसोन या (God Particle) श्रृष्टि की रचना का पूरा सिद्धांत 40-50 वर्षों में बदल देगा
तब ब्राह्मण न तो मुख से पैदा हुआ माना जायेगा और नहीं शुद्र पैरों से


ब्राह्मणों के कार्य

अध्यापनमध्यायनं च याजनं यजनं तथा।

दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्र जन्मन:॥ 10।75

मनुस्मृति के इस श्लोक के अनुसार ब्राह्मणों के छह कर्म हैं
साधारण सी भाषा में कहें तो अध्ययन-अध्यापन(पढ़ना-पढाना), यज्ञ करना-कराना, और दान देना-लेना
इन कार्यों को दो भागों में बांटा गया है
धार्मिक कार्य और जीविका के कार्य
अध्ययन,यज्ञ करना और दान देना धार्मिक कार्य हैं तथा अध्यापन, यज्ञ कराना (पौरोहित्य) एवं दान लेना ये तीन जीविका के कार्य हैं
ब्राह्मणों के कार्य के साथ ही इनके दो विभाग बन गए
एक ने ब्राह्मणों के शुद्ध धार्मिक कर्म (अध्ययन, यज्ञ और दान देना) अपनाये और दूसरे ने जीविका सम्बन्धी (अध्यापन, पौरोहित्य तथा दान लेना) कार्य
जिस तरह यज्ञ के साथ दान देना अंतर्निहित है वैसे ही पौरोहित्य अर्थात यज्ञ करवाने के साथ दान लेना
इस तरह वास्तव में ब्राह्मणों के चार ही कार्य हुए – अध्ययन और यज्ञ तथा अध्यापन और पौरोहित्य


याचकत्व और अयाचकत्व

ब्राह्मणों के कर्म विभाजन से मुख्यतः दो शाखाएं स्तित्व में आयीं – पौरोहित्यकर्मी या कर्मकांडी याचक एवं अध्येता और यजमान अयाचक
यह भी सिमटकर दो रूपों में विभक्त होकर रह गया – दान लेने वाला याचक और दान देने वाल अयाचक
सत्ययुग से ही अयाचक्त्व की प्रधानता रही
विभिन्न पुराणों, बाल्मीकिरामायण और महाभारत आदि में आये सन्दर्भों से पता चलता है कि याचकता पर सदा अयाचकता की श्रेष्टता रही है
प्रतिग्रह आदि तो ब्राह्मणोचित कर्म नहीं हैं जैसा कि मनु जी ने कहा है कि :-

प्रतिग्रह समर्थोपि प्रसंगं तत्रा वर्जयेत्।

प्रतिग्रहेण ह्यस्याशु ब्राह्मं तेज: प्रशाम्यति॥ (म.स्मृ. 4/186)

'यदि ब्राह्मण प्रतिग्रह करने में सामर्थ्य भी रखता हो (अर्थात् उससे होनेवाले पाप को हटाने के लिए जप और तपस्यादि भी कर सकता हो) तो भी प्रतिग्रह का नाम भी न ले, क्योंकि उससे शीघ्र ही ब्रह्मतेज (ब्राह्मणत्व) का नाश हो जाता है’। जैसा रामायण में स्पष्ट लिखा हैं और ब्रह्मर्षि वशिष्ट ने भी कहा है कि 'उपरोहिती कर्म अतिमन्दा। वेद पुराण स्मृति कर निन्दा।'

भू-धन का प्रबंधन

दंडीस्वामी श्री सहजानंद सरस्वती जी के अनुसार अयाचकता और याचकता किसी विप्र समाज या जाति का धर्म न होकर व्यक्ति का धर्म हैं। जो आज अयाचक हैं कल वह चाहे तो याचक हो सकता हैं और याचक अयाचक। इसी सिद्धांत और परम्परा के अनुसार जब याचक ब्राह्मणों को दान स्वरूप भू-संपत्ति और ग्राम दान मिलने लगे तो याचकों को भू-धन प्रबंधन की जटिलताएं सताने लगीं
पौरोहित्य जन्य कर्मों में संलग्न याचक वर्ग दान में मिली भू-सम्पत्तियों के प्रबंधन के लिए समय नहीं निकाल पा रहा था
इसलिए आंतरिक श्रम विभाजन के सिद्धांत पर आपसी सहयोग और सम्मति से परिवार के कुछ सदस्य अपनी रूचि अनुसार भू-प्रबंधन में संलग्न हो गए


ब्राह्मणों के पेशागत परिवर्तन के उदाहरण वैदिक काल में परशुराम, द्रोण, कृप, अश्‍वत्थामा, वृत्र, रावण एवं ऐतिहासिक काल में शुंग, शातवाहन, कण्व, अंग्रेजी काल में काशी की रियासत, दरभंगा, बेतिया, हथुआ, टिकारी, तमकुही, सांबे, मंझवे, आदि के जमींदार हैं।

भूदान-धन प्रबन्धक की विशेषताएं एवं इतिहास – ब्राह्मण की विशेष शाखा का उद्भव

आज भी किसी परिवार में प्राकृतिक श्रम विभाजन के सिद्धांत पर हर सदस्य अपनी रूचि अनुसार अलग-अलग काम स्वतः ले लेता है
कोई सरकारी दफ़्तर और कोर्ट कचहरी का काम संभालता है तो कोई पशुधन प्रबंधन में लग जाता है तो कोई ग्राम संस्कृति में संलग्न हो ढोलक बजाने लगता है तो कोई साधारण से लेकर ऊँची-ऊँची नौकरियां करने लगता है तो कोई पूजा-पाठ यज्ञादि में संलग्न हो जाता है
ठीक यही हाल याचकता और अयाचकता के विभाजन के समय हुआ
हालांकि उस समय किसी के उत्कृष्ट और किसी के निकृष्ट होने की कल्पना भी नहीं थी


भू-संपत्ति प्रबंधन में संलग्न परिवार शुद्ध अयाचकता की श्रेणी में अपने को ढालता गया
याचकों की आर्थिक विपन्नता और अयाचकों की भू-सम्पदाजन्य सम्पन्नता काल-क्रम से उत्तरोत्तर बढ़ती गई तथापि याचकों के सामाजिक प्रभाव और आत्मसम्मान में कोई कमी नहीं थी
ऐसा भी नही था कि याचक ब्राह्मण कृषि कार्य नही करता था लेकिन उसके पास विशेषज्ञता की कमी थी और आत्मसम्मान की अधिकता
वाल्मीकिरामायण के के अयोध्या कांड बत्तीसवें सर्ग के २९-४३वें श्लोक में गर्ग गोत्रीय त्रिजट नामक ब्राह्मण की कथा से अयाचक से याचक बनने का सटीक उदाहरण मिलता है:-



तत्रासीत् पिंगलो गार्ग्यः त्रिजटो नाम वै द्विज; क्षतवृत्तिर्वने नित्यं फालकुद्दाललांगली। ॥ 29॥

इस आख्यान से यह भी स्पष्ट हैं कि दान लेना आदि स्थितिजन्य गति हैं, और काल पाकर याचक ब्राह्मण अयाचक और अयाचक ब्राह्मण याचक हो सकते हैं और इसी प्रकार अयाचक और याचक ब्राह्मणों के पृथक्-पृथक् दल बनते और घटते-बढ़ते जाते हैं




इसी तरह के संदर्भ का द्वापरकालीन महाभारत में युधिष्ठिर को राजसूय यज्ञ में ब्राह्मणों द्वारा गोधन आदि भू-संपदा के उपहार और दान का वर्णन दुर्योधन द्वारा शकुनि के समक्ष किया गया है


त्रेता-द्वापर संधिकाल में क्षत्रियत्व का ह्रास एवं अयाचक भू-धन प्रबन्धक द्वारा क्षात्रजन्य कार्यों का संचालन

मनुजी स्पष्ट लिखते हैं कि :

सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।

सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्र विदर्हति॥ 100॥

अर्थात ''सैन्य और राज्य-संचालन, न्याय, नेतृत्व, सब लोगों पर आधिपत्य, वेद एवं शास्त्रादि का समुचित ज्ञान ब्राह्मण के पास ही हो सकता है, न कि क्षत्रियादि जाति विशेष को।''

स्कन्दपुराण के नागर खण्ड 68 और 69वें अध्याय में लिखा हैं कि जब कर्ण ने द्रोणाचार्य से ब्रह्मास्त्र का ज्ञान माँगा हैं तो उन्होंने उत्तर दिया हैं कि :

ब्रह्मास्त्रां ब्राह्मणो विद्याद्यथा वच्चरितः व्रत:।

क्षत्रियो वा तपस्वी यो नान्यो विद्यात् कथंचन॥ 13॥



अर्थात् ''ब्रह्मास्त्र केवल शास्त्रोक्ताचार वाला ब्राह्मण ही जान सकता हैं, अथवा क्षत्रिय जो तपस्वी हो, दूसरा नहीं। यह सुन वह परशुरामजी के पास, “मैं भृगु गोत्री ब्राह्मण हूँ,” ऐसा बनकर ब्रह्मास्त्र सीखने गया हैं।'' इस तरह ब्रह्मास्त्र की विद्या अगर ब्राह्मण ही जान सकता है तो युद्ध-कार्य भी ब्राह्मणों का ही कार्य हुआ




उन विभिन्न युगों में भी ब्राह्मणों के अयाचक दल ने ही पृथ्वी का दायित्व संभाला
इससे बिना शंका के यह सिद्ध होता है कि भू-धन प्रबन्धक अयाचक ब्राह्मण सत्ययुग से लेकर कलियुग तक थे और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाये रखी हालांकि वे अयाचक ब्राह्मण की संज्ञा से ही विभूषित रहे
साहस, निर्णय क्षमता, बहादुरी, नेतृत्व क्षमता और प्रतिस्पर्धा की भावना इनमे कूट-कूटकर भरी थी तथा ये अपनी जान-माल ही नहीं बल्कि राज्य की सुरक्षा के लिए भी शक्तिसंपन्न थे


क्षत्रियत्व का ह्रास

प्राणी रक्षा के दायित्व से जब क्षत्रिय च्युत हो निरंकुश व्यभिचारी और अधार्मिक कार्यों एवं भोग विलास में आकंठ डूब गए तो ब्रह्मर्षि परशुराम जी ने उनका विभिन्न युगों में २१ बार संहार किया और पृथ्वी का दान और राज ब्राह्मणों को दे दिया


यहाँ पर मैं जरा सा संदार्भातिरेक करूँगा
प्रश्न उठता है कि अगर परशुराम जी ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रिय-विहीन कर दिया तो बाद में क्षत्रिय कहाँ से आ गए? उत्तर यह है कि हालाँकि पौराणिक इतिहास में कहीं भी ऐसा संदर्भ नहीं है की उन्होंने क्षत्रियों के साथ क्षत्राणियों का भी संहार किया
नारी सदा अवध्य ही रही
उन्हीं अवध्य जीवित क्षत्राणियों से ब्राह्मणों ने जो संतानें पैदा कीं वे क्षत्रिय कहलाये इसलिए क्षत्रिय भी ब्राह्मणों की ही संतानें हुईं
शास्त्र भी कहता है की ब्राह्मण वीर्य और क्षत्रिय रज से उत्पन्न संतान क्षत्रिय ही होती हैं ब्राह्मण नहीं
महाभारत में अर्जुन ने युधिष्ठिर से शान्तिपर्व में कहा है कि:

ब्राह्मणस्यापि चेद्राजन् क्षत्राधार्मेणर् वत्तात:।

प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्रांहि ब्रह्मसम्भवम्॥ अ.॥ 22॥

''हे राजन्! जब कि ब्राह्मण का भी इस संसार में क्षत्रिय धर्म अर्थात् राज्य और युद्धपूर्वक जीवन बहुत ही श्रेष्ठ हैं, क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मणों से ही उत्पन्न हुए हैं, तो आप क्षत्रिय धर्म का पालन करके क्यों शोक करते हैं?'



कलियुग में अयाचक भू-धन प्रबंधक की स्वतंत्र पहचान व् ब्राह्मणों में सर्वोच्च अधिकार



कलियुग में इस भू-प्रबन्धक की लिखित और अमिट छाप ईशापूर्व से स्पष्ट परिलक्षित होती है
सिकंदर ने जब 331 ईशापूर्व आर्यावर्त पर आक्रमण किया था तो उसके साथ उसका धर्मगुरु अरस्तू भी साथ आया था
अरस्तू ने क्षत्रियों की अराजकता और अकर्मण्यता के संदर्भ में उस समय के भारत की जो दुर्दशा देखी उसका बहुत ही रोचक चित्रण अपने स्मरण ग्रन्थ में इस तरह किया है:-

“Now the ideas about castes and profession, which have been prevalent in Hindustan for a very long time, are gradually dying out, and the Brahmans, neglecting their education,....live by cultivating the land and acquiring the territorial possessions, which is the duty of Kshatriyas. If things go on in this way, then instead of being (विद्यापति) i.e. Master of learning, they will become (भूमिपति) i.e. Master of land”.

“जो विचारधारा, कर्म और जाति प्रधान भारतवर्ष में प्राचीन काल से प्रचलित थी, वह अब धीरे-धीरे ढीली होती जा रही हैं और ब्राह्मण लोग विद्या विमुख हो ब्राह्मणोंचित कर्म छोड़कर भू-संपत्ति के मालिक बनकर कृषि और राज्य प्रशासन द्वारा अपना जीवन बिता रहे हैं जो क्षत्रियों के कर्म समझे जाते हैं। यदि यही दशा रही तो ये लोग विद्यापति होने के बदले भूमिपति हो जायेगे।'' आज हम कह सकते हैं कि अरस्तू की भविष्यवाणी कितनी सटीक और सच्ची साबित हुई


In the year 399 A.D. a Chinese traveler, Fahian said “owing to the families of the Kshatriyas being almost extinct, great disorder has crept in. The Brahmans having given up asceticism....are ruling here and there in the place of Kshatriyas, and are called ‘Sang he Kang”, which has been translated by professor Hoffman as ‘Land seizer’.

अर्थात “क्षत्रिय जाति करीब करीब विलुप्त सी हो गई है तथा बड़ी अव्यवस्था फ़ैल चुकी है
ब्राह्मण धार्मिक कार्य छोड़ क्षत्रियों के स्थान पर राज्य शासन कर रहे हैं”


राज्य संचालन

यद्यपि अयाचक ब्राह्मणों द्वारा राज्याधिकार और राज्य संचालन का कार्य हरेक युग में होता रहा है लेकिन ईशापूर्व चौथी-पांचवीं सदी से तो यह कार्य बहुत ही ज्यादा प्रचलित हो गया और इसने करीब-करीब एक परम्परा का रूप ले लिया
इसमें सर्व प्रमुख नाम 330 ई.पू. सिकंदर से लोहा लेने वाले सारस्वत गोत्रीय महियाल ब्राह्मण राजा पोरस, 500 इस्वी सुधाजोझा, 700 ईस्वी राजा छाच, और 1001 ईस्वी में अफगानिस्तान में जयपाल, आनंदपाल और सुखपाल आदि महियाल ब्राह्मण राजा का नाम आता है जैसा कि स्वामी सहजानंद सरस्वती ने ‘ब्रह्मर्षि वंशविस्तर’ में लिखा है


भू-धन प्रबंधक ब्राह्मणों में “भूमिहार” शब्द का प्रथम ज्ञात प्रचलन

हालांकि भूमिहार शब्द का पहला जिक्र बृहतकान्यकुब्जवंशावली १५२६ ई. में आया है लेकिन सरकारी अभिलेखों में प्रथम प्रयोग 1865 की जनगणना रिपोर्ट में हुआ है
इसके पहले गैर सरकारी रूप में इतिहासकार बुकानन ने 1807 में पूर्णिया जिले की सर्वे रिपोर्ट में किया है
इनमे लिखा है :-

“भूमिहार अर्थात अयाचक ब्राह्मण एक ऐसी सवर्ण जाति जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। इसका गढ़ बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश है
पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्राह्मणों को त्यागी नाम की उप-जाति से जाना व पहचाना जाता हैं।“

एम.ए. शेरिंग ने १८७२ में अपनी पुस्तक Hindu Tribes & Caste में कहा "भूमिहार जाति के लोग हथियार उठाने वाले ब्राह्मण हैं (सैनिक ब्राह्मण)। पं. परमेश्वर शर्मा ने ‘सैनिक ब्राह्मण’ नामक पुस्तक भी लिखी है


अंग्रेज विद्वान मि. बीन्स ने लिखा है – “भूमिहार एक अच्छी किस्म की बहादुर प्रजाति है, जिसमे आर्य जाति की सभी विशिष्टताएं विद्यमान है। ये स्वाभाव से निर्भीक व हावी होने वालें होते हैं।“

'विक्रमीय संवत् 1584 (सन् 1527) मदारपुर के अधिपति भूमिहार ब्राह्मणों और बाबर से युद्ध हुआ और युद्धोपरांत भूमिहार मदारपुर से पलायन कर यू.पी. एवं बिहार के बिभिन्न क्षेत्रों में फ़ैल गए
गौड़, कान्यकुब्ज सर्यूपारी, मैथिल, सारस्वत, दूबे और तिवारी आदि नाम प्राय: ब्राह्मणों में प्रचलित हुए, वैसे ही भूमिहार या भुइंहार नाम भी सबसे प्रथम कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के एक अयाचक दल विशेष में प्रचलित हुआ।

भूमिहार शब्द सबसे प्रथम 'बृहत्कान्यकुब्जकुलदर्पण' (1526) के 117वें पृष्ठ पर मिलता है
इसमें लिखा हैं कि कान्यकुब्ज ब्राह्मण के निम्नलिखित पांच प्रभेद हैं:-



(1) प्रधान कान्यकुब्ज

(2) सनाढ्य

(3) सरवरिया

(4) जिझौतिया

(5) भूमिहार

सन् 1926 की कान्यकुब्ज महासभा का जो 19वाँ वार्षिक अधिवेशन प्रयाग में जौनपुर के राजा श्रीकृष्णदत्तजी दूबे, की अध्यक्षता में हुई थी
स्वागताध्यक्ष जस्टिस गोकरणनाथ मिश्र ने भी भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग माना है


जमींदार/भूमिहार



यद्यपि इनकी संज्ञा प्रथम जमींदार या जमींदार ब्राह्मण थी लेकिन एक तो, उसका इतना प्रचार न था, दूसरे यह कि जब पृथक्-पृथक् दल बन गये तो उनके नाम भी पृथक-पृथक होने चाहिए
परन्तु जमींदार शब्द तो जो भी जाति भूमिवाली हो उसे कह सकते हैं। इसलिए विचार हुआ कि जमींदार नाम ठीक नहीं हैं। क्योंकि पीछे से इस नामवाले इन अयाचक ब्राह्मणों के पहचानने में गड़बड़ होने लगेगी। इसी कारण से इन लोगों ने अपने को भूमिहार या भुइंहार कहना प्रारम्भ कर दिया। हालांकि जमींदार और भूमिहार शब्द समानार्थक ही हैं, तथापि जमींदार शब्द से ब्राह्मण से अन्य क्षत्रिय आदि जातियाँ भी समझी जाती हैं, परन्तु भूमिहार शब्द से साधारणत: प्राय: केवल अयाचक ब्राह्मण विशेष ही क्योंकि उसी समाज के लिए उसका संकेत किया गया हैं।

आईन-ए-अकबरी, उसके अनुवादकों और उसके आधार पर इतिहास लेखकों के भी मत से भूमिहार ब्राह्मण लोग ब्राह्मण सिद्ध होते हैं। कृषि करने वाले या जागीर प्राप्त करने बाले भूमिहारों के लिए ‘जुन्नारदार’ शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका मतलब होता है “जनेऊ पहनने वाला ब्राह्मण”
फिर वहाँ भूमिहार लोग ब्राह्मण हैं या नहीं इस संशय की जगह ही कहाँ हैं?

जाति के रूप में भूमिहारो का संगठन

भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन है
प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगों को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया, उसके बाद सारस्वत, महियल, सरयूपारी, मैथिल, चितपावन, कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए
मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए


भूमिहार ब्राह्मण महासभा

१८८५ में द्विजराज काशी नरेश महाराज श्री इश्वरी प्रसाद सिंह जी ने वाराणसी में प्रथम अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा की स्थापना की
बिहार और उत्तर प्रदेश के जमींदार ब्राह्मणों की एक सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा कि हमारी एक जातीय सभा होनी चाहिए
सभा के प्रश्न पर सभी सहमत थे
परन्तु सभा का नाम क्या हो इस पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया
मगध के बाभनो ने जिनके नेता स्व.कालीचरण सिंह जी थे, सभा का नाम ‘बाभन सभा’ करने का प्रस्ताव रखा
स्वयं महाराज ‘भूमिहार ब्राह्मण सभा’ के पक्ष में थे
बैठक में आम राय नहीं बन पाई, अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उप-समिति गठित की गई
सात वर्षो के बाद समिति की सिफारिश पर "भूमिहार ब्राह्मण" शब्द को स्वीकृत किया गया


१९४७ में ३३वां अखिल भारतीय सम्मलेन टिकारी में पं. वशिष्ठ ना. राय की अध्यक्षता में हुआ
अनेकों संस्कृत विद्यालयों/महाविद्यालयों के संस्थापक/व्यवस्थापक स्वामी वासुदेवाचार्य जी इसके स्वागताध्यक्ष थे
टिकारी सम्मलेन के बाद ४७ वर्षों तक कोई अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण सम्मलेन नहीं हुआ क्योंकि राजा रजवाड़े रहे नहीं जो सम्मेलन आयोजित कराते थे हालांकि क्षेत्रीय सम्मलेन विभिन्न नामों से होते रहे


१९९४ जून में ३४वां अधिवेशन टिकारी अधिवेशन के ४७ वर्षों बाद अखिल भारतीय भूमिहार बाह्मण सम्मलेन सिमरी, जिला बक्सर बिहार में हुआ विद्वानों और समाजसेवियों के सानिध्य में आचार्य पं. रामख्याली शर्मा की अध्यक्षता में हुआ
इसी सिमरी ग्राम में स्वामी सहजानंद सरस्वती जी ने अपने महान ग्रंथ कर्मकलाप, ब्रह्मर्षि वंश विस्तर, और भूमिहार ब्राह्मण परिचय लिखे हालांकि सीताराम आश्रम, बिहटा, पटना जिला उनका अंतिम निवास था
इस तरह भूमिहार ब्राह्मण महासभा का ११४ वर्षों के इतिहास में मुख्यतः ३४ अधिवेशन हुए हालांकि सभाएं तो पचास से ज्यादा हईं
इसके बाद भी सभाएं तो बहुत हुईं लेकिन उसका क्रमानुसार नामकरण नहीं किया गया




परिचय देना

जैसे कान्यकुब्ज या सर्यूपारी अदि ब्राह्मणों से पूछने पर वे लोग प्रथमत: 'आप कौन हैं?' इस प्रश्न का उत्तर 'ब्राह्मण हैं' ऐसा देते हैं। उसके बाद 'कौन ब्राह्मण हैं?' इस प्रश्न पर 'सर्यूपारी या कान्यकुब्ज ऐसा बतलाते हैं। वैसे ही अयाचक ब्राह्मणों से पूछने पर कि 'आप कौन हैं?' उन्हें कहना चाहिए कि 'ब्राह्मण हैं'। पश्चात् 'कौन ब्राह्मण हैं?' ऐसा पूछने पर 'अयाचक अथवा भूमिहार, पश्चिमा, त्यागी, महियाल ब्राह्मण हैं' ऐसा उत्तर देना चाहिए।

राजाज्ञा – बनारस, टिकारी, बेतिया, तमकुही आदि

1793 के स्थायी भू प्रबंध के समय में आज के सभी भूमिहार राजाओं के पूर्वज ‘ब्राह्मण’ कौम से ही जाने जाते थे
जैसे दस परगने की जमींदारी टिकारी के राजा मित्रजित सिंह कौम ब्राह्मण को, फतह नारायण सिंह कौम ब्राह्मण हथुआ राज, राजा मानसाराम वल्द मनोरंजन मिश्र कौम ब्राह्मण आदि


ईस्ट इण्डिया कम्पनी की कार्यवाही की जाँच के लिए जो सिलेक्ट कमिटी बैठी थी, उसकी जो पाँचवीं रिपोर्ट बंगाल प्रेसिडेन्सी के विषय में प्रकाशित होकर सन् 1812 ई. में लन्दन में छपी हैं, उसके प्रथम भाग के 511 से 513 पृष्ठों तक ऐसा लिखा हुआ हैं – इसमें सभी भूमिहारों को ब्राह्मण ही लिखा गया है:-



''सूबा बिहार” (प्रथम सरकार) बिहार

(3) 10 परगनों की जमींदारी मित्राजीत सिंह कौम ब्राह्मण, टिकारी के निवासी को मिली


(5) अरंजील और मसौढ़ी इन दो परगनों के जमींदार जसवन्त सिंह वगैरह ब्राह्मण थे।

(9) सौरत और बलिया ये दो परगने खासकर हुलास चौधुरी और आनागिर सिंह नामक ब्राह्मणों की जमींदारी थी।

(11) ग्यासपुर परगने की जमींदारी शिवप्रसाद सिंह ब्राह्मण की थी और उसमें छोटे-छोटे जमींदार भी शरीक थे।

8 फरबरी 1912 का यू.पी. शिक्षा विभाग का पत्र

G 15320

No ——— —1911-12

X-25

From,

The Hon’ble Mr. C. F. De La Fosse M.A.

Director of Public Instruction

United Provinces.

To

The Secretary,

Bhumihar Brahman Sabha. Benares.

Dated Allahabad. 8th Feb., 1912.

With reference to his letter dated the 7th September, 1912, has the honour to inform him that the Inspectors of schools have been requested to show Bhumihars as Brahmans in the Annual Statistical Returns.(आपको सूचित किया जाता है कि वार्षिक सांख्यिकी रिपोर्ट में भूमिहार को ब्राह्मण ही दिखायें)

S/d P.S.Barell M.A.

Assistant Director of P.I.

For C.F. De La Fosse M.A.

Director of P.I., U.P.

अयोध्या का मुकद्दमा

आनंद भवन बिहारी बनाम राम दुलारे त्रिपाठी ACJ Faizabad Suite No 22/1962 – पं. राम दुलारे ने कहा कि महावीर शरण भूमिहार हैं, ब्राह्मण नहीं अतः आनंद बिहारी ठाकुरबाड़ी के सर्बकार नहीं हो सकते क्योंकि सर्बकार सिर्फ विरक्त ब्राह्मण ही हो सकता है भूमिहार नहीं
कोर्ट ने डिक्री पास किया कि भूमिहार हर हाल में ब्राह्मण है
इस आशय की कई डिक्रियां अदालतों ने पास किये हैं


अन्य प्रान्तों में भूमिहार ब्राह्मणों के नाम/उपाधि

क्रम      क्षेत्र का नाम       प्रमुख ब्रह्मर्षि               पदवी/उपनाम

सं                            समूह का नाम

 

१.        काश्मीर            कारकून, कौल, सप्रू, हक्सर आदि

२.       दिल्ली,पंजाब,     मोहियाल, दत्त, मोहन, बाली, छिब्बर, बक्शी

          जम्मू              मेहता, भीमवाल, लव

३.       हरियाणा,प.       त्यागी, भारद्वाज, सिंह, चौधरी, तगा

          उ.प्र.दिल्ली      शाण्डिल्य, शर्मा, कौशिक, अधिकारी,

 

४.       पू.उ.प्र, बिहार    भूमिहार                      राय, सिंह, शर्मा, चौधरी, ठाकुर, सिन्हा,

          झारखंड                                          पांडेय, मिश्र, शुक्ल, शाही, खान, कुंअर,

                                                            तिवारी, त्रिवेदी, राय, चौधरी आदि

५.       आगरा (उ.प्र.)    गालव, पूर्व त्यागी, शर्मा आदि

          राजस्थान        त्यागी

          मध्य प्रदेश/छतीसगढ़  - वही सब उपाधियाँ जो बिहार, यूपी आदि में हैं|                  

६.       बंगाल              कुलीन, बनर्जी              कुलीन, बनर्जी, चक्रवर्ती, लाहिड़ी,

                                                            सान्याल, भादुड़ी आदि

७.       राजस्थान          बागड़, पुष्कर्ण               पुष्कर्ण, धावनी, व्यास, बोहरा

 

८.       महाराष्ट्र, व         चितपाव, तिलक, गोखले, रानाडे, भावे, गोडसे, आप्टे,

          उ. कर्नाटक        सावरकर, साठे, वैशंपायन, फणसे, राणे,परांजपे,  भट्ट,गाडगिल,सोवनी,गोरे,पटवर्धन, जोगलेकर, केलकर, देशमुख, वैद्य, देवल,बाजलेकर, देव, खरे, कोंकण, कुलकर्णी,आचार्य,अग्निहोत्री, अचारी, व्यास, पई आदि 

९.       आंध्र प्र.           नियोगी, राव आदि

१०.      केरल              नम्बूदरी, नम्बुथिरी

११.      तमिलनाडु         आयंगर, सुब्रह्मण्यम, लैकिक,अय्यर,अयंगार 

१२.     नेपाल              दहल


भूमिहारों का ब्राह्मणत्व से विचलन व् बढ़ती दूरियां

बनारस(काशी), टिकारी, अमावां, हथुआ, बेतिया और तमकुही आदि अनेक ब्राह्मणों (भूमिहार) के राज्यारोहण के बाद सम्पूर्ण भूमिहार समाज शिक्षा, शक्ति, और रोआब के उच्च शिखर पर पहुँच गया था
चारो ओर हमारे दबदबे की दहशत सी फैली हई थी
लोग भूमिहारों का नाम भय मिश्रित अदब से लिया करते थे
सर्वाधिकार प्राप्ति और वर्चस्व के लिए भूमिहार शब्द ही काफी था


धीरे धीरे हमने विवेकशून्यता का प्रदर्शन करना शुरू किया
फिर भूमिहार शब्द के साथ तमाम नकारात्मक विशेषण जुड़ने लगे
हमने भूमिहार शब्द के चाबुक का प्रयोग हर उचित-अनुचित जगह करना प्रारम्भ किया
भूमिहार शब्द का नशा हमारे दिलो-दिमाग को इतना विषाक्त कर दिया कि हमारे पैर जमीन पर नही टिकते थे
हरेक भूमिहार चाहे वह साधारण कर्जदार खेतिहर रैयत ही क्यों न हो, वह इन रियासतों के मालिक से अपने आप को कमतर नहीं आंकने लगा
खेत में भले ही वह मगधनरेश रूपी रैयत अपने मजदूर के साथ कंधा से कंधा मिलाकर धान-गेहूं की कटाई करे पर क्या मजाल कि गली से गुजरते वक्त वह मजदूर गली में खटिया निकालकर सामने बैठे रहने की जुर्रत कर ले


हाल यह हुआ कि हम अब ब्राह्मणों से अलग अपनी एक जाति समझने लगे
हमारे उम्र के लोगों को याद होगा कि जब बचपन में शादी के लिए अगुआ आता था तो हमें घर के लोग बताते थे कि अगुआ पूछेगा कि “बबुआ आप कौन जात के है?” तो बताना कि “हम भूमिहार ब्राह्मण हैं”
लेकिन आज हम अपने को ब्राह्मण या भूमिहार ब्राह्मण कहने में अपनी तौहीन और सिर्फ भूमिहार कहने में अपनी शान समझते हैं
अब तो हाल यह है कि “न खुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे”


भूमिहार ब्राह्मणों की वर्तमान स्थिति

अब तो हम खालिस भूमिहार जाति के हो गए और ब्राह्मणों ने हमसे दूरी बना ली
अब जब हमारे युवा स्वयं अपनी जड़ और अपना इतिहास पूरी तरह भूल गए हैं तो अन्य जातियां उनपर फब्तियां कसती हैं और पूछती हैं कि भूमिहार कौन सी जात है? न ब्राह्मण, न राजपूत, न वैश्य और न शुद्र!!! तुम तो ‘Mixed Breed’ (मिश्रित जाति) के हो
तुम्हारा अपना कोई इतिहास नहीं है, आदि-आदि
जब हम अपना इतिहास ही नहीं जानते तो उन्हें जवाब क्या देंगे? हम बगलें झाँकने लगते हैं और फेसबुक पर पूछते हैं कि हमारा इतिहास क्या है?

“वो परिंदा जिसे परवाज से फुर्सत ही न थी; आज तनहा है तो दीवार पर आ बैठा है


यह किसकी गलती है? किसने हमे दम्भ में चूर होकर अपने को ब्राह्मण से अलग होने के लिए कहा? हमारे पूर्वज ब्राह्मणों ने तो हमे मदारपुर सम्मेलन से ही अपना माना था
कान्यकुब्ज हों या सरयूपारी दोनों ने ही सदा हमें अपना कहा
लेकिन हमें तो टिकारी, बेतिया और काशी नरेश बनना था
अयाचक्त्व के नशे में हमने अपने आप को अपने आधार से नीचे गिराकर अंतहीन अंधकूप में डाल दिया
शिक्षा और उन्नति की हर विधा को तिलांजलि देकर हमने मगध नरेश बनने का सपना देखा
‘Firsr deserve then desire’ अर्थात ‘पहले काबलियत हासिल करो तब ख्वाब देखो’ के मूल मंत्र को भूमिहार के रोब में कोई स्थान नहीं दिया और नतीजा है कि आज हम अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मार बैठे हैं
हम क्या थे और क्या हो गए
आज हमें दूसरों से नहीं अपनों से ही डर सता रहा है


“मेरा अज्म इतना बुलंद है, कि पराये शोलों का डर नहीं; मुझे खौफ आतिशे-गुल से है, कहीं ये चमन को जला न दे



आज हम कठिन परिश्रम से जी चुराते हैं और सब कुछ बिना प्रयास के अपनी थाली में पाना चाहते हैं
“We want everything on a Platter” हाँ, यह बात ठीक है कि आज के ‘Welfare State System’ अर्थात कल्याणकारी राज्य व्यवस्था में आरक्षण आदि बहुत से प्रावधान हमारे समाज की उन्नति में बाधक हैं लेकिन सरकारी प्रतियोगिताजन्य नौकरियों के अलावे अभी भी Private Sector में अपार संभावनाएं हैं जहां योग्यता की पूछ, इज्जत और जरुरत है और अपनी क़ाबलियत दिखाने के असंख्य अवसर
कौन रोकता है हमें
“सितारों के आगे जहां और भी है”


पुनरोद्धार के उपाय

अंग्रेजी में एक कहावत है –“It is never too late” किसी भी अच्छे काम की शुरुआत के लिए कभी देर नही होती
हमने अपने आप को गहरे जख्म अवश्य दिये हैं लेकिन मर्ज ला-ईलाज नहीं हुआ है
हाँ, इसके लिए बहुत बड़े पैमाने पर और हरेक स्तर पर सामूहिक और दृढ़ निश्चयी प्रयास की आवश्यकता है
मेरे विचार से निम्नलिखित उपाय कारगर साबित हो सकते हैं:-

• शीघ्रातिशीघ्र हम अपने बच्चों के स्कूल रिकॉर्ड में जाति के स्थान में ‘ब्राह्मण’ या ‘ब्राह्मण (भूमिहार) या भूमिहार ब्राह्मण लिखना शुरू कर दें


• सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर सरकार पर प्रभाव डालें कि जनगणना आदि सभी अभिलेखों में हमारी जाति ‘ब्राह्मण’ या ‘ब्राह्मण(भूमिहार)’ या भूमिहार ब्राह्मण ही अंकित हो


• केन्द्रीय और प्रांतीय सभी अभिलेखों से भूमिहार शब्द हटाकर ब्राह्मण या ब्राह्मण(भूमिहार) ही लिखा और माना जाय


• आवश्यकता पड़ने पर सर्वदलीय सांसद-विधयाक-जनता समिति बनाकर जातीय एकता का प्रदर्शन करते हुए संविधान संशोधन कर इसे सुनिश्चित कराना चाहिए


• सामान्यतया भूमिहार ब्राह्मणों का बौद्धिक स्तर काफी ऊँचा है लेकिन समुचित सामाजिक विकास के लिए शिक्षा के स्तर को सुधारना आवश्यक है
मैं अंग्रेजी का अंध समर्थक नहीं हूँ लेकिन मेरा ७० वर्षों का अनुभव बताता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में “अंग्रेजी दा जवाब नहीं”!!! आज हमारे युवक अंग्रेजी सीखने के डर से हिंदी का गुणगान करते हैं
अंग्रेजी सीखकर अगर हिंदी का गुणगान करते तो कुछ और बात होती


• साधनहीन मेधावी बच्चों के शैक्षणिक विकास के लिए ग्राम, प्रखंड, जिला और राज्य स्तर पर उचित एवं समर्पित वित्तीय संगठन की आवश्यकता है
अधिवेशनों में यह प्रस्ताव तो आ जाता है लेकिन उसपर Follow Up या बाद में प्रगति कार्य नहीं किया जाता है
यह सुनिश्चित होना चाहिए
इसके बिना प्रस्ताव किसी काम का नहीं


• सदस्यता शुल्क – वित्तीय संगठन की स्थापना सदस्यता शुल्क के आधार पर होनी चाहिए
इसमें हरेक ग्राम से लेकर जिला स्तर के सभी स्वजातीय सदस्य बनने चाहिए जिसके लिए एक न्यूनतम शुल्क निर्धारित हो
अधिकतम की कोई सीमा नहीं हो


• विडंबना यह है कि समाज में जिसके पास धन है वे कुछ कर नहीं सकते और जो कुछ कर सकते हैं उनके पास धन नहीं है
अगर कुछ करना है तो दोनों के बीच सामंजस्य बैठाने की सख्त जरूरत है


• अभी तक हमारे समाज में ‘एक म्यान में दो तलवार’ नहीं रहने की संभावना व्याप्त है, सामाजिक सद्भाव और सहिष्णुता के समावेश से इसे बदला जा सकता है


• स्वजातीय एकता और सुरक्षा को ध्यान में रखकर कुछ संगठन बने तो सही लेकिन अंततः व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना ने इसे तार्किक परिणिति तक पहुंचने से रोक दिया
इस पर पुनर्विचार की जरूरत है


• एक ऐसी स्थायी कार्यकारिणी समिति बने जिसमे ग्रामीण, शिक्षित और दवंग आदि समाज के हर स्तर के लोग हों, ताकि लिए गए निर्णयों को सुचारू रूप से कार्यान्वित किया जा सके तथा इनकी उर्जा को भी सकारात्मक दिशा में प्रयोग किया जा सके और इन्हें महसूस हो कि सामाजिक उत्थान में इनकी भी नितांत आवश्यकता है


• आंतरिक द्वेष, इर्ष्या और कलह ने हमारे विकास के धार को कुंद कर दिया है, इसे आपसी सौहार्द्र और सामंजस्य से ठीक किया जा सकता है


• हमे भूमिहार ब्राह्मण की एक ऐसी Close Group Web Site बनानी चाहिए जिसपर समाज के सक्षम लोग जो नौकरियां दे सकते हैं अपनी Vacancy का विज्ञापन दें जिससे सिर्फ स्वजातीय ही आवेदन कर सकें
हाँ, योग्यता के सवाल पर कोई ढील नहीं दी जाय ताकि उनकी गुणवत्ता कायम रहे
लोगों में यह धारणा बनी रहे कि ‘अगर भूमिहार ब्राह्मण है तो काबिल ही होगा’
इससे कम से कम योग्य स्वजातीय युवकों को उचित नौकरी मिल सकेगी जो अन्यथा Corporate Sector के विज्ञापन से अनभिज्ञ रह जाते हैं


उपसंहार

हरेक इतिहासकार ने माना है कि भूमिहार ब्राह्मण अर्थात अयाचक ब्राह्मण एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगों को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया, उसके बाद सारस्वत, महियल, सरयूपारी, मैथिल ,चितपावन, कन्नड़ और केरल के नम्बूदरी आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए
मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए
‘इस तरह लोग मिलते गए और कारवां बनता गया’




इस जाति ने सत्ययुग से लेकर कलियुग तक किसी न किसी रूप में अपना स्तित्व और प्रभाव अक्षुण्ण रखा
अभी तक पचासों अखिल भारतीय भूमिहार सम्मलेन या भूमिहार महासभा या अखिल भारतीय त्यागी महासभा स्थापित कर और चितपावन, नम्बूदरी आदि ब्राह्मणों को इसका सभापतित्व देकर अयाचक ब्राह्मणों की एकता का परिचय दिया है
हालांकि महासभाओं में लिए गए निर्णयों/प्रस्तावों पर बाद में अग्रेत्तर करवाई या अमल नहीं किया गया
समृधि और सम्पन्नता के सुनहरे समय में गुमराही के दौर से गुजरने के बाद भी सुबह का भूला शाम को घर आने की क्षमता रखने वाली इस जाति के लिए अभी भी खोई प्रतिष्ठा प्राप्त करने की उम्मीद शेष है
इसमें सर्वाधिक आवश्यक है कठिन परिश्रम और मजबूत इरादे से जीवन के हर क्षेत्र में महारत हासिल करने की
सत्ययुग से ही अध्ययन या शिक्षा हमारी रक्तनलिका में प्रवाहित होती रही है
पूर्वजन्म के संस्कार और प्रारब्ध फलानुसार अल्प प्रयास से ही हम उसे वापिस प्राप्त कर सकते हैं
हमारे पास मानसिक शक्ति, बुद्धि, तर्क-शक्ति, दुर्धर्ष साहस और उछलकर वापस आने का अद्भुत कौशल है
जरूरत है इसे अपने व्यवहार में लाकर अपनी सफलता में परिवर्तित करने की


ले.कर्नल विद्या शर्मा (से.नि.)
१० सितम्बर १९१२ 

Saturday, November 9, 2013

वत्स गोत्र – उद्भव एवं विकास का इतिहास

वत्स गोत्र – उद्भव एवं विकास का इतिहास

पौराणिक पृष्भूमि

“भ्रिगुं, पुलत्स्यं, पुलहं, क्रतुअंगिरिसं तथा

मरीचिं, दक्षमत्रिंच, वशिष्ठं चैव मानसान्” (विष्णु पुराण 5/7)

भ्रिगु, पुलत्स्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि तथा वशिष्ठ – इन नौ मानस पुत्रों को व्रह्मा ने प्रजा उत्पत्ति का कार्य भार सौंपा| कालान्तर में इनकी संख्या बढ़कर 26 तक हो गई और इसके बाद इनकी संख्या 56 हो गई| इन्हीं ऋषियों के नाम से गोत्र का प्रचलन हुआ और इनके वंशज अपने गोत्र ऋषि से संबद्ध हो गए|

हरेक गोत्र में प्रवर, गण और उनके वंशज(व्राह्मण) हुए| कुछ गोत्रों में सुयोग्य गोत्रानुयायी ऋषियों को भी गोत्र वर्धन का अधिकार दिया गया|

नौ मानस पुत्रों में सर्वश्रेष्ठ भृगु ऋषि गोत्रोत्पन्न वत्स ऋषि को अपने गोत्र नाम से प्रजा वर्धन का अधिकार प्राप्त हुआ| इनके मूल ऋषि भृगु रहे| इनके पांच प्रवर – भार्गव, च्यवन, आप्रवान, और्व और जमदग्नि हुए| मूल ऋषि होने के कारण भृगु ही इनके गण हुए| इनके वंशज(ब्राह्मण) शोनभद्र,(सोनभदरिया), बछ्गोतिया, बगौछिया, दोनवार, जलेवार, शमसेरिया, हथौरिया, गाणमिश्र, गगटिकैत और दनिसवार आदि भूमिहार ब्राह्मण हुए

लिखित साक्ष्य

छठी शदी ईशा पूर्व महाकवि वाणभट्ट रचित ‘हर्षचरितम्’ के प्रारंभ में महाकवि ने वत्स गोत्र का पौराणिक इतिहास साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया है| महाकवि वाणभट्ट के बारे में क्या कहना – “वाणोच्छिष्टम् जगत सर्वम्”| ‘वाण का छोड़ा हुआ जूठन ही समस्त जगत का साहित्य है’|
इस प्रचलित उक्ति से ही वाणभट्ट की विद्वता का पता चल जाता है| वाणभट्ट स्वयं वत्स गोत्रीय थे|

वाणभट्ट के अनुसार एक बार स्वर्ग की देव सभा में दुर्वासा ऋषि उपमन्यु ऋषि के साथ विवाद करते-करते क्रोधवश सामवेद गान करते हुए विस्वर गान (Out of Tune) गाने लगे| इसपर सरस्वती देवी हँस पड़ी| फिर क्या था; दुर्वासा ऋषि उनपर बरस पड़े और शाप दे डाला – ‘दुर्वुद्धे ! दुर्विद्ग्धे ! पापिनि ! जा, अपनी करनी का फल भोग, मर्त्यलोक में पतित होकर बस| स्वर्ग में तेरा स्थान नहीं|
इतना सुनकर सरस्वती देवी विलाप करने लगी| इसपर पितामह व्रह्मा ने दुर्वासा की बड़ी भर्त्सना की|
अनंतर अपनी मानसपुत्री सरस्वती पर द्रवीभूत होकर उससे कहा – ‘जा बेटी’ ! मर्त्यलोक में धैर्य धर कर जा, तेरी सखी सावित्री भी तेरे साथ वहाँ जायेगी| पुत्रमुख दर्शन तक ही तेरा यह शाप रहेगा, तदन्तर तू यहाँ वापस लौट आयेगी|

शापवश सरस्वती मर्त्यलोक में हिरण्यवाह नदी के पश्चिमी किनारे पर स्वर्ग से जा उतरी|
हिरण्यवाह को शोण नद भी कहते है जो आज कल सोन नदी के नाम से विख्यात हैं|
वहाँ की रमणीयता से मुग्ध हो वहीं पर्णकुटी बनाकर सावित्री के साथ रहने लगी|
इस प्रकार कुछ वर्ष व्यतीत हुए|


एक दिन कोलाहल सुन दोनों ने कुटिया के बाहर आकर देखा|
हजार सैनिकों के साथ एक अश्वारोही युवक उधर से गुजर रहा था|
सरस्वती के सौंदर्य पर वह राजकुमार मुग्ध हो गया और यही हालत सरस्वती की भी थी|
वह राजकुमार और कोई नहीं, महर्षि च्यवन और महाराज शर्यातपुत्री सुकन्या का पुत्र राजकुमार दधीच था|  च्यवनाश्रम शोण नदी के पश्चिमी तट पर दो कोश दूर था| दोनों के निरंतर मिलन स्वरूप प्रेमाग्नि इतनी प्रवल हुई कि दोनों ने गांधर्व विवाह कर लिया और पति-पत्नी रूप जीवन-यापन करने लगे|
जब घनिष्ठता और बढ़ी तो सरस्वती ने अपना परिचय दिया| सरस्वती एक वर्ष से ज्यादा दिन तक साथ रही| फलतः उसने एक पुत्र-रत्न जना| पुत्रमुखदर्शनोपरांत सरस्वती अपने पुत्र को सर्वगुणसंपन्नता का वरदान देकर स्वर्ग वापस लौट गयी| पत्नी वियोगाग्नि-दग्ध राजकुमार दधीचि ने वैराग्य धारण कर लिया| अपने पुत्र को स्वभ्राता-पत्नि अक्षमाला को पालन पोषण के लिए सौंप कर युवावस्था में ही तपश्चर्या के लिए च्यवन कानन में प्रवेश कर गए|

अक्षमाला भी गर्भवती थी| उसे भी एक पुत्र हुआ| सरस्वती के पुत्र का नाम सारस्वत पड़ा और अक्षमाला के पुत्र का नाम पड़ा “वत्स”| अक्षमाला ने अपना दूध पिलाकर दोनों बालकों का पुत्रवत पालन पोषण किया| एक ही माता के दुग्धपान से दोनों में सहोदर भ्रातृवत सम्बन्ध हो गया|
अपनी माता सरस्वती देवी के वरदान से सारस्वत सभी विद्याओं में निष्णात हो गए और इतनी क्षमता प्राप्त कर ली कि अपना पूरा ज्ञान, कौशल और सारी विद्याएँ अपने भाई वत्स के अंदर अंतर्निहित कर दी| परिणामस्वरूप वत्स भी सरस्वती देवी प्रदत्त सारी विद्याओं में निष्णात हो गए|
वत्स में सर्व विद्या अर्पण कर च्यावानाश्रम के पास ‘प्रीतिकूट’ नामक ग्राम में उन्हें बसाकर सारस्वत भी अपने पिता का अनुशरण कर च्यवन कानन में तपस्या करने चले गए|

युगोपरांत कलियुग आने पर वत्स वंश संभूत ऋषियों ने ‘वात्स्यायन’ उपाधि भी रखी|
वात्स्यायन ऋषि रचित ‘कामसूत्र’ जग प्रसिद्ध है|
वत्स वंश में बड़े-बड़े धीर-विज्ञ गृहमुनि जन्मे जो असाधारण विद्वता से पूर्ण थे|
ये किसी और ब्राह्मण की पंक्ति में बैठकर भोजन नहीं करते थे (विवर्जितः जनपंक्त्यः)|
अपना भोजन स्वयं पकाते थे (स्वयंपाकी)|
दान नहीं लेते थे, याचना नहीं करते थे (विधूताध्येषनाः)|
स्पष्टवादी तथा निर्भीक शास्त्रीय व्यवस्था देने के अधिकारी थे| कपट-कुटिलता, शेखी बघारना, छल-छद्म और डींग हांकने को वे निष्क्रिय पापाचार की श्रेणी में गिनते थे| निःष्णात विद्वान, कवि, वाग्मी और नृत्यगीतवाद्य आदि सभी ललित कलाओं में निपुण थे|

कालक्रमेण कलियुग के आने पर वत्स-कुल में कुबेर नामक तपस्वी विद्वान पैदा हुए जिनकी चरणकमलवंदना तत्कालीन गुप्तवंशीय नृपगण करते नहीं अघाते थे :-

“बभूव वात्स्यायन वंश सम्भ्वोद्विजो जगद्गीतगुणोग्रणी सताम|
अनेक गुप्ताचित पादपंकजः कुबेरनामांश इवस्वयंबभूवः||” (कादम्बरी)

कुबेर के चार पुत्र – अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत हुए| पाशुपत को एक पुत्र अर्थपति हुए जो बड़े महात्मा और ब्राह्मणों में अग्रगण्य थे| अर्थपति के एकादश पुत्र भृगु,हंस, शुचि आदि हुए जिनमे अष्टम थे चित्रभानु| इसी भाग्यवान चित्रभानु ने राजदेवी नामधन्य अपनी ब्राह्मण धर्मपत्नी के गर्भ से पाया एक पुत्र रत्न जिसका नाम था वाण जिसने वात्स्यायन से बदलकर भट्ट उपाधि रखी और वाणभट्ट बन गए| वाणभट्ट की युवावस्था उछ्रिंखलता, चपलता और इत्वरता (घुमक्कड़ी) से भरी थी|
अंततः वर्षों बाद अपनी जन्मस्थली प्रीतिकूट ग्राम लौट आये| कालक्रम से महाराजा हर्षदेव से संपर्क में आने के बाद उन्होंने ‘हर्षचरित’ की रचना की|

वत्स/वात्स्यायन गोत्र का भौगोलिक स्थान

600 वर्ष ई.पू. जो पौराणिक भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण विभाजन रेखा है, में वत्स प्रदेश अतिमहत्वपूर्ण 16 महाजनपदों में से एक था जो नीचे दिये गए मानचित्र में अच्छी तरह प्रदर्शित है|
वत्स साम्राज्य गंगा यमुना के संगम पर इलाहबाद से दक्षिण-पश्चिम दिशा में बसा था जिसकी राजधानी कौशाम्बी थी| पाली भाषा में वत्स को ‘वंश’ और तत्सामयिक अर्धमगधी भाषा में ‘वच्छ’ कहा जाता था| यह अर्धमगधी का ही प्रभाव है कि ‘वत्स गोत्रीय’ भूमिहार ब्राह्मण अनंतर में ‘वछगोतिया’ कहलाने लगे| छठी शताब्दी ई.पू. के सीमांकन के अनुसार वत्स जनपद के उत्तर में कोसल, दक्षिण में अवंती, पूरब में काशी और मगध, तथा पश्चिम में मत्स्य प्रदेश था|


बिहार में वत्स गोत्र का इतिहास/स्थान

कालक्रम से वत्स गोत्र का केंद्रीकरण मगध प्रदेश में शोनभद्र के च्यवनाश्रम के चतुर्दिक हो गया क्योंकि इसका प्रादुर्भाव च्यवनकुमार दधीच से जुड़ा हुआ था| मगध प्रदेश में काशी के पूरब और उत्तर से पाटलीपुत्र पर्यंत अंग प्रदेश से पश्चिम तक वत्स गोत्रीय समाज का विस्तार था| सम्प्रति वत्स गोत्र उत्तर प्रदेश के शोनभद्र से लेकर गाजीपुर तक तथा गया-औरंगाबाद में सोन नदी के किनारे से लेकर पटना, हजारीबाग, मुजफ्फरपुर-सीतामढ़ी-गोरखपुर तक फैला हुआ है|
पुरातन कालीन ‘प्रीतिकूट’ ग्राम आज का ‘पीरू’ गांव सिद्ध हो चुका है, (माधुरी पत्रिका 1932 का अंक) जो हिंदू समाज से उपेक्षित हो अपने दुर्भाग्य पर रो रहा है क्योंकि तत्कालीन प्रीतिकूट आज का ‘पीरू बनतारा’ है|
यह प्राचीन च्यवनाश्रम से पश्चिम करीब चार मील की दूरी पर स्थित है| इसके पास ही 6 मील पूरब बनतारा गांव अवस्थित है| कालक्रम से प्रीतिकूट ‘पीयरू’ और तदन्तर ‘पीरू’ बन गया| च्यवनाश्रम के चतुर्दिक वात्स्यायन ब्राह्मण (वछ्गोतिया, सोनभदरिया) के गांव बहुसंख्यक रूप में पाए जाते हैं|
शोन तटवासी होने के कारण ये सोनभद्र/सोनभदरिया कहलाते हैं|
इस्लामीकरण का इतिहास

मुस्लमान बादशाह खासकर हिंदुओं को जबरदस्ती इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दो तरीके अपनाते थे|
एक किसी जुर्म की सजा के बदले और दूसरा जजिया टैक्स नहीं देने के का| जजिया का अर्थ फिरौती Extortion Money रंगदारी, हफ्ता या poll tax है जो गैर मुस्लिमों से उनकी सुरक्षा के बहाने से लिया जाता है| यह प्रथा अभी भी पाकिस्तान में खासकर हिंदुओं के खिलाफ प्रचलित है| पिछले वर्ष अनेक हिंदुओं को इसलिए मार दिया गया क्योंकि वे अपनी गरीबी के कारण जजिया कर देने में असमर्थ थे| जिन लोगों पर जजिया का नियम लागू होता है उनको जिम्मी “कहा जाता है|
अर्थात सभी गैर मुस्लिम जिम्मी है जजिया की कोई दर निश्चित नहीं की गई थी ताकि मुसलमान मनमाना जजिया वसूल कर सकें| प्रोफेट मुहम्मद ने जजिया टैक्स को कुरान में भी लिखवा दिया ताकि मुस्लमान बादशाह इसे धार्मिक मान्यता के अधीन वसूल कर सके|
बादशाहों ने इस टैक्स से अपना घर भरना, और नहीं देने पर लोगों को मुसलमान बनने पर मजबूर करना शुरू कर दिया|
मुहम्मद की मौत के बाद भी मुस्लिम बादशाहों ने यही नीति अपनाई|
जजिया के धन से गैर मुसलमानों को सुरक्षा प्रदान करना मकसद था लेकिन मुसलमान बदशाह उस धन को अपने निजी कामों, जैसे अपनी शादियों, हथियार खरीदने, और दावतें करने और ऐश मौज करने में खर्च किया करता था| बीमार, गरीब, और स्त्रियों को भी नहीं छोड़ते थे और जो जजिया नहीं दे सकता था उसकी औरतें उठा लेते थे| यहांतक क़त्ल भी कर देते थे| जजिया तो एक बहाना था|
मुहम्मद लोगों को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर करना चाहता था जैसा मुसलमानों ने भारत में किया| औरंगजेब के शासनकाल में पीरू बनतारा आदि गाँवों के वछ्गोतिया ब्राह्मण का 1700-1712 के बीच इस्लामीकरण इसी परिप्रेक्ष्य में हुआ| पीरू के पठान एक समय बम्भई ग्रामवासियों के नजदीकी गोतिया माने जाते थे जिसका साक्ष्य आज भी किसी न किसी रूप में उपलब्ध है|
बम्भई और पीरू के बीच तो भाईचारा (भयियारो) अभी तक चल रहा है|
विवाह में शाकद्वीपीय ब्राह्मण पुरोहित भी आशीर्वाद देने और दक्षिणा लेने जाते हैं और उन्हें वार्षिक वृति भी मिलती है और विवाह में पांच सैकड़ा नेग भी|
औरंगजेब की मृत्यु (1707) तक और बहादुर शाह के जजिया टैक्स देने के फरमान पर केयालगढ़पति ज़मींदार वछ्गोतिया/सोनभदरिया भूमिहार ब्राह्मण अड़ गए|
यह समझा जा सकता हैं कि जजिया कर नहीं देने का निश्चय कितना साहसी और खतरनाक निर्णय था| यह सरकार के खिलाफ बगावत थी जो इने-गिने जान जोखिम में डालने वाले लोग ही कर सकते थे| इस बगावत के चलते केयालगढ़ को ध्वस्त कर दिया गया और बागियों को पिघलते लाह में साटकर मार दिया गया| जबरन लोगों को मुसलमान बनाना शुरू कर दिया गया|
केयालगढ़ी पूर्वज कमलनयन सिंह ने बाकी परिवार को धर्म परिवर्तन से बचाने के लिए एक योजना बनाई| उन्होंने निश्चय किया कि वे धर्म परिवर्तन कर लेंगे और अपनी जमींदारी परिवार के लोगों में बाँट देंगे ताकि वे हिंदू बने रहें| इस योजनानुसार अपने भाई के साथ दिल्ली गए और धर्म बदलकर एक भाई मुस्लिम शाहजादी से शादी कर दिल्ली में ही रह गए|

कमलनयन सिंह उर्फ अबुल नसीर खान धर्म परिवर्तन के बाद वापस लौट जमींदारी बाकी परिवार में बांटकर डिहरी गांव अपनी बहन को खोइंछा में देकर जिंदगीभर बम्भई में ही रहे| उनके चचेरे भाईओं नें उन्हें जिंदगी भर अपने साथ ही रखा| वहाँ एक कुआँ भी बनवाया| उनकी कब्र बाबू राम कृष्ण सिंह के हाते में अभी भी दृष्टिगोचर होती है जहां कृतज्ञतावश सब वछ्गोतिया परिवार अभी भी पूजते हैं|
उनके दो लड़के हुए – नजाकत चौधरी और मुबारक चौधरी| उनलोगों को धोबनी मौजा मिला|
लेकिन बेलहरा के जमींदार ब्राह्मण यशवंत सिंह के बहुत उपद्रव करने पर उनके चचेरे भाईओं ने कहा कि तब आप पुरानी डीह प्रीतपुर में जो चिरागी महल है, जाकर बस जाईये| नजाकत चौधरी प्रीतपुर में पुराने गढ़ पर और मुबारक चौधरी बनतारा में जा बसे| वहाँ उनके स्मारक की पूजा लोग अभी तक करते हैं| जब लोग अमझर के पीर को पूजने लगे तब प्रीतपुर का नाम बदलकर ‘कमलनयन-अबुलनसीरपुर पीरु’ रख दिया गया| खतियान में अभी भी यही चला आ रहा है| धीरे-धीरे लोग प्रीतपुर नाम को भूलते गए और पीरू का नाम प्रचलित हो गया| चूंकि पीरू और बनतारा दोनों में में एक ही बाप के दो बेटों की औलादें बस रही हैं इसलिए दोनों गांवों को एक ही साथ बोलते हैं ‘पीरू बनतारा'|
वत्स गोत्रीय/वात्स्यायनों के मुख्य दो ही गढ़ थे – केयालगढ़ और नोनारगढ़
कारण पता नहीं लेकिन नोनारगढ़ी सोनभदरिया/बछ्गोतिया ब्राह्मण अपने को केयालगढ़ी से श्रेष्ठ मानते हैं| ये दोनों गढ़ भी आजकल ध्वंसावशेष रूप में च्यवनाश्रम (देकुड़/देवकुंड/देवकुल)के आस-पास ही दो तीन कोस की दूरी पर हैं|

सोनभदरिया वत्स गोत्रीय लोगों के पूर्वजों के ही दो-दो देवमंदिर – देव का सूर्यमंदिर और देवकुल का शिवमंदिर देश में विख्यात हैं| देव के मंदिर के सरदार पंडा अभी तक सोनभदरिया/बछ्गोतिया ही होते चले आ रहे हैं|
शोनभद्र नदी के किनारे बसे रहने वाले वत्स गोत्रीय भूमिहार शोनभद्र (सोनभदरिया) कहलाये और अर्धमगधी भाषाभासी वत्सगोत्रीय बछगोतिया बगौछिया, दोनवार, जलेवार, शमसेरिया, हथौरिया, गाणमिश्र, गगटिकैत और दनिसवार आदि भूमिहार ब्राह्मण कहलाये लेकिन दोनों का मूल उद्गम स्थल केयालगढ़ या नोनारगढ़ ही था|
वत्स प्रतिज्ञा

जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है, वत्स अपने वादे और वचनबद्धता के लिए विख्यात थे|
अपनी वचनबद्धता कायम रहे इसके लिए सुविख्यात वत्स सम्राट ‘आदर्श द्वितीय’ ने “वत्स-प्रतिज्ञा” कि प्रथा आरंभ की थी| यह एक शपथ के रूप में ली जाती थी| वत्स महाजनपद के ह्रास के साथ ही वत्स प्रतिज्ञा संस्कृति का भी ह्रास हो गया|

आदित्य तृतीय की पहली लिखित प्रतिज्ञा निम्नलिखित है:-

“आर्य जातीय वत्स गोत्रोत्पन्न मै ‘आदित्य त्रितीय’ 206वीं शपथ लेता हूँ कि मैं अपनी मृत्यु तक प्रजा की रक्षा तबतक करूँगा जबतक मेरे कुल-गोत्र की सुरक्षा प्रभावित न हो”|
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि वत्स गोत्र में अपने कुल-गोत्र की रक्षा की भावना सर्वोपरी थी|

अन्य प्रान्तों में वत्स गोत्रीय समुदायों की उपाधियाँ

• बालिगा

• भागवत

• भैरव

• भट्ट

• दाबोलकर

• गांगल

• गार्गेकर

• घाग्रेकर

• घाटे

• गोरे

• गोवित्रिकर

• हरे

• हीरे

• होले

• जोशी

• काकेत्कर

• काले

• मल्शे

• मल्ल्या

• महालक्ष्मी

• नागेश

• सखदेव

• शिनॉय

• सोहोनी

• सोवानी

• सुग्वेलकर

• गादे

• रामनाथ

• शंथेरी

• कामाक्षी

600वीं शदी ई.पू. के सोलह महाजनपद

हालाँकि 600वीं शदी ई.पू. के जनपदों कि संख्या अठारह थी परन्तु महाजनपदों में निम्नलिखित सोलह की ही गणना होती थी (चेति और सूरसेन महाजनपद की श्रेणी में नहीं थे) :-

1. अंग

2. कौशल

3. मल्ल

4. काशी

5. वत्स

6. मगध

7. विज्जी

8. विदेह

9. कुरु

10. पांचाल

11. मत्स्य

12. अस्मक

13. अवंती

14. कुंतल

15. गांधार

16. कम्बोज

अन्य जातियों में वत्स गोत्र

हालांकि ब्राह्मणों (भूमिहार ब्राह्मण सम्मिलित) के अलावा अन्य जातियों में गोत्र प्रथा अनिवार्य नहीं है फिर भी कतिपय प्रमुख जातियों में गोत्र परंपरा देखी जाती है इनके गोत्र, 'गोत्र-ऋषि उत्पन्न' नहीं वल्कि गोत्र-आश्रम आधारित हैं अर्थात जिस ऋषि आश्रम में वे संलग्न रहे उन्होंने उसी ऋषि-गोत्र को अपना लिया|
इसी सिद्धांत पर कुछ क्षत्रिय परिवारों में वत्स गोत्र पाया जाता है| यही सिद्धांत अन्य कुछ जातियों में भी प्रचलित है| इस तरह वत्स गोत्र अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित एवं फलित हो दिन-दूनी और रात-चौगुनी विकास पथ पर अग्रसर होता चला जा रहा है|
मै एक विनीत वत्स गोत्रीय सोनभद्रीय सदस्य इसके सतत उत्तरोत्तर उन्नति की कामना करता हूँ|
ईश्वर हमें सद्बुधि दे और सदा सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे|
"तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय"
ईश्वर हमें अंधकार(अज्ञान) से प्रकाश(ज्ञान) की ओर एवं असत्य से सत्य की ओर ले चले|
ले.कर्नल विद्या शर्मा, (से.नि)